इथेनॉल पॉलिसी पर सवाल?देश में खरीफ फसलों की बुआई का घटता रकबा सिर्फ किसानों के लिए चिंता की बात नहीं है. यह सरकार के महत्वाकांक्षी इथेनॉल मिशन से लेकर आम आदमी की रसोई तक के लिए खतरे की घंटी बन सकता है. वजह साफ है. जिन फसलों का रकबा पिछड़ा है, उन्हीं में से कई फसलें इथेनॉल उत्पादन का प्रमुख कच्चा माल भी हैं.
कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान के मुताबिक, खेती के रकबे में सबसे बड़ी कमी धान में आई है. धान का रकबा करीब 16.32 लाख हेक्टेयर घटा है. मक्का, सोयाबीन और कपास की खेती का रकबा भी कम हुआ है. मक्के की बुआई में करीब 2 लाख हेक्टेयर की गिरावट बताई गई है. इतना ही नहीं, गन्ने का रकबा भी पिछड़ा है, भले ही इसकी गिरावट मामूली हो.
यहीं से बड़ा सवाल खड़ा होता है कि जब खेतों में चावल, मक्का और गन्ने जैसी फसलों का रकबा घट रहा है, तब क्या इनका इस्तेमाल इथेनॉल बनाने के लिए उसी रफ्तार से जारी रखना सही होगा?
इथेनॉल उत्पादन सरकार के बड़े प्रोजेक्ट में शामिल है. सरकार लगातार इथेनॉल ब्लेंडिंग को बढ़ावा दे रही है और उसका तर्क है कि इससे हजारों करोड़ रुपये के सरकारी खजाने की बचत हो रही है.
लेकिन अब सवाल सिर्फ सरकारी खजाना बचाने का नहीं है. सवाल यह है कि यह बचत आखिर किसकी कीमत पर हो रही है?
इथेनॉल उत्पादन में प्रमुख रूप से चावल, मक्का और गन्ने का इस्तेमाल होता है. यही तीनों कृषि उत्पाद सीधे या परोक्ष रूप से करोड़ों लोगों की रोजमर्रा की जरूरतों से भी जुड़े हुए हैं. चावल सीधे लोगों की थाली का हिस्सा है. मक्का खाने के अलावा पोल्ट्री और पशु आहार में इस्तेमाल होता है, जबकि गन्ना चीनी उत्पादन का प्रमुख आधार है.
ऐसे में आलोचकों का सवाल है कि खाद्यान्न और चीनी उत्पादन से जुड़ी फसलों को इथेनॉल की तरफ मोड़ने की कीमत कहीं उपभोक्ताओं को महंगाई के रूप में तो नहीं चुकानी पड़ रही?
इथेनॉल पॉलिसी को लेकर सरकार के सामने यही सबसे मुश्किल सवाल खड़ा हो रहा है. चावल, मक्का और गन्ने की मांग केवल इथेनॉल उद्योग में नहीं है.
मक्का पोल्ट्री और पशु चारे से लेकर कई औद्योगिक जरूरतों तक इस्तेमाल होता है. गन्ने का सीधा संबंध चीनी से है और चावल देश के प्रमुख खाद्यान्नों में शामिल है.
कुछ जानकारों का मानना है कि इथेनॉल का असर पोल्ट्री और पशु चारे से लेकर चीनी तक दिखाई देने लगा है और आने वाले समय में इसका असर चावल की महंगाई के रूप में भी सामने आ सकता है. उनकी राय में सरकार को खाद्यान्न से इथेनॉल उत्पादन पर दोबारा विचार करना चाहिए, अन्यथा खाने की चीजों के दाम को काबू में रखना मुश्किल हो सकता है.
यानी सवाल सीधा है, सरकार के लिए ज्यादा जरूरी क्या है, इथेनॉल की सप्लाई बढ़ाना या आम आदमी की थाली को महंगाई से बचाना?
इस बार यह सवाल इसलिए और गंभीर हो गया है क्योंकि कई खरीफ फसलों की बुआई पीछे चल रही है. खास तौर पर उन फसलों का रकबा घटा है जिनका इस्तेमाल इथेनॉल के कच्चे माल के रूप में किया जा सकता है.
धान के रकबे में करीब 16 लाख हेक्टेयर से ज्यादा की कमी है, जबकि मक्के का रकबा करीब 2 लाख हेक्टेयर घटा है. गन्ने की खेती भी पिछड़ी हुई है.
