विदेश मंत्री एस जयशंकर ने खाद्य संकट की आशंका जताई (फोटो/X@DrSJaishankar)विदेश मंत्री एस जयशंकर ने आने वाले महीनों में दुनिया के सामने बड़े खाद्य संकट की आशंका जताई है. उन्होंने कहा कि यूक्रेन और ईरान-खाड़ी क्षेत्र में जारी संघर्षों ने ग्लोबल साउथ की अर्थव्यवस्थाओं पर गंभीर दबाव बढ़ाया है. उनके मुताबिक ऊर्जा, खाद्य और उर्वरक की आपूर्ति से जुड़ी चुनौतियां एक-दूसरे को और गंभीर बना रही हैं.
एस जयशंकर ने सोमवार को एशिया सोसाइटी की ओर से आयोजित एक बातचीत के दौरान कहा कि यूक्रेन और ईरान-खाड़ी संघर्षों का ग्लोबल साउथ की अर्थव्यवस्थाओं पर बेहद गंभीर असर पड़ा है. उन्होंने मौजूदा स्थिति को बहुत तनावपूर्ण बताया और कहा कि इसका प्रभाव सिर्फ एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है.
विदेश मंत्री ने ऊर्जा क्षेत्र को लेकर भी चिंता जाहिर की. उन्होंने कहा कि मौजूदा समय में तेल का बाजार पहले से ही काफी तंग है. ऐसे में तेल आपूर्ति को लेकर राजनीतिक फैसले बाजार की जटिलता बढ़ा सकते हैं और कीमतों पर दबाव डाल सकते हैं.
एस जयशंकर ने कहा कि मौजूदा संकट में एक तरफ तेल की आपूर्ति की सुरक्षा का सवाल है, तो दूसरी तरफ तेल आपूर्ति से जुड़ी राजनीति भी है. दोनों पहलू एक-दूसरे को प्रभावित कर रहे हैं और इससे ऊर्जा संकट और गंभीर हो सकता है.
खाद्य सुरक्षा को लेकर एस जयशंकर ने कहा कि दुनिया ऐसे दौर की ओर बढ़ रही है, जहां कुछ प्रमुख अनाज निर्यातक देश अपनी खेप बाहर भेजने में सक्षम नहीं हो सकते हैं. उन्होंने खास तौर पर ब्लैक सी क्षेत्र के रास्ते होने वाले अनाज निर्यात पर चिंता जताई.
विदेश मंत्री के मुताबिक दुनिया में उर्वरकों की आपूर्ति को लेकर भी महत्वपूर्ण चुनौती पैदा हो रही है. उन्होंने कहा कि उर्वरक के प्रमुख उत्पादकों में पश्चिम एशिया और रूस शामिल हैं और इन क्षेत्रों में उत्पादन संघर्षों से प्रभावित हुआ है.
एस जयशंकर ने वैश्विक संघर्षों के साथ जलवायु संबंधी परिस्थितियों को भी खाद्य सुरक्षा के लिए चुनौती बताया. उन्होंने सुपर अल नीनो जैसी मौसम संबंधी परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए कहा कि इन कारकों के बीच आने वाले महीनों में बड़ा खाद्य संकट पैदा होने की आशंका है.
विदेश मंत्री ने कहा कि अगर ऊर्जा की कमी के साथ खाद्य और उर्वरक संकट भी बढ़ता है, तो इसका असर वित्तीय क्षेत्र पर भी पड़ सकता है. संघर्ष के दौरान पूंजी अक्सर ग्लोबल साउथ से निकलकर सुरक्षित माने जाने वाले बाजारों की ओर चली जाती है. इससे विकासशील अर्थव्यवस्थाओं पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है.
एस जयशंकर ने कहा कि नीति निर्माता बाद में यह कहकर अपनी जिम्मेदारी से अलग नहीं हो सकते कि किसी फैसले का मकसद दूसरे देशों के लिए मुश्किल पैदा करना नहीं था. उनके मुताबिक देशों को अपने फैसलों के व्यापक वैश्विक प्रभाव को ध्यान में रखना चाहिए.
विदेश मंत्री ने कहा कि देशों को इतना आत्मकेंद्रित नहीं होना चाहिए कि वे केवल अपने हितों को देखकर फैसले लें. उन्होंने कहा कि सामान्य समझ के आधार पर यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि बड़ी संख्या में देशों की बुनियादी जरूरतें इतनी प्रभावित न हों कि वे गंभीर संकट में पहुंच जाएं.
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