Farmer Success Story: खारे पानी को मीठा बनाकर उगाया औषधियों का बाग, किसान देवाराम ने रची सफलता की कहानी

Farmer Success Story: खारे पानी को मीठा बनाकर उगाया औषधियों का बाग, किसान देवाराम ने रची सफलता की कहानी

राजस्थान के तपते थार रेगिस्तान से सफलता की एक अनोखी कहानी सामने आई है, जहां एक किसान ने अपनी मेहनत और नवाचार से नामुमकिन को मुमकिन कर दिखाया. उन्होंने आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल कर न केवल खारे पानी को मीठा बनाया, बल्कि उस पानी से बंजर जमीन पर औषधीय पौधों का एक हरा-भरा बाग भी तैयार कर दिया.

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खारे पानी को मीठा बनाकर उगाया औषधियों का बाग, किसान देवाराम ने रची सफलता की कहानीकिसान देवाराम की सफलता की कहानी

बाड़मेर जिले की बाटाडू तहसील का छोटा सा गांव 'झाक' अपनी कठिन जलवायु के लिए जाना जाता है, जहां गर्मियों में सूरज आग उगलता है और पारा 50 डिग्री सेल्सियस को छू जाता है. इसी तपती मिट्टी में देवाराम का जन्म हुआ. उनका बचपन किसी संघर्ष से कम नहीं था. परिवार पर बढ़ता कर्ज और कमजोर आर्थिक स्थिति के कारण उन्हें अपनी स्कूली शिक्षा कक्षा 11वीं में छोड़नी पड़ी. उस समय गांव में बिजली की सुविधा नहीं थी, भले ही परिस्थितियां विपरीत थीं, लेकिन उनके हौसले थार की आंधी से भी ऊंचे थे. उन्होंने ठान लिया था कि "सपनों को कभी मरने नहीं देना है.

कुछ वर्षों बाद, जब स्थिति थोड़ी सुधरी, तो उन्होंने पत्राचार और ओपन स्कूल के माध्यम से अपनी पढ़ाई फिर शुरू की. उन्होंने न केवल अपनी स्कूल की शिक्षा पूरी की, यह संघर्षपूर्ण शुरुआत ही थी, जिसने देवाराम को एक साधारण किसान से बदलकर एक 'उद्यमी किसान' बनाने की नींव रखी.

राजस्थान की रेतीली भूमि में औषधियों का बाग

साल 2020 की कोरोना महामारी ने पूरी दुनिया को स्वास्थ्य का महत्व समझाया. देवाराम ने इसे एक अवसर के रूप में देखा और राजस्थान स्टेट मेडिसिनल प्लांट्स बोर्ड के मार्गदर्शन में औषधीय खेती की शुरुआत की. उन्होंने अपने एक हेक्टेयर खेत में 'गूगल' के 500 से अधिक पौधे लगाए, जो अब विलुप्त होने की कगार पर हैं. इसके साथ ही उन्होंने एलोवेरा, सहजन, तुलसी, गिलोय और सनाय जैसी औषधियों को 'अंतर-फसल तकनीक' के माध्यम से उगाना शुरू किया.

रेगिस्तान का गौरव कहे जाने वाले 'खेजड़ी' के प्रति उनका प्रेम भी अद्भुत है. जहां एक तरफ पेड़ों की कटाई हो रही है, वहीं देवाराम ने अपने खेत में 300 से अधिक खेजड़ी के पौधे रोपकर रेगिस्तानी पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत किया. आज उनका खेत किसी 'नंदनवन' से कम नहीं लगता, जहां औषधीय पौधों की खुशबू और खेजड़ी की शीतल छाया थार की गर्मी को मात देती है. उनका यह कदम न केवल उनकी आय बढ़ा रहा है, बल्कि प्रकृति को भी बचाने का काम कर रहा है.

