Farmer Protest: सरकार से कपास पर इंपोर्ट ड्यूटी हटाने की मांग संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) द्वारा आयोजित किसान महापंचायत के लिए सोमवार को देश भर से सैकड़ों किसान नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर इकट्ठा हुए थे. इस महापंचायत के साथ किसानों के अधिकारों पर बहस फिर से शुरू हो गई है. साथ ही सरकार को याद दिलाया गया है कि साल 2020-21 के कृषि आंदोलन के बाद किए गए कई वादे अभी भी अधूरे हैं. इस विरोध प्रदर्शन का असली मकसद यूं तो न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की कानूनी गारंटी की मांग था लेकिन इसमें कपास, किसानों की आत्महत्या को लेकर भी प्रदर्शन किया गया.
एसकेएम की तरफ से जारी एक आधिकारिक प्रेस रिलीज में पंचायत में जो प्रमुख मांगे रखी गई थीं उनमें-
संगठन ने कहा है कि कपास उगाने वाले गांवों में जनसभा का आयोजन किया जाएगा. ग्राम सभाओं को बुलाने की मांग होगी और MSP@C2+50 फीसदी के समर्थन में प्रस्ताव पास किया जाएगा. इसके बाद मंडल महापंचायत और सांसदों के खिलाफ विशाल मार्च आयोजित किया जाएगा. संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) का प्रतिनिधिमंडल 17 और 18 सितंबर 2025 को विदर्भ का दौरा करेगा. आपको बता दें कि वित्त मंत्रालय ने 19 अगस्त 2025 को कपास आयात पर लगे 11 फीसदी शुल्क और कृषि अवसंरचना विकास उपकर (AIDC) को तत्काल प्रभाव से समाप्त करने की अधिसूचना जारी की है. यह आदेश 30 सितंबर तक लागू रहेगा. सरकार ने कहा है कि कपास पर आयात शुल्क और AIDC हटाना जनहित में आवश्यक है.
संगठन ने इस फैसले को किसान विरोधी बताया है और कहा कि इससे कुछ ही दिन पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस पर किसानों से कुछ और वादा किया था. संगठन के अनुसार पीएम मोदी ने कहा था कि वह 'भारतीय किसानों, मछुआरों और पशुपालकों पर प्रतिकूल असर डालने वाली किसी भी नीति के खिलाफ दीवार की तरह खड़े हैं' और 'भारत कभी किसानों, मछुआरों और पशुपालकों के हितों से समझौता नहीं करेगा.' जबकि हकीकत यह है कि पीएम मोदी की नीतियां भारत के हितों की रक्षा करने में विफल रही हैं. संगठन की मानें तो ट्रंप की ओर से भारत के वस्त्र निर्यात पर 50 फीसदी टैरिफ लगाने के बाद की स्थिति से निपटने के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने भारतीय कपास किसानों को सजा देने का फैसला किया. संगठन ने इसे ग्लोबल सप्लाई चेन में सबसे कमजोर कड़ी करार दिया है.
संगठन ने बताया कि इस फैसले का असर यह होगा कि आयातित कपास की कीमतें गिरेंगी और घरेलू कपास के दाम और नीचे धकेल दिए जाएंगे. भारत के छोटे कपास उत्पादक अमेरिका के बड़े औद्योगिक पैमाने पर कपास उगाने वाले किसानों से प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकते, जिन्हें ऐतिहासिक रूप से बड़े पैमाने पर सरकारी सब्सिडी मिली है. एसकेएम का मानना है कि भारत सरकार पर दबाव डालकर भारतीय कपास किसानों को मिलने वाली राज्य सहायता घटाने में अमेरिकी लॉबिंग की दोहरी नीति अच्छी तरह से दर्ज है. अमेरिका में कपास उत्पादन मूल्य का लगभग 12 फीसदी सब्सिडी के रूप में दिया जाता है. जबकि भारत में यह सिर्फ 2.37 प्रतिशत है. यही भारी असमानता अमेरिका के किसानों को विकासशील देशों के कपास उत्पादकों पर बढ़त देती है.
