धान की खेती पर अल नीनो का असर (AI- तस्वीर)जून का महीना आते ही अल नीनो (El Nino) की सक्रियता को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं. मौसम विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस साल अल नीनो का प्रभाव बढ़ता है, तो मॉनसून कमजोर पड़ सकता है. ऐसे में सबसे ज्यादा चिंता धान उत्पादक किसानों को है, क्योंकि कमजोर बारिश की स्थिति में धान की रोपाई प्रभावित हो सकती है. इससे उत्पादन में कमी आने की आशंका भी जताई जा रही है. हालांकि, इस बीच किसानों के लिए राहत भरी खबर सामने आई है. दरअसल, पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (PAU) के धान विशेषज्ञ वैज्ञानिक डॉ. बूटा ढिल्लन का कहना है कि यदि किसान सही किस्मों का चयन करें और आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल करें, तो अल नीनो का असर धान की फसल पर काफी हद तक कम किया जा सकता है.
डॉ. ढिल्लन के अनुसार, पारंपरिक धान की तुलना में कम पानी में तैयार होने वाली उन्नत किस्में और वैज्ञानिक खेती के तरीके किसानों को अल नीनो से निपटने में मदद कर सकते हैं. उन्होंने बताया कि धान की सीधी बुवाई (DSR), लेजर लैंड लेवलिंग और पानी बचाने वाली अन्य तकनीकों को अपनाकर किसान पानी की खपत कम कर सकते हैं और अच्छी पैदावार ले सकते हैं. उन्होंने बताया कि अगर अल नीनो का असर धान की खेती पर दिखता है तो इससे उत्पादन पर असर पड़ेगा, लेकिन बदलते मौसम के दौर में किसानों को केवल बारिश पर निर्भर रहने के बजाय आधुनिक कृषि तकनीकों को अपनाने की जरूरत है. यदि समय पर खेत की तैयारी की जाए, उचित किस्मों का चयन किया जाए और सिंचाई का सही प्रबंधन किया जाए, तो उत्पादन पर कोई बड़ा असर नहीं पड़ेगा.
डॉ. बूटा ढिल्लन ने बताया कि भारत में लगभग 50 प्रतिशत धान की खेती सीधे तौर पर मॉनसून और बारिश पर निर्भर करती है. ऐसे में अल नीनो के कारण यदि बारिश सामान्य से कम होती है, तो इसका असर धान उत्पादन पर पड़ सकता है. उन्होंने कहा कि पिछले अल नीनो वर्ष के दौरान देश में धान की पैदावार में करीब 5 से 6 प्रतिशत तक गिरावट दर्ज की गई थी. हालांकि, उन्होंने किसानों को आश्वस्त करते हुए कहा कि पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में धान की फसल पर इसका प्रभाव अपेक्षाकृत कम रहने की संभावना है, क्योंकि यहां सिंचाई की बेहतर व्यवस्था उपलब्ध है.
नहरों और ट्यूबवेल के जरिए किसानों को पर्याप्त पानी मिल जाता है, जिससे मॉनसून कमजोर रहने की स्थिति में भी फसल को जरूरी सिंचाई दी जा सकती है. डॉ. ढिल्लन के अनुसार, जिन क्षेत्रों में सिंचाई के संसाधन उपलब्ध हैं और किसान वैज्ञानिक खेती की तकनीकों को अपनाते हैं, वहां अल नीनो का असर धान उत्पादन पर काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है.
विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन और मौसम की अनिश्चितता भविष्य में खेती के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है, लेकिन नई तकनीकों और वैज्ञानिक सलाह के सहारे किसान इन चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना कर सकते हैं, इसलिए किसानों को घबराने की बजाय कृषि वैज्ञानिकों की सलाह के अनुसार खेती की योजना बनानी चाहिए. ऐसे में अल नीनो को लेकर भले ही आशंकाएं जताई जा रही हों, लेकिन कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि सही रणनीति, कम पानी वाली धान की किस्मों और आधुनिक मशीनों के उपयोग से धान उत्पादन को सुरक्षित रखा जा सकता है. ऐसे में किसानों के लिए यह संदेश महत्वपूर्ण है कि सावधानी और वैज्ञानिक खेती ही बदलते मौसम में सफलता की कुंजी है.
अगर मॉनसून कमजोर रहने या पानी की कमी की आशंका हो, तो किसान कम पानी में अच्छी पैदावार देने वाली धान की किस्मों का चयन कर सकते हैं. ये किस्में कम सिंचाई में भी बेहतर उत्पादन देने के लिए जानी जाती हैं.
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