प्याज का निर्यात ठपमध्य पूर्व में ईरान और इजराइल-अमेरिका के बीच चल रही लड़ाई का असर प्याज, चीनी और फलों जैसी जल्दी खराब होने वाली चीजों के एक्सपोर्ट पर पड़ा है. नासिक और महाराष्ट्र के दूसरे हिस्सों में पैदा हुए प्याज के करीब 150 कंटेनर चल रही लड़ाई की वजह से जवाहरलाल नेहरू पोर्ट ट्रस्ट (JNPT) पर फंसे हुए हैं. इन कंटेनरों को अधिकतर दुबई समेत खाड़ी के शहरों में जाना था. इन 150 फंसे हुए कंटेनरों में करीब 4,500 टन प्याज है.
दुबई मार्केट, जो मध्य पूर्व के देशों में भारतीय प्याज एक्सपोर्ट का एक बड़ा हब है, लड़ाई की वजह से बंद हो गया है. इसकी वजह से शिपिंग कंपनियों को अपनी आवाजाही रोकनी पड़ी है.
इससे किसानों पर जरूर असर पड़ेगा क्योंकि प्याज के रेट गिरेंगे, जबकि रमजान का महीना चल रहा है और आम तौर पर उन्हें अच्छी कीमत मिलनी चाहिए थी. महाराष्ट्र में प्याज उगाने वाले किसान संगठन के अध्यक्ष भारत दिघोले ने किसानों की सुरक्षा के लिए तुरंत 1,500 रुपये प्रति क्विंटल की सब्सिडी, पोर्ट चार्ज माफ करने और एक्सपोर्ट फिर से शुरू होने तक एक अस्थायी खरीद स्कीम की मांग की है.
इस लड़ाई का असर खाड़ी इलाके में भारत के चीनी एक्सपोर्ट पर भी पड़ा है, लेकिन इससे यह पक्का हो जाएगा कि भारत में चीनी की सप्लाई अधिक रहेगी, स्टॉक भी पर्याप्त होगा. अंगूर और आम जैसे फलों का निर्यात भी रोक दिया गया है. बागवानी के प्रोडक्ट बहुत जल्दी खराब हो जाते हैं, जिससे किसानों और एक्सपोर्टर्स को भी बहुत चिंता हो रही है.
अंगूर के करीब तीन सौ कंटेनर—लगभग 3,900 टन—मिडिल ईस्ट में एक्सपोर्ट के लिए जहाजों में लोड किए गए थे. अब इस शिपमेंट को उतारकर लोकल मार्केट में वापस भेजना होगा. महाराष्ट्र के अंगूर उगाने वालों के एसोसिएशन के वाइस प्रेसिडेंट मारुति चव्हाण ने लोकल मीडिया को बताया कि इस लड़ाई से करीब 6,000 टन अंगूर पर असर पड़ेगा क्योंकि इन अंगूरों को अब लोकल मार्केट रेट पर बेचना होगा.
रिपोर्ट्स के मुताबिक, चीनी के मामले में, भारत ने पिछले साल मिडिल ईस्ट के देशों को 405 मिलियन डॉलर की चीनी एक्सपोर्ट की थी, जिस पर इस साल लड़ाई की वजह से असर पड़ सकता है.
सरकार ने इस सीजन में 2 मिलियन टन चीनी निर्यात की अनुमति दी थी. यह अनुमति दो हिस्सों में दी गई थी. लेकिन जानकारों का कहना है कि युद्ध और अंतरराष्ट्रीय हालात के कारण केवल 0.5 मिलियन टन चीनी ही बाहर जा पाएगी. इसका मतलब है कि लगभग 1.5 मिलियन टन चीनी देश में ही बच जाएगी. इससे घरेलू बाजार में चीनी की कमी नहीं होगी और लोगों को ज्यादा परेशानी नहीं होगी.
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