इस निर्णय का तत्काल असर और गंभीर होगा क्योंकि अधिकांश कपास उत्पादक किसानों ने दो महीने पहले ही फसल बो दी है. उन्होंने इस उम्मीद में बड़े खर्च किए हैं कि उनकी उपज उन्हें लाभकारी मूल्य दिलाएगी. ऐसे समय पर शुल्क हटाने का फैसला किसानों को भारी नुकसान पहुंचाएगा. संगठन की मानें तो भारत के कपास उगाने वाले क्षेत्र पहले से ही कृषि संकट और आत्महत्याओं के लिए जाने जाते हैं. ऐसे में यह नया फैसला किसानों को और कर्जदार बनाएगा और आर्थिक संकट को गहरा करेगा. कपास पर शुल्क हटाने से घरेलू कीमतें और गिरेंगी तथा 60 लाख कपास उत्पादक परिवारों की आजीविका पर सीधा प्रहार होगा.
संगठन ने कपास के मसले पर सभी किसानों से अपील की है कि वो एकजुट होकर इस फैसले को पलटवाने के लिए आंदोलन तेज करें. एसकेएम ने सभी किसानों से अपील की है कि वो इंपोर्ट ड्यूटी हटाने वाले नोटिफिकेशन की कॉपी को जलाएं और गांव-गांव में विरोध करें. संगठन ने बताया है कि 1, 2 और 3 सितम्बर 2025 को कपास उगाने वाले गांवों में जनसभाएं होंगी. इनमें प्रधानमंत्री मोदी से 19 अगस्त की अधिसूचना वापस लेने और 10,075 रुपये प्रति क्विंटल MSP @C2+50% घोषित करने का प्रस्ताव पारित होगा. यह प्रस्ताव प्रधानमंत्री को भेजा जाएगा. इसके अलावा NCC द्वारा 24 अगस्त 2025 को अपील पत्र और मांगपत्र का मसौदा उपलब्ध कराया जाएगा.
साथ ही गांव की जनसभा स्थानीय निकायों से तत्काल ग्राम सभा बुलाने और MSP@C2+50% लागू करने के प्रस्ताव पारित करने की मांग करेगी. वहीं संगठन ने 10 सितंबर से हर स्थानीय निकाय के अध्यक्ष को ज्ञापन सौंपने के समर्थन में हस्ताक्षर अभियान और घर-घर पर्चा वितरण किया जाएगा. संगठन ने कहा है कि अगर पीएम उसकी मांगों को स्वीकार नहीं करेंगे तो कपास किसान मंडल महापंचायत बुलाएंगे और संबंधित सांसदों के खिलाफ विरोध मार्च निकालेंगे. 11 कपास उत्पादक राज्यों में SKM की राज्य समन्वय समितियो की ओर से मीटिंग होंगी और सम्मेलन का आयोजन किया जाएगा. साथ ही कपास किसानों में बढ़ती आत्महत्याओं की पृष्ठभूमि में SKM का एक प्रतिनिधिमंडल 17 और 18 सितम्बर 2025 को महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र का दौरा करेगा.
संगठन के अनुसार 1991 से लागू नई उदारवादी कृषि नीतियों के बाद से किसानों की आत्महत्याएं आम हो गई हैं. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक अब तक 4.5 लाख से अधिक किसान आत्महत्या कर चुके हैं. एसकेएम ने दावा किया है कि मोदी सरकार ने इस विषय पर डेटा रखना भी लगभग बंद कर दिया है. संगठन का कहना है कि मोदी शासन में प्रतिदिन 31 किसान आत्महत्या कर रहे हैं, लेकिन पिछले 11 सालों में किसानों के लिए कोई ऋणमाफी योजना नहीं दी गई. इसके उलट, 16.11 लाख करोड़ रुपये का कॉरपोरेट कर्ज माफ किया गया.
एसकेएम ने महाराष्ट्र विधानसभा में 4 जुलाई 2025 को राहत एवं पुनर्वास मंत्री मकरंद जाधव की तरफ से दिए गए आंकड़ों का हवाला दिया और बताया कि मार्च और अप्रैल 2025 में केवल दो महीनों में ही 479 किसान आत्महत्याएं दर्ज की गईं. एसकेएम का कहना है कि राज्य सरकार ऐसे मामलों में परिवार को सिर्फ 1 लाख रुपये की आर्थिक मदद देती है. जिला स्तर पर जांच और समिति की मंजूरी के बाद ही यह राशि मिलती है. संयुक्त किसान मोर्चा ने मांग की है कि केंद्र और राज्य सरकारें तत्काल प्रभाव से यह मुआवजा बढ़ाकर कम से कम 25 लाख रुपये करें और इसे 2014 से प्रभावी रूप से लागू करें.
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