महंगी खाद से परेशान किसानभारत में ऊर्जा, रक्षा और डिजिटल विकास पर काफी ध्यान दिया जाता है, लेकिन खाद (फर्टिलाइज़र) की सुरक्षा अक्सर नजरअंदाज हो जाती है. हमारे देश में 1.4 अरब लोगों की खेती काफी हद तक बाहर से आने वाली खाद पर निर्भर है. ये खाद समुद्री रास्तों जैसे रेड सी और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से आती है, जो कई बार अस्थिर रहते हैं. हाल के समय में इन रास्तों में परेशानी के कारण भारत को ज्यादा खाद आयात करनी पड़ी. सिर्फ सात महीनों में आयात 70% बढ़ गया. यूरिया की कीमत 120% और डीएपी की कीमत 94% तक बढ़ गई, जिससे खेती महंगी हो गई और किसानों पर बोझ बढ़ा.
भारत दुनिया में सबसे ज्यादा डीएपी आयात करता है. जब बाहर से खाद महंगी या कम आती है, तो इसका सीधा असर किसानों पर पड़ता है. बीज महंगे हो जाते हैं और कभी-कभी उनकी कमी भी हो जाती है. सरकार को भी ज्यादा पैसा खर्च करना पड़ता है. हाल ही में खाद पर सब्सिडी का खर्च बढ़कर ₹1.83 लाख करोड़ तक पहुंच गया. इसका मतलब है कि हम धीरे-धीरे बाहर की चीजों पर ज्यादा निर्भर होते जा रहे हैं, जो सही नहीं है.
असल समस्या सिर्फ खाद की कमी नहीं, बल्कि उसके गलत इस्तेमाल की भी है. भारत में किसान खाद का सही संतुलन में उपयोग नहीं कर पाते. सही अनुपात 4:2:1 होना चाहिए, लेकिन अभी यह 10:9:4 है. इससे जमीन की सेहत खराब हो रही है और फसल को पूरा फायदा नहीं मिल रहा. बहुत सी खाद पानी के साथ बह जाती है या मिट्टी में बेकार हो जाती है. इससे किसानों का नुकसान होता है और सरकार का खर्च भी बढ़ता है.
इस समस्या का हल सिर्फ ज्यादा खाद लाना नहीं है, बल्कि उसे सही तरीके से इस्तेमाल करना है. आजकल जैविक उत्पाद जैसे बायोफर्टिलाइज़र और बायोस्टिमुलेंट्स का उपयोग बढ़ रहा है. ये खाद के साथ मिलकर काम करते हैं और उसकी ताकत बढ़ाते हैं. अगर हम खाद का सही उपयोग करें, तो 10–15% तक सुधार हो सकता है, जिससे हमें कम आयात करना पड़ेगा और पैसा भी बचेगा.
एक नई तकनीक सामने आई है, जिसे फर्टिलाइज़र बायोएडिटिव्स कहा जाता है. ये खाद का विकल्प नहीं हैं, बल्कि उसे और प्रभावी बनाते हैं. ये पौधों को ज्यादा पोषण लेने में मदद करते हैं, मिट्टी में पोषक तत्वों को घुलने में सहायता करते हैं और खाद के नुकसान को कम करते हैं. इससे फसल अच्छी होती है और जमीन भी स्वस्थ रहती है.
भारत के पास अच्छी वैज्ञानिक क्षमता और प्राकृतिक संसाधन हैं, जिससे वह इस क्षेत्र में आगे बढ़ सकता है. इसके लिए सरकार को कुछ जरूरी कदम उठाने होंगे. सबसे पहले, इन नई तकनीकों के लिए साफ नियम बनाने होंगे, ताकि किसान और कंपनियां आसानी से इन्हें अपना सकें. दूसरा, सब्सिडी को इस तरह बदलना होगा कि ज्यादा खाद खरीदने के बजाय सही उपयोग को बढ़ावा मिले. तीसरा, देश में नई तकनीकों और रिसर्च को बढ़ावा देना होगा.
आज की खाद समस्या हमें एक बड़ा सबक देती है. हमें सिर्फ बाहर से चीजें लाने पर निर्भर नहीं रहना चाहिए, बल्कि अपने संसाधनों का सही उपयोग करना चाहिए. अगर भारत सही समय पर कदम उठाता है, तो वह खेती में नई तकनीकों का लीडर बन सकता है. इससे न सिर्फ किसानों को फायदा होगा, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था और पर्यावरण भी मजबूत होगा.
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