जहर बनती मिट्टी का क्या है इलाज? रादिफ़ाह कबीर:
हर रात पंजाब के बठिंडा से एक ट्रेन राजस्थान के बीकानेर के लिए निकलती है, जिसे लोग अब “कैंसर ट्रेन” कहते हैं. यह सिर्फ एक ट्रेन नहीं, बल्कि उस डर का प्रतीक बन चुकी है जो पंजाब के किसानों और परिवारों में लंबे समय से फैला है. माना जाता है कि खेतों में ज्यादा रसायनों के इस्तेमाल और दूषित पानी की वजह से इस इलाके में बीमारियां बढ़ी हैं. इसी बीच अब भारत में एक नया प्रयोग सामने आया है, जिसमें मिट्टी को “स्वस्थ” करने के लिए वैक्सीन जैसी तकनीक से जैव उर्वरक (biofertiliser) तैयार किए जा रहे हैं.
पंजाब के मालवा क्षेत्र में लंबे समय से कैंसर के मामलों को लेकर चिंता जताई जाती रही है. हालांकि वैज्ञानिक रूप से इसका सीधा कारण पूरी तरह साबित नहीं हुआ है, लेकिन खेती में अधिक केमिकल और खराब पानी को एक बड़ा कारण माना जाता है. यही वजह है कि खेती की इस प्रणाली पर अब सवाल उठने लगे हैं, जहां उत्पादन तो बढ़ा लेकिन जमीन और स्वास्थ्य दोनों पर असर पड़ा.
इसी समस्या का समाधान खोजने के लिए अब जैव उर्वरकों पर जोर दिया जा रहा है. ये ऐसे सूक्ष्म जीव (microbes) होते हैं जो मिट्टी में जाकर पौधों को पोषण देते हैं और बीमारियों से बचाते हैं. लेकिन सबसे बड़ी समस्या यह है कि ये जीव बहुत जल्दी मर जाते हैं, जिससे किसानों को फायदा नहीं मिल पाता और वे फिर से रासायनिक खाद पर लौट जाते हैं.
वैज्ञानिकों ने इस समस्या का समाधान खोजने के लिए कोविड वैक्सीन तकनीक से प्रेरणा ली है. जैसे वैक्सीन में सामग्री को फ्रीज करके लंबे समय तक सुरक्षित रखा जाता है, वैसे ही अब माइक्रोब्स को भी फ्रीज-ड्राई तकनीक से सुरक्षित किया जा रहा है ताकि वे लंबे समय तक जीवित रह सकें. गुजरात के वडोदरा में एक बड़ी फैक्ट्री इसी तकनीक पर काम कर रही है, जहां मिट्टी के लिए “जीवित खाद” तैयार की जा रही है.
हालांकि सभी वैज्ञानिक इस तकनीक से पूरी तरह सहमत नहीं हैं. कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि वैक्सीन और जैव उर्वरक को एक जैसा नहीं माना जा सकता, क्योंकि माइक्रोब्स की लागत और उनकी जीवित रहने की क्षमता एक बड़ी चुनौती है. वहीं कुछ वैज्ञानिक इसे एक बड़ी प्रगति मानते हैं, जिससे जैव खेती को नई दिशा मिल सकती है.
नई तकनीक में ऐसे सूक्ष्म जीव चुने जाते हैं जो मिट्टी से पोषक तत्व निकालकर पौधों तक पहुंचाते हैं और कीटों से बचाते हैं. इसके अलावा अब बीजों पर भी माइक्रोब्स की कोटिंग की जा रही है, जिससे पौधा शुरू से ही मजबूत बन सके. इसका मकसद खेती को धीरे-धीरे रसायनों पर निर्भरता से बाहर निकालना है.
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ये नई तकनीक लंबे समय में मिट्टी के असली संतुलन को बदल पाएगी. कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि बाहरी माइक्रोब्स समय के साथ खत्म हो जाते हैं, जबकि कुछ को चिंता है कि लगातार इस्तेमाल से प्राकृतिक मिट्टी की संरचना पर असर पड़ सकता है.
भारत में हर साल भारी सब्सिडी के बावजूद रासायनिक खाद का उपयोग बढ़ता जा रहा है. सरकार और वैज्ञानिक अब जैविक खेती की ओर बदलाव की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन यह आसान नहीं है. किसानों को भरोसा और सही नतीजे चाहिए, तभी बदलाव संभव है.
आज बठिंडा की “कैंसर ट्रेन” एक कड़वी सच्चाई की याद दिलाती है, जबकि वडोदरा की प्रयोगशालाओं में चल रहा यह नया विज्ञान उम्मीद जगाता है कि शायद भविष्य में भारत अपनी मिट्टी को फिर से स्वस्थ बना सके.
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