जब उत्पादन का आधार यानी खेती का रकबा ही घट रहा हो, तब खाद्यान्न का एक हिस्सा इथेनॉल में इस्तेमाल करने को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है.
अगर फसल की उपलब्धता पर दबाव बढ़ता है तो सरकार के सामने दो जरूरतों के बीच संतुलन बनाने की चुनौती होगी. एक तरफ इथेनॉल उत्पादन है और दूसरी तरफ चावल, चीनी और पोल्ट्री और पशु चारे की उपलब्धता और कीमतें हैं.
इथेनॉल के लिए अनाज की अहमियत कितनी तेजी से बढ़ी है, इसका अंदाजा ऑल इंडिया डिस्टीलर्स एसोसिएशन यानी AIDA की डिप्टी डायरेक्टर जनरल भारती बालाजी के बयान से लगाया जा सकता है.
उनके मुताबिक, भारत में इथेनॉल उत्पादन के लिए कई तरह के फीडस्टॉक का इस्तेमाल किया जा रहा है. इनमें मक्का, भारतीय खाद्य निगम यानी FCI का अतिरिक्त चावल, खराब अनाज और चीनी से तैयार होने वाले फीडस्टॉक शामिल हैं.
भारती बालाजी के मुताबिक, भारत का घरेलू बायोफ्यूल इकोसिस्टम बढ़ने के साथ मक्का इथेनॉल उत्पादन का अहम कच्चा माल बन गया है. लेकिन मक्का केवल इथेनॉल के काम नहीं आता. इसका इस्तेमाल भोजन, पशु चारे और उद्योग में भी होता है. इसलिए इसकी कीमत उत्पादन, खपत, भंडार, लॉजिस्टिक्स और बाजार की कुल मांग के संतुलन से तय होती है.
AIDA के आंकड़े इथेनॉल उत्पादन में अनाज की बढ़ती भूमिका को और साफ करते हैं.
अगस्त के आखिर तक करीब 345 करोड़ लीटर इथेनॉल मक्के से तैयार किया गया. वहीं FCI के अतिरिक्त चावल से करीब 214 करोड़ लीटर और खराब अनाज से करीब 64 करोड़ लीटर इथेनॉल तैयार हुआ.
ये आंकड़े बताते हैं कि अनाज आधारित फीडस्टॉक अब इथेनॉल सप्लाई चेन में मामूली भूमिका नहीं निभा रहे. वे इसका अहम हिस्सा बन चुके हैं.
AIDA का कहना है कि मक्का, FCI के अतिरिक्त चावल और खराब अनाज की बढ़ती हिस्सेदारी से इथेनॉल सेक्टर मल्टी-फीडस्टॉक सिस्टम की तरफ बढ़ रहा है. इसका फायदा यह है कि किसी एक कृषि संसाधन पर निर्भरता कम होती है.
लेकिन यहीं खाद्य सुरक्षा और महंगाई से जुड़ा दूसरा पहलू भी सामने आता है.
अगर धान और मक्के का रकबा घटता है और इसके बाद उत्पादन भी प्रभावित होता है तो क्या अनाज से इथेनॉल बनाने की मौजूदा रफ्तार जारी रखना उचित होगा? सरकार अतिरिक्त चावल और अनाज को इथेनॉल में भेजेगी या बाजार में खाने की चीजों की उपलब्धता बढ़ाने को प्राथमिकता देगी?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि इथेनॉल से बचने वाला पैसा ज्यादा अहम है या महंगाई से आम आदमी की जेब बचाना?
सरकार के सामने चुनौती अब केवल इथेनॉल उत्पादन का लक्ष्य हासिल करने की नहीं है. उसे यह भी सुनिश्चित करना होगा कि इथेनॉल के लिए कच्चे माल की बढ़ती मांग का दबाव आम लोगों की थाली, पशुपालकों के चारे, पोल्ट्री उद्योग और चीनी की कीमतों पर न पड़े.
खरीफ की बुआई में आई गिरावट ने इस बहस को और धार दे दी है. आने वाले समय में सरकार के फैसले से यह साफ होगा कि घटे हुए कृषि रकबे के बीच प्राथमिकता इथेनॉल को मिलती है या सस्ते अनाज, चारे और चीनी को.
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