डॉ. एम.एल. जाटभारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के महानिदेशक डॉ. एम. एल. जाट ने भारतीय बागवानी की ताकत का जिक्र करते हुए पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक विज्ञान और नई तकनीक से जोड़ने पर जोर दिया है. उनका कहना है कि देश की जलवायु और भौगोलिक विविधता ने भारत को बागवानी के क्षेत्र में विशिष्ट पहचान दी है. कश्मीर और हिमाचल प्रदेश के सेब और अखरोट से लेकर उत्तर प्रदेश के आम, महाराष्ट्र के संतरे, बिहार की लीची और दक्षिण भारत के नारियल और मसालों तक अलग-अलग क्षेत्रों की अपनी विशेषता है.
डॉ. जाट के मुताबिक, भारत में बागवानी सिर्फ फसलों की पैदावार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर आगे बढ़ने की सदियों पुरानी परंपरा का हिस्सा है. स्थानीय मिट्टी, जलवायु और पेड़-पौधों के गुणों को लेकर किसानों के पास पीढ़ियों से चला आ रहा अनुभव मौजूद है. बदलती जलवायु और मौसम से जुड़ी चुनौतियों के दौर में इस पारंपरिक ज्ञान का महत्व और बढ़ जाता है.
डॉ. एम. एल. जाट का कहना है कि वर्तमान समय की जरूरत पारंपरिक कृषि ज्ञान को वैज्ञानिक अनुसंधान और आधुनिक तकनीकों के साथ जोड़ने की है. इसी दिशा में ICAR और उसके विभिन्न संस्थानों की ओर से काम किया जा रहा है.
वैज्ञानिकों का जोर ऐसी उन्नत किस्मों और बेहतर पौध सामग्री विकसित करने पर है, जो बदलती जलवायु परिस्थितियों का सामना करते हुए किसानों को बेहतर उत्पादन दे सकें. इसके साथ फलों और सब्जियों की तुड़ाई के बाद होने वाले नुकसान को कम करने के लिए आधुनिक पोस्ट-हार्वेस्ट मैनेजमेंट तकनीकों के इस्तेमाल पर भी जोर दिया जा रहा है.
देश की दुर्लभ और देसी किस्मों के जर्मप्लाज्म को संरक्षित करना भी इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम है. इसका उद्देश्य जैव विविधता और महत्वपूर्ण आनुवंशिक संसाधनों को भविष्य की पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखना है.
ICAR महानिदेशक ने वैज्ञानिक अनुसंधान को किसानों तक पहुंचाने पर विशेष जोर दिया है. उनका मानना है कि कृषि अनुसंधान का वास्तविक फायदा तभी होगा, जब प्रयोगशालाओं में विकसित तकनीक किसान के खेत तक पहुंचे और उत्पादन बढ़ाने के साथ उसकी लागत कम करने में मदद करे.
पानी की बचत करने वाली आधुनिक सिंचाई तकनीक, डिजिटल कृषि सेवाएं और मौसम के अनुकूल बागवानी पद्धतियां इस दिशा में अहम भूमिका निभा सकती हैं. इन तकनीकों को अपनाने से प्राकृतिक संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल के साथ उपज की गुणवत्ता में सुधार की संभावना भी बढ़ेगी.
डॉ. जाट ने बागवानी उत्पादों की प्रोसेसिंग और वैल्यू एडिशन को भी किसानों की आय बढ़ाने के लिए अहम बताया है. फल और सब्जियों की बेहतर ग्रेडिंग, पैकेजिंग, प्रोसेसिंग और मार्केटिंग से किसानों को अपनी उपज का बेहतर मूल्य मिल सकता है.
किसान यदि उपज को केवल कच्चे उत्पाद के तौर पर बेचने के बजाय प्रोसेसिंग और वैल्यू एडिशन से जोड़ते हैं, तो फसल की बर्बादी कम करने के साथ बाजार में बेहतर कीमत हासिल करने के अवसर बढ़ सकते हैं. इससे ग्रामीण क्षेत्रों में प्रोसेसिंग, पैकेजिंग और मार्केटिंग से जुड़े रोजगार के नए अवसर भी तैयार हो सकते हैं.
डॉ. जाट ने विकसित और आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य में बागवानी क्षेत्र की भूमिका को भी महत्वपूर्ण बताया है. उनके अनुसार, बागवानी पोषण सुरक्षा के साथ ग्रामीण इलाकों में रोजगार सृजन, युवाओं के लिए नए अवसर और महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने में योगदान दे सकती है.
उन्होंने किसानों के जमीनी अनुभव, पारंपरिक ज्ञान और वैज्ञानिक अनुसंधान को एक साथ आगे बढ़ाने की जरूरत बताई. उनका कहना है कि आधुनिक विज्ञान, नवाचार और प्रकृति के प्रति सम्मान के साथ भारतीय बागवानी को आगे बढ़ाया जाए तो यह क्षेत्र किसानों की समृद्धि और आत्मनिर्भर भारत की दिशा में अहम भूमिका निभा सकता है.
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