किसानों के लिए खास होने वाला है ये बजट!पिछले दस सालों में भारत में कृषि मशीनों का इस्तेमाल बढ़ा है, लेकिन यह सिर्फ संख्या में बढ़ा है, गुणवत्ता या काम के तरीके में नहीं. भारत दुनिया का सबसे बड़ा ट्रैक्टर बाजार बन गया है और हर साल 12 लाख से ज्यादा ट्रैक्टर बिकते हैं. लेकिन केवल ट्रैक्टर होने से किसानों की असली मुश्किलें जैसे पानी की कमी, महंगी मजदूरी और कम उपज पूरी तरह हल नहीं होती.
अब अगली मशीनरी की तरक्की खेत में काम करने के तरीकों पर ध्यान देने से आएगी, सिर्फ ट्रैक्टर बेचने से नहीं. किसानों को ऐसे उपकरण और तरीके चाहिए जो उनकी खास परेशानियों को हल करें, जैसे कम पानी में खेती करना, मजदूरी बचाना और फसल की अच्छी उपज लेना. उदाहरण के लिए, डायरेक्ट सीडेड राइस (DSR) तकनीक से धान की खेती में पानी की बचत होती है और मजदूरी भी कम लगती है. लेकिन यह तभी सफल होता है जब इसे अन्य तरीकों के साथ मिलाकर इस्तेमाल किया जाए, जैसे खेत को ठीक से तैयार करना, बीज सही मात्रा में डालना और खरपतवार का नियंत्रण करना.
पिछले सालों में जॉन डीयर, कुबोटा जैसी बड़ी कंपनियों ने बेहतर ट्रैक्टर और हाई‑टेक मशीनें भारत में लाईं. ये मशीनें काम को आसान बनाती हैं, लेकिन सही तरीके से इस्तेमाल करना सीखना जरूरी है. छोटे किसान अक्सर मशीन खरीदने के बाद नहीं जानते कि इसे कैसे सही तरीके से इस्तेमाल करें.
इसलिए बजट 2026 में सरकार को किसानों को खेत में दिखाकर यह बताना चाहिए कि नई मशीनें कैसे काम आती हैं और इससे पानी, समय और पैसा कैसे बचता है.
सरकार की तरफ से मशीनों पर मिलने वाली मदद या सब्सिडी अभी बहुत जटिल है. किसान अक्सर नहीं जानते कि यह मदद कहां से मिलेगी. अगर यह मदद किसान के पास सीधे पहुंचे, जैसे उनके नजदीकी फार्मर प्रोड्यूसर ऑर्गेनाइजेशन (FPO), सहकारी समिति या डीलरशिप से, तो ज्यादा लोग इसका फायदा उठा पाएंगे.
इसके साथ-साथ, किसान आपस में मशीन साझा कर सकें या किराए पर ले सकें, तो छोटे किसान भी महंगी मशीनों का लाभ ले पाएंगे.
भारत में मशीन बनाने की क्षमता बहुत बढ़ गई है. अब जरुरत है कि यह शक्ति सीधे खेतों में दिखे. सिर्फ ट्रैक्टर बेचने की बजाए किसानों को ऐसी मशीनें और समाधान दें जो उनकी उपज बढ़ाएं, खर्च कम करें और खेती को टिकाऊ बनाएं. अगर बजट 2026 में यह बदलाव होगा, तो भारत की खेती तेज, मजबूत और स्मार्ट बन सकती है.
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