पद्मश्री डॉ गोपाल जी त्रिवेदीमुजफ्फरपुर के कृषि वैज्ञानिक डॉ. गोपाल जी त्रिवेदी को खेती में नवाचार, लीची और मखाना उत्पादन, जलीय कृषि और किसानों की आय बढ़ाने में अहम योगदान के लिए पद्मश्री से सम्मानित किया गया. जानिए उनके संघर्ष और सफलता की पूरी कहानी.
बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के प्रतिष्ठित कृषि वैज्ञानिक डॉ. गोपाल जी त्रिवेदी को देश के चौथे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्मश्री से सम्मानित किया गया है. इस उपलब्धि से न सिर्फ तिरहुत प्रमंडल बल्कि पूरे मुजफ्फरपुर जिले में खुशी की लहर है. किसान, वैज्ञानिक और युवा उन्हें खेती में नवाचार और जमीनी बदलाव का प्रतीक मानते हैं.
बंदरा प्रखंड के मतलूपुर गांव में जन्मे डॉ. त्रिवेदी का सफर आसान नहीं रहा. सीमित संसाधनों और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच उन्होंने खेती और शिक्षा दोनों को साथ लेकर चलने का रास्ता चुना. पिता के निधन के बाद उन्हें स्कूल छोड़कर खेत संभालने पड़े, लेकिन मां के हौसले ने उन्हें दोबारा पढ़ाई की ओर लौटाया. आगे चलकर उन्होंने एग्रीकल्चर साइंस में डॉक्टरेट की और डॉ. राजेंद्र प्रसाद कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति समेत कई अहम पदों पर रहकर कृषि विज्ञान को नई दिशा दी.
डॉ. त्रिवेदी ने अपने गांव की 85 एकड़ जमीन पर जलीय कृषि (Aquaculture) की नई प्रणाली विकसित की. यह मॉडल आज बिहार में एक्वाकल्चर आधारित खेती के लिए प्रेरणास्रोत बन चुका है. वे लगातार युवाओं को परंपरागत खेती से आगे बढ़कर वैज्ञानिक और व्यावसायिक खेती अपनाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं.
मुजफ्फरपुर को लीची की राजधानी कहा जाता है, लेकिन समय के साथ कई बाग बूढ़े और कम उत्पादन वाले हो गए थे. डॉ. त्रिवेदी ने ‘रीजुवेनेशन कैनोपी मैनेजमेंट’ तकनीक को लागू कर ऐसे बागों को दोबारा जीवित किया. इससे लीची का उत्पादन बढ़ा और घरेलू और एक्सपोर्ट मार्केट में मुजफ्फरपुर की पहचान और मजबूत हुई. इसी वजह से उन्हें लीची खेती का पायनियर (अगुआ) भी कहा जाता है.
उत्तरी बिहार के बाढ़ और जलभराव वाले इलाकों में जहां पारंपरिक फसलें बर्बाद हो जाती थीं, वहां डॉ. त्रिवेदी ने किसानों को मखाना और सिंघाड़े की वैज्ञानिक खेती के लिए तैयार किया. जो जमीन कभी बेकार मानी जाती थी, वही आज हजारों किसानों की आय का स्थायी स्रोत बन चुकी है. मखाना अब बिहार की कृषि पहचान का अहम हिस्सा बन गया है.
डॉ. त्रिवेदी ने रबी मक्का को बढ़ावा देकर किसानों को पारंपरिक फसल चक्र से बाहर निकलने का रास्ता दिखाया. उनकी गाइडेंस में बिहार आज देश के प्रमुख मक्का उत्पादक राज्यों में शामिल है, जो क्लाइमेट स्मार्ट खेती की ओर एक बड़ा कदम माना जाता है.
डॉ. त्रिवेदी ने बिहार में पहली बार 'प्राइवेट-प्राइवेट पार्टनरशिप' के जरिए लीची कीट और रोग समस्या का समाधान किया. बिहार लीची ग्रोअर्स ऑर्गनाइजेशन और एक निजी कीटनाशक कंपनी के साथ मिलकर 15–20 गांवों में 4–5 साल तक शोध किया गया. हर गांव में चयनित पेड़ों पर अध्ययन हुआ, कीटों की पहचान की गई और समाधान लागू किया गया. नतीजा यह रहा कि कई गांवों में लीची के बाग रोग-मुक्त हुए, उत्पादन और किसानों की आय दोनों बढ़ी.
डॉ. त्रिवेदी ने बताया कि अब यही मॉडल अन्य फसलों पर लागू किया जाएगा. अगले खरीफ सीजन से सीड ट्रीटमेंट अभियान शुरू होगा, ताकि किसान बीज उपचार को नजरअंदाज न करें और शुरुआती नुकसान से बच सकें.
छोटे से गांव से निकलकर पद्मश्री तक पहुंचने वाले डॉ. गोपाल जी त्रिवेदी की कहानी उन लाखों किसानों की कहानी है, जिनके लिए उन्होंने पूरी जिंदगी काम किया. उनका जीवन यह साबित करता है कि जब वैज्ञानिक सोच जमीन से जुड़ती है, तब खेती सिर्फ आजीविका नहीं बल्कि सम्मान और समृद्धि का जरिया बनती है.
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