सहकारिता मंत्रालय का बड़ा कदम (Change in Cooperative Society)केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय सहकारी नीति (National Cooperative Policy-2025) को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए निगरानी और समन्वय की प्रक्रिया तेज कर दी है. सरकार ने इस नीति के बेहतर क्रियान्वयन, केंद्र और राज्यों के बीच तालमेल, समय-समय पर समीक्षा और आने वाली समस्याओं के समाधान के लिए दो महत्वपूर्ण समितियों का गठन किया है. इनमें से 'नीति कार्यान्वयन और निगरानी समिति' की पहली बैठक 9 जून 2026 को आयोजित की गई, जिसमें केंद्र सरकार के विभिन्न मंत्रालयों, राज्य सरकारों, राष्ट्रीय सहकारी संस्थाओं और अन्य संबंधित संगठनों के वरिष्ठ अधिकारियों ने हिस्सा लिया.
बैठक में इस बात पर जोर दिया गया कि राष्ट्रीय सहकारी नीति को केंद्र और राज्य सरकारों के आपसी सहयोग तथा सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) की भावना के साथ लागू किया जाएगा, ताकि देशभर में सहकारी क्षेत्र का संतुलित और मजबूत विकास हो सके.
राष्ट्रीय सहकारी नीति-2025 में नीति के क्रियान्वयन की निगरानी के लिए दो स्तर की समितियों का प्रावधान किया गया है. पहली समिति 'सहकारी नीति पर राष्ट्रीय संचालन समिति' है, जिसकी अध्यक्षता केंद्रीय सहकारिता मंत्री करेंगे. यह समिति नीति को लेकर समग्र मार्गदर्शन देगी, विभिन्न मंत्रालयों के बीच समन्वय स्थापित करेगी और समय-समय पर इसकी समीक्षा करेगी. इसमें केंद्र सरकार के संबंधित मंत्रालयों के मंत्री सदस्य हो सकते हैं.
दूसरी समिति 'नीति कार्यान्वयन और निगरानी समिति' है, जिसकी अध्यक्षता सहकारिता सचिव करेंगे. यह समिति केंद्र और राज्यों के बीच समन्वय बनाए रखने, नीति लागू करने में आने वाली समस्याओं का समाधान करने, प्रगति की निगरानी करने और समीक्षा करने का काम करेगी. इसमें केंद्र सरकार के सचिव, सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के सहकारी विभागों के वरिष्ठ अधिकारी, नीति आयोग के प्रतिनिधि, नाबार्ड, एनडीडीबी, एनसीडीसी, एनएफडीबी, एनसीसीटी, वैमनीकॉम तथा राष्ट्रीय सहकारी संस्थाओं के प्रतिनिधि शामिल किए गए हैं.
सरकार के अनुसार, इन दोनों समितियों का गठन अब पूरा हो चुका है और नीति के क्रियान्वयन की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है.
सरकार का कहना है कि राष्ट्रीय सहकारी नीति-2025 देश के सहकारी क्षेत्र के व्यवस्थित, आधुनिक और सर्वांगीण विकास का रोडमैप तैयार करती है. इस नीति में 6 रणनीतिक स्तंभ, 16 प्रमुख उद्देश्य और 83 सिफारिशें शामिल की गई हैं. इसके साथ ही अगले दस वर्षों में सहकारी क्षेत्र को मजबूत बनाने के लिए स्पष्ट विजन और मिशन भी तय किया गया है. इस नीति का मकसद केवल नई योजनाएं बनाना नहीं है, बल्कि सहकारी समितियों को आर्थिक रूप से मजबूत करना, किसानों और ग्रामीण लोगों तक उनकी पहुंच बढ़ाना, रोजगार के अवसर पैदा करना और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देना भी है.
सहकारिता मंत्रालय ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के सहयोग से राष्ट्रीय सहकारी डेटाबेस (National Cooperative Database-NCD) भी तैयार किया है. इस डेटाबेस में देशभर के 30 अलग-अलग आर्थिक क्षेत्रों में काम कर रही 8,53,430 सहकारी समितियों की जानकारी उपलब्ध है. इन समितियों से करीब 30 करोड़ सदस्य जुड़े हुए हैं.
इस डेटाबेस की सबसे बड़ी खासियत यह है कि सभी सहकारी समितियों की जानकारी एक ही जगह उपलब्ध हो जाती है. राज्यों द्वारा नियुक्त नोडल अधिकारी समय-समय पर समितियों का डेटा एकत्र कर पोर्टल पर अपडेट करते रहते हैं, जिससे जानकारी हमेशा नई बनी रहती है.
सरकार का मानना है कि राष्ट्रीय सहकारी डेटाबेस केवल रिकॉर्ड रखने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह नीति बनाने और उसे लागू करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है. इसके जरिए यह पता लगाया जा सकता है कि किस राज्य या जिले में सहकारी समितियों की संख्या कम है, किस क्षेत्र में नई प्राथमिक कृषि साख समितियों (PACS), डेयरी या मत्स्य सहकारी समितियों की जरूरत है और किन क्षेत्रों में सहकारी व्यवस्था को और मजबूत किया जा सकता है.
इसके अलावा यह डेटाबेस सहकारी समितियों के वित्तीय प्रदर्शन, उनके भौगोलिक विस्तार और भारतीय अर्थव्यवस्था में उनके योगदान का आकलन करने में भी मदद करेगा.
राष्ट्रीय सहकारी डेटाबेस के अनुसार, देश में सबसे अधिक 2,27,177 सहकारी समितियां महाराष्ट्र में हैं. इसके बाद गुजरात में 88,119, तेलंगाना में 60,680, मध्य प्रदेश में 53,216, कर्नाटक में 47,288, राजस्थान में 43,723, उत्तर प्रदेश में 40,591 और हरियाणा में 35,040 सहकारी समितियां कार्यरत हैं.
वहीं बिहार में 27,288, तमिलनाडु में 23,034, पंजाब में 20,332, केरल में 19,479 और आंध्र प्रदेश में 18,165 सहकारी समितियां हैं. दूसरी ओर, सबसे कम सहकारी समितियां लक्षद्वीप (65) और लद्दाख (273) में दर्ज की गई हैं.
विशेषज्ञों का मानना है कि राष्ट्रीय सहकारी नीति और राष्ट्रीय सहकारी डेटाबेस के जरिए सरकार अब सहकारी क्षेत्र की वास्तविक स्थिति को बेहतर तरीके से समझ सकेगी. इससे नई सहकारी समितियां बनाने, कमजोर क्षेत्रों की पहचान करने, योजनाओं का सही तरीके से लाभ पहुंचाने और किसानों, डेयरी, मत्स्य पालन तथा अन्य सहकारी क्षेत्रों को मजबूत करने में मदद मिलेगी. आने वाले वर्षों में यह नीति ग्रामीण अर्थव्यवस्था और सहकारी आंदोलन को नई दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है.
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