खारे पानी को बनाया मीठा, बदली थार की तस्वीर 

बाड़मेर जैसे शुष्क क्षेत्रों में खेती के सामने सबसे बड़ी चुनौती पानी की है. यहां का भूजल न केवल कम है, बल्कि 5700 TDS के साथ इतना खारा है कि उसमें फसल उगाना नामुमकिन था. देवाराम ने इस समस्या का वैज्ञानिक समाधान निकाला. उन्होंने महसूस किया कि साल भर में होने वाली मात्र 300 मिमी वर्षा को अगर सहेज लिया जाए, तो भाग्य बदला जा सकता है. उन्होंने अपने पशु आवास और घर की करीब 20,000 वर्ग फीट की पक्की छत को एक उन्नत वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम से जोड़ा.

देवाराम ने अपने खेत में दो विशाल 'फार्म पोंड' बनाए, जिनकी कुल क्षमता लगभग 42 लाख लीटर है. आज वे मॉनसून के दौरान गिरने वाली हर बूंद को सहेजते हैं. यही मीठा पानी उनके पूरे साल के पशुपालन और कृषि कार्यों के लिए जीवनरेखा बन गया है. रबी की फसलों के समय जब चारों तरफ पानी के लिए हाहाकार मचता है, तब देवाराम इसी सहेजे हुए पानी से अपनी फसलों को सींचते हैं. यह मॉडल आज पूरे बाड़मेर के किसानों के लिए जल प्रबंधन का एक जीता-जागता विश्वविद्यालय बन गया है.

बकरी के दूध से बनाया साबुन

देवाराम ने बचपन से ही अपने घर में गाय, भेड़ और बकरियों को पलते देखा था, लेकिन उन्होंने इसे केवल जीवनयापन का साधन न मानकर एक व्यावसायिक मॉडल बनाने की सोची. उन्होंने कृषि विज्ञान केंद्र गुडामालानी और बीकानेर के केंद्रीय भेड़ एवं ऊन अनुसंधान संस्थान (CSWRI) से आधुनिक पशुपालन का प्रशिक्षण लिया.

इस समय उनके पास 500 बकरिया हैं. उन्होंने पशुओं के लिए 20 हजार वर्ग फीट में आधुनिक और पक्का आवास बनाया है. देवाराम यहीं नहीं रुके, उन्होंने बकरी के दूध और एलोवेरा के मेल से 'प्राकृतिक साबुन' बनाना शुरू किया है. यह साबुन पूरी तरह से रसायण मुक्त है, जो त्वचा के लिए फायदेमंद होने के साथ-साथ उनके उद्यम को नई ऊंचाइयों पर ले जा रहा है. उनके पास भेड़ें और थारपारकर नस्ल की गायें भी हैं.

थार विलेज उगल रहा है सोना

आज देवाराम पंवार की ख्याति केवल बाटाडू या बाड़मेर तक सीमित नहीं है. उनके नवाचारों और कड़ी मेहनत की पहचान राष्ट्रीय स्तर पर हुई, उन्हें उन्हें 'नॉलेज एनहांसमेंट प्रोग्राम' के तहत सात दिवसीय प्रशिक्षण के लिए डेनमार्क भेजा, जहां उन्होंने यूरोप की आधुनिक डेयरी और कृषि तकनीकों को करीब से देखा. देवाराम अपने फार्म को 'आईजी थार विलेज' के नाम से एक 'एग्रो-टूरिज्म केंद्र के रूप में विकसित कर रहे हैं.

वे चाहते हैं कि देश-दुनिया के लोग बाड़मेर आएं, रेगिस्तानी जीवन का आनंद लें और यह देखें कि कैसे सीमित संसाधनों में भी एक सफल इको-सिस्टम बनाया जा सकता है. उनका संदेश बहुत साफ है. अगर हम वैज्ञानिक सोच अपनाएं, तो खेती और पशुपालन से न केवल खुद को बल्कि पूरे समाज को आत्मनिर्भर बना सकते हैं.

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