बायोफोर्टिफाइड बीजभारत में आज खाने की कोई कमी नहीं है. हम इतना अनाज उगाते हैं कि पूरा देश पेट भर खा सके. फिर भी बहुत से बच्चों, महिलाओं और बड़ों के शरीर में जरूरी पोषक तत्वों की कमी है. आयरन, जिंक, विटामिन ए जैसे तत्व शरीर को मजबूत बनाते हैं, लेकिन ये हमारे खाने में धीरे-धीरे कम होते जा रहे हैं. इसे “छुपी हुई भूख” कहा जाता है, क्योंकि यह बाहर से दिखती नहीं, लेकिन शरीर को कमज़ोर बना देती है.
अब तक भारत की पोषण नीति ज़्यादातर दवा, सप्लीमेंट, या ऊपर से पोषण मिलाने वाले खाने पर टिकी रही है. जैसे आटे या नमक में ऊपर से आयरन या आयोडीन मिलाना. इससे कुछ फायदा ज़रूर हुआ है, लेकिन इसमें एक कमी है. यह पोषण खाने के बाद जोड़ा जाता है, खाने के अंदर से नहीं आता. यानी खाना जैसा है, वैसा ही रहता है, बस बाद में उसमें कुछ मिला दिया जाता है.
असली बदलाव खेत से शुरू हो सकता है, बीज से और मिट्टी से. अगर जो बीज किसान बो रहा है, वही बीज ज़्यादा पोषण वाला हो, तो जो फसल उगेगी वह अपने आप ज़्यादा ताकत देगी. ऐसे बीजों को बायोफोर्टिफाइड बीज कहते हैं. इसका मतलब है ऐसे बीज, जिनमें प्राकृतिक तरीके से आयरन, जिंक, कैल्शियम या विटामिन ज़्यादा होता है.
बायोफोर्टिफाइड बीज किसी दवा की तरह नहीं होते. इन्हें खाने का तरीका भी नहीं बदलता. वही चावल, वही रोटी, वही दाल- बस उनमें पोषण ज़्यादा होता है. ये बीज खास तरीके से तैयार किए जाते हैं ताकि फसल उगते समय ही मिट्टी से ज़्यादा पोषक तत्व खींच सके. इससे शरीर को रोज के खाने से ही जरूरी ताकत मिलने लगती है.
दुनिया के कई देशों में बायोफोर्टिफिकेशन को सस्ता और असरदार तरीका माना गया है. बड़े कृषि संस्थानों ने भी इसे सही माना है. लेकिन भारत में यह अब तक ज़्यादातर सरकारी योजनाओं और प्रयोगों तक ही सीमित रहा. आम लोग इसे रोज़मर्रा की ज़िंदगी में कम देख पाते थे.
पिछले एक साल में इसमें बदलाव दिखने लगा है. अब बायोफोर्टिफाइड आटा, चावल और मिलेट्स ऑनलाइन किराना ऐप्स पर मिलने लगे हैं. लोग वही चीज़ें खरीद रहे हैं, जो वे पहले खाते थे, बस अब थोड़ी ज़्यादा पौष्टिक. कई लोग इन्हें बार-बार खरीद रहे हैं, क्योंकि उन्हें फर्क महसूस हो रहा है.
सबसे अच्छी बात यह है कि इसमें आदत बदलने की ज़रूरत नहीं है. बच्चों को अलग से गोली खाने की ज़रूरत नहीं, न ही मां को कोई नया खाना बनाना पड़ता है. वही दाल-चावल और रोटी, लेकिन ज़्यादा ताकत के साथ. यही वजह है कि यह तरीका लंबे समय तक काम करता है.
बायोफोर्टिफाइड बीज सिर्फ खाने वालों के लिए नहीं, किसानों के लिए भी अच्छे हैं. इनकी फसल अच्छी होती है और कई बार मौसम को भी बेहतर झेल लेती है. अगर किसान को अच्छी कीमत और पहचान मिले, तो वह ऐसे बीज और ज़्यादा अपनाएगा.
एक समस्या यह रही है कि लोगों को भरोसा नहीं होता कि खाने में सच में कितना पोषण है. अब नई मशीनों से अनाज और आटे में मौजूद पोषक तत्वों को सही-सही मापा जा सकता है. इससे किसान, सरकार और ग्राहक- सभी को सही जानकारी मिलती है.
भारत की पोषण समस्या सिर्फ मुफ्त खाना देने से खत्म नहीं होगी. इसका हल रोज़ के खाने को बेहतर बनाने में है. बायोफोर्टिफाइड बीज इसी दिशा में बड़ा कदम हैं. ये खेती, सेहत और बाजार- तीनों को जोड़ते हैं.
अगर भारत को आने वाले समय में मज़बूत और स्वस्थ बनना है, तो शुरुआत खेत से करनी होगी. अच्छे बीज, अच्छी मिट्टी और अच्छा खाना- यही भविष्य की असली पोषण नीति हो सकती है.
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