ड्रोन से होगी पराली जलाने की निगरानीपंजाब में धान की कटाई शुरू होने के साथ ही पराली जलाने की घटनाओं पर रोक लगाने के लिए प्रशासन ने निगरानी बढ़ा दी है. अब सिर्फ सैटेलाइट से मिलने वाले आंकड़ों पर निर्भर नहीं रहा जाएगा, बल्कि खेतों की ड्रोन से रियल-टाइम निगरानी भी की जाएगी. संगरूर समेत राज्य के 8 हाई-रिस्क जिलों में यह व्यवस्था लागू की जा रही है. पराली जलाने की घटनाओं पर निगरानी के लिए ड्रोन खास तौर पर दोपहर 3 बजे से रात 9 बजे तक उड़ाए जाएंगे.
अगर किसी खेत में पराली जलती हुई दिखाई देती है तो ड्रोन की मदद से उस जगह की पहचान की जाएगी. साथ ही उसकी GPS लोकेशन और जियो-टैगिंग भी की जा सकेगी. इससे प्रशासन को आग लगने वाली जगह तक जल्दी पहुंचने और नियमानुसार कार्रवाई करने में मदद मिलेगी. ड्रोन से मिलने वाली जानकारी संबंधित राजस्व विभाग के साथ भी साझा की जाएगी.
यह व्यवस्था केवल जिला प्रशासन की पहल नहीं है. इसके पीछे केंद्र सरकार के Commission for Air Quality Management यानी CAQM के निर्देश भी हैं. CAQM ने 28 जुलाई 2026 को पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान के मुख्य सचिवों को पत्र भेजकर पराली जलाने की घटनाओं की निगरानी मजबूत करने को कहा था. CAQM ने 2026 में धान की पराली जलाने की रोकथाम को लेकर दिशा-निर्देश भी जारी किए हैं. इन्हीं निर्देशों के तहत राज्यों में निगरानी और कार्रवाई को मजबूत किया जा रहा है.
संगरूर को पंजाब के उन 8 हाई-रिस्क जिलों में शामिल किया गया है, जहां ड्रोन की मदद से पराली जलाने की घटनाओं पर नजर रखी जाएगी. संगरूर जिला प्रशासन ने इसके लिए संबंधित विभागों को आदेश जारी कर दिए हैं. संगरूर, सुनाम, मूनक-लहरागागा, भवानीगढ़, धूरी और दिड़बा समेत अलग-अलग इलाकों में ड्रोन निगरानी की व्यवस्था की जाएगी. ड्रोन से जुड़े तकनीकी काम, डाटा और रिपोर्टिंग की जिम्मेदारी जिला इनफॉर्मेटिक्स अधिकारी यानी DIO, NIC को दी गई है. पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पर्यावरण इंजीनियर को भी कार्रवाई में सहयोग करने के निर्देश दिए गए हैं.
संगरूर के मुख्य कृषि अधिकारी हरबंस सिंह सिद्धू के मुताबिक, इस सीजन में जिले के 397 गांवों में पराली प्रबंधन के लिए मशीनरी उपलब्ध कराने पर काम किया गया है. व्यक्तिगत किसानों की ओर से करीब 1,300 मशीनों के लिए आवेदन किए गए थे. इनमें से मशीनरी 353 गांवों तक पहुंचाई जा चुकी है. इसके अलावा कोऑपरेटिव सोसाइटियों की ओर से मशीनरी खरीदने के आवेदनों को भी मंजूरी दी गई है. करीब 50 प्रतिशत सोसाइटियां मशीनरी खरीद चुकी हैं, जबकि बाकी जगह खरीद की प्रक्रिया चल रही है.
पराली प्रबंधन के लिए गांव स्तर पर भी व्यवस्था की गई है. नोडल अधिकारियों के साथ करीब 30 सदस्यीय कमेटियां बनाई गई हैं. इनमें कोऑपरेटिव सोसाइटी के सदस्य, पटवारी, चौकीदार, मनरेगा कर्मचारी और पंचायत सदस्य शामिल हैं. इन कमेटियों का काम किसानों के साथ तालमेल करना और यह सुनिश्चित करना है कि गांव में उपलब्ध पराली प्रबंधन मशीनरी का ज्यादा से ज्यादा किसानों को फायदा मिले.
अगर ड्रोन या पोर्टल के जरिए किसी खेत में पराली जलाने की जानकारी मिलती है, तो संबंधित खेत की पहचान कर राजस्व विभाग को जानकारी दी जाएगी. इसके बाद नियमों के मुताबिक चालान और अन्य कार्रवाई की जा सकती है. प्रशासन ने किसानों को पराली खेत में ही प्रबंधित करने और उसे जलाने से बचने की अपील की है. अधिकारियों के मुताबिक, नियमों के तहत पराली जलाने पर राजस्व रिकॉर्ड में रेड एंट्री जैसी कार्रवाई भी हो सकती है, जिसका असर सरकारी सुविधाओं पर पड़ सकता है.
पिछले सीजन में संगरूर पराली जलाने की घटनाओं के लिहाज से प्रमुख जिलों में रहा था. 2025 के धान कटाई सीजन में जिले में 693 फार्म-फायर घटनाएं दर्ज हुई थीं. हालांकि, यह संख्या पिछले साल की तुलना में करीब 60 प्रतिशत कम थी. सितंबर 2025 में संगरूर के 25 गांवों को पराली जलाने के हॉटस्पॉट के तौर पर चिन्हित किया गया था. इनमें छाजली में 44, लोंगोवाल में 41, शेरों में 32 और सुनाम में 28 घटनाएं दर्ज की गई थीं. पूरे पंजाब की बात करें तो 2025 में 5,114 फार्म-फायर घटनाएं दर्ज हुई थीं, जो 2024 के मुकाबले करीब 53 प्रतिशत कम थीं. (कुलवीर सिंह की रिपोर्ट)
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