गणपति की भक्ति में पर्यावरण का रंगगणपति बप्पा के आगमन को लेकर भक्तों में उत्साह बढ़ने लगा है. महाराष्ट्र समेत देश के कई हिस्सों में गणेशोत्सव की तैयारियां शुरू हो गई हैं. लोग अपने घरों और पंडालों में गणपति की स्थापना की तैयारी कर रहे हैं. इसी बीच महाराष्ट्र के अकोला से गणेशोत्सव को लेकर एक ऐसी पहल सामने आई है, जो आस्था के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी देती है. अकोला की पर्यावरण प्रेमी और मूर्तिकार कल्पना राव पिछले पांच साल से ज्यादा समय से साडू मिट्टी से इको-फ्रेंडली गणेश प्रतिमाएं तैयार कर रही हैं. उनका मकसद इन प्रतिमाओं से मुनाफा कमाना नहीं, बल्कि लोगों को पर्यावरण के अनुकूल गणेशोत्सव मनाने के लिए प्रेरित करना है.
सनातन परंपरा में भगवान गणेश को प्रथम पूजनीय और विघ्नहर्ता माना जाता है. महाराष्ट्र में गणेशोत्सव का विशेष महत्व है और इस दौरान घर-घर में गणपति बप्पा की स्थापना की जाती है. भक्त कई दिनों तक पूजा-पाठ और अलग-अलग धार्मिक कार्यक्रमों के जरिए गणेशोत्सव मनाते हैं. लेकिन इस उत्सव के दौरान गणेश प्रतिमाओं के विसर्जन से होने वाला जल प्रदूषण भी एक बड़ी चिंता रही है. इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए कल्पना राव ने मिट्टी की गणेश प्रतिमाएं बनाने का फैसला किया. उनका मानना है कि भगवान गणेश के प्रति आस्था में कोई कमी किए बिना पर्यावरण को भी बचाया जा सकता है. इसी सोच के साथ वह पिछले कई वर्षों से प्लास्टर ऑफ पेरिस यानी POP की जगह साडू मिट्टी से गणपति की प्रतिमाएं बना रही हैं.
कल्पना राव द्वारा बनाई जा रही गणेश प्रतिमाओं की सबसे बड़ी खासियत उनका मिट्टी से तैयार होना है. साडू मिट्टी से बनी इन प्रतिमाओं को प्राकृतिक तरीके से तैयार किया जाता है. इनका उद्देश्य ऐसा विकल्प उपलब्ध कराना है, जिससे गणेशोत्सव के बाद प्रतिमा के विसर्जन से पानी और आसपास के पर्यावरण पर कम असर पड़े.
POP की प्रतिमाएं पानी में आसानी से नहीं घुलतीं और विसर्जन के बाद उनके अवशेष जलस्रोतों में लंबे समय तक रह सकते हैं. इसके मुकाबले साडू मिट्टी से बनी प्रतिमाएं पानी में अपेक्षाकृत आसानी से घुल जाती हैं. इससे विसर्जन के बाद होने वाले प्रदूषण को कम करने में मदद मिल सकती है. यही वजह है कि पर्यावरण को लेकर जागरूक लोग अब मिट्टी की गणेश प्रतिमाओं को पसंद कर रहे हैं.
कल्पना राव के लिए गणेश प्रतिमाएं बनाना सिर्फ एक व्यवसाय नहीं है. वह इसे पर्यावरण संरक्षण की मुहिम के तौर पर देखती हैं. उनका कहना है कि प्रतिमाएं तैयार करने में जितनी लागत आती है, लगभग उसी लागत पर वह भक्तों को गणेश प्रतिमाएं उपलब्ध कराती हैं. यानी उनका मुख्य उद्देश्य इससे ज्यादा पैसा कमाना नहीं, बल्कि ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पर्यावरण संरक्षण का संदेश पहुंचाना है. पिछले कुछ वर्षों में लोगों के बीच पर्यावरण को लेकर जागरूकता बढ़ी है. इसका असर अब गणेश प्रतिमाओं की मांग पर भी दिखाई दे रहा है. लोग पारंपरिक POP की जगह मिट्टी से बनी गणेश प्रतिमाओं को अपनाने में रुचि दिखा रहे हैं. इसी वजह से कल्पना राव के पास इको-फ्रेंडली गणपति प्रतिमाओं के ऑर्डर भी बढ़ रहे हैं.
मिट्टी से बनी गणेश प्रतिमाओं का एक बड़ा फायदा विसर्जन के समय देखने को मिलता है. विसर्जन के बाद मिट्टी पानी में घुलकर धीरे-धीरे प्रकृति का हिस्सा बन सकती है. इससे नदियों, तालाबों, कुओं और दूसरे जलस्रोतों में प्रतिमा के कारण होने वाले प्रदूषण को कम करने में मदद मिल सकती है. कल्पना राव लोगों को यही समझाने की कोशिश कर रही हैं कि गणपति बप्पा की भक्ति और पर्यावरण संरक्षण एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं. थोड़ी सी समझदारी और सही विकल्प अपनाकर लोग उत्सव का पूरा आनंद भी ले सकते हैं और प्रकृति को होने वाले नुकसान को भी कम कर सकते हैं.
आज बदलता मौसम, बढ़ता प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग जैसी समस्याएं पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय हैं. इनका असर आम लोगों के साथ-साथ पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों और जलस्रोतों पर भी पड़ रहा है. ऐसे समय में गणेशोत्सव जैसे बड़े धार्मिक और सामाजिक उत्सव के जरिए पर्यावरण संरक्षण का संदेश लोगों तक पहुंचाना काफी महत्वपूर्ण माना जा सकता है. गणेशोत्सव के दौरान बड़ी संख्या में लोग प्रतिमाएं स्थापित करते हैं और बाद में उनका विसर्जन करते हैं. अगर इस दौरान ज्यादा से ज्यादा लोग प्राकृतिक मिट्टी से बनी प्रतिमाओं को अपनाएं, तो पर्यावरण पर पड़ने वाले दबाव को कम करने में मदद मिल सकती है.
कल्पना राव की कोशिश सिर्फ इस साल के गणेशोत्सव तक सीमित नहीं है. वह चाहती हैं कि आने वाली पीढ़ियां भी पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ गणपति उत्सव मनाएं, लेकिन इसके लिए प्रकृति को नुकसान न पहुंचाना पड़े. उनका संदेश साफ है कि उत्सव की खुशी तभी पूरी होगी, जब उसके बाद हमारी नदियां, तालाब और जलस्रोत भी सुरक्षित रहें. अकोला में साडू मिट्टी से तैयार हो रही ये गणेश प्रतिमाएं इसी सोच की मिसाल हैं. लोगों में भी इस पहल को लेकर रुचि बढ़ रही है और इको-फ्रेंडली गणपति की मांग लगातार सामने आ रही है. यह पहल बताती है कि परंपरा और आधुनिक पर्यावरण जागरूकता को साथ लेकर चला जा सकता है.
गणपति बप्पा की भक्ति में किसी बदलाव की जरूरत नहीं है, जरूरत सिर्फ इतना सोचने की है कि हमारी आस्था से प्रकृति को नुकसान न पहुंचे. कल्पना राव की पहल इसी विचार को आगे बढ़ाती है. साडू मिट्टी से बनी गणेश प्रतिमाओं के जरिए वह लोगों को एक आसान और पर्यावरण के अनुकूल विकल्प दे रही हैं. आस्था वही, उत्सव वही, गणपति बप्पा का स्वागत भी उसी श्रद्धा से- बस इस बार प्रकृति की चिंता के साथ.
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