कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहानकेंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) से दालों और तिलहनों की पैदावार बढ़ाने के लिए अपने प्रयासों को और तेज करने का आह्वान किया है. उन्होंने कहा कि देश अभी भी बड़ी मात्रा में दाल और खाद्य तेल आयात करता है, इसलिए कृषि वैज्ञानिकों की जिम्मेदारी है कि वे ऐसी तकनीक और किस्में विकसित करें जो उत्पादन बढ़ाने में मदद करें. ICAR के 98वें स्थापना दिवस कार्यक्रम को संबोधित करते हुए चौहान ने कहा कि यदि दुनिया के कई देश बिना जीएम (GM) बीजों के दालों की बेहतर उत्पादकता हासिल कर सकते हैं तो भारत को भी इस दिशा में बेहतर रिजल्ट देने होंगे.
कृषि मंत्री ने कहा कि जिन क्षेत्रों में सिंचाई सुविधाएं विकसित हुई हैं, वहां किसान अधिक लाभ के कारण गेहूं और धान जैसी फसलों की ओर बढ़ रहे हैं. मध्य प्रदेश, बिहार, ओडिशा और पूर्वी भारत के कई हिस्सों में यही स्थिति देखने को मिल रही है. इसके कारण दालों की खेती का रकबा प्रभावित हो रहा है और देश को अपनी जरूरतों की पूर्ति के लिए आयात का सहारा लेना पड़ता है. उन्होंने बताया कि भारत हर वर्ष लगभग 60 से 70 लाख टन दालों और 1.5 से 1.6 करोड़ टन खाद्य तेलों का आयात करता है. ऐसे में आत्मनिर्भरता हासिल करने के लिए उत्पादन बढ़ाना जरूरी है.
शिवराज सिंह चौहान ने विभिन्न फसलों की उत्पादकता का उदाहरण देते हुए कहा कि एक एकड़ में मक्का की खेती से 100 क्विंटल से अधिक उत्पादन लिया जा सकता है, जबकि धान की पैदावार औसतन 30 से 35 क्विंटल रहती है. वहीं चना और मूंग जैसी दालों का उत्पादन कई क्षेत्रों में केवल 5 क्विंटल प्रति एकड़ तक सीमित है. उन्होंने कहा कि यह अंतर कृषि वैज्ञानिकों के सामने एक बड़ी चुनौती है और उन्हें ऐसी तकनीक विकसित करनी होगी जिससे दालों और तिलहनों की पैदावार में बड़ी वृद्धि हो सके.
कृषि मंत्री ने कहा कि देश को खादों के मामले में भी आत्मनिर्भर बनने की जरूरत है. उन्होंने सवाल उठाया कि भारत कब तक खाद के आयात पर निर्भर रहेगा. उन्होंने वैज्ञानिकों से उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ कृषि लागत कम करने वाले समाधान विकसित करने का आग्रह किया.
चौहान ने कहा कि देश में कृषि उत्पादन बढ़ा है, लेकिन अब केवल मात्रा नहीं बल्कि क्वालिटी पर भी ध्यान देने की जरूरत है. उन्होंने कहा कि वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धी बनने के लिए किसानों को उच्च गुणवत्ता वाली कृषि उपज तैयार करनी होगी.
कृषि मंत्री ने जलवायु परिवर्तन और अल-नीनो जैसी परिस्थितियों से उत्पन्न जोखिमों का भी जिक्र किया. उन्होंने प्रभावित राज्यों के लिए इमरजेंसी योजनाएं तैयार करने में ICAR की सराहना की, लेकिन साथ ही कहा कि केवल आपातकालीन योजनाएं पर्याप्त नहीं हैं. उन्होंने कहा कि भारत को जलवायु-अनुकूल खेती, टिकाऊ उत्पादन प्रणाली और निर्यात-उन्मुख कृषि रणनीति पर काम करना होगा ताकि भविष्य की चुनौतियों का प्रभावी ढंग से सामना किया जा सके.
चौहान ने “ICAR ओपन डिजिटल नॉलेज प्लेटफॉर्म” बनाने का सुझाव दिया ताकि किसानों को शोध, तकनीक और कृषि सलाह सीधे मोबाइल फोन पर उपलब्ध हो सके. उन्होंने लक्ष्य रखा कि ICAR के 100 वर्ष पूरे होने तक कम से कम 10 करोड़ किसानों को वैज्ञानिक समाधान और आधुनिक कृषि तकनीकों से सीधे जोड़ा जाए.
कृषि मंत्री ने कहा कि कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) केवल प्रशिक्षण केंद्र बनकर न रहें, बल्कि उन्हें इनोवेशन हब, मौसम सलाह केंद्र, कृषि स्टार्टअप सहायता केंद्र और नई तकनीकों के प्रदर्शन स्थल के रूप में विकसित किया जाए.
उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि कृषि विश्वविद्यालयों के छात्रों को अधिक समय खेतों में बिताना चाहिए ताकि वे किसानों की वास्तविक समस्याओं को समझ सकें और उनके समाधान विकसित कर सकें.
चौहान ने विश्वास जताया कि यदि ICAR वैज्ञानिक किसानों की जरूरतों के अनुसार शोध कार्यों को आगे बढ़ाएं तो भारत न केवल खाद्यान्न उत्पादन में बल्कि दाल, तिलहन, गुणवत्ता युक्त कृषि उत्पाद और जलवायु-अनुकूल खेती के क्षेत्र में भी दुनिया के अग्रणी देशों में शामिल हो सकता है.
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