पैसे के अभाव में छूटी पढ़ाई, मधुमक्खी पालन से बने धनवान, पढ़ें गयाजी के चितरंजन की अनोखी कहानी

पैसे के अभाव में छूटी पढ़ाई, मधुमक्खी पालन से बने धनवान, पढ़ें गयाजी के चितरंजन की अनोखी कहानी

पैसों की कमी के कारण पढ़ाई बीच में छोड़नी पड़ी, लेकिन हार नहीं मानी. गयाजी के चितरंजन ने मधुमक्खी पालन को आजीविका बनाया और मेहनत के दम पर सफल उद्यमी बनकर दूसरों के लिए भी प्रेरणा बने.

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पैसे के अभाव में छूटी पढ़ाई, मधुमक्खी पालन से बने धनवान, पढ़ें गयाजी के चितरंजन की अनोखी कहानीमधुमक्‍खी का बॉक्‍स

करीब 31 साल पहले बिहार के गयाजी के परैया गांव के चितरंजन शंभू को उस समय सिर्फ इसलिए पढ़ाई छोड़नी पड़ी, क्योंकि उनके पास स्कूल की फीस देने का पैसा नहीं था. लेकिन, आज चितरंजन का एक बच्चा नीट क्वालिफाई कर डॉक्टरी की पढ़ाई कर रहा है तो दूसरा इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला लेने की तैयारी कर रहा है. वहीं, दूसरी ओर चितरंजन करीब एक करोड़ से अधिक मधुमक्खियों के पालन से सालाना 15 लाख से अधिक की कमाई कर रहे हैं. कभी इनका सालाना कारोबार एक करोड़ रुपए से अधिक का था, लेकिन बदलते जलवायु परिवर्तन और बिहार में बाजार की कमी ने रोजगार पर सीधा असर डाला है.

पढ़ाई पर ब्रेक लगा तो मधुमक्खी पालन का सीखा हुनर

किसान तक से बातचीत में चितरंजन शंभू ने बताया कि 1995 के आसपास जब वह इंटर की परीक्षा देने वाले थे, उस समय फॉर्म भरने के लिए उनके पास पैसा नहीं था. घर वालों ने किसी तरह फीस का जुगाड़ किया, लेकिन फीस देरी से जमा करने की वजह से लेट फाइन लगा और वह उस लेट फाइन की राशि नहीं दे सके, जिसके चलते इंटर में ही उनका नाता स्कूल से छूट गया. इसके बाद वह रांची गए, जहां जीविकोपार्जन के लिए बच्चों को घर जाकर ट्यूशन पढ़ाते थे. वहीं, एक बच्चे के घर में मधुमक्खी पालन का कारोबार किया जा रहा था. इसके बाद उन्होंने उससे जुड़ी हुई जानकारी हासिल की और मधुमक्खी पालन के व्यवसाय में कदम रखा.

5 बॉक्स से 1500 बॉक्स तक का तय किया सफर

चितरंजन बताते हैं कि जब वह रांची से मधुमक्खी पालन का हुनर सीखकर आए, उसके बाद उन्होंने अपने जिले में साल 2004-05 के दरमियान पांच बॉक्स से मधुमक्खी पालन का कारोबार शुरू किया, जो 15 सालों के बाद 1500 बॉक्स तक पहुंच गया. हालांकि, बाजार में शहद का अच्छा दाम नहीं मिलने और मौसम की मार की वजह से इस व्यवसाय में उनका काफी नुकसान भी पहुंचा, लेकिन जिस व्यवसाय ने इन्हें आर्थिक और सामाजिक तौर पर मजबूत किया. उस व्यवसाय को छोड़ने की जगह उसमें लगे रहे और अभी भी इनके पास करीब 400 बॉक्स हैं.

वह कहते हैं कि मधुमक्खी पालन में पहले वाला मजा नहीं है. सरकार की लचर व्यवस्था और बाजार की कमी की वजह से आज करीब 50 फीसदी से अधिक मधुमक्खी पालन से जुड़े कारोबारी इससे नाता तोड़ चुके हैं और इसकी सबसे बड़ी वजह है सही दाम का नहीं मिलना, क्योंकि मधुमक्खी पालन एक स्थान पर होकर नहीं हो पाता. 

शहद इकट्ठा करने के लिए मधुमक्खियों को अलग-अलग स्थान पर ले जाया जाता है. और 1 किलो शहद को इकट्ठा करने में करीब 100 रुपये के आसपास खर्च आता है, लेकिन हाल के समय में शहद होलसेल में 80 से 85 रुपये प्रति किलो बिक रहा है. ऐसी स्थिति में यह कारोबार कैसे मुनाफे का सौदा होगा, यह अपने आप में बड़ा सवाल है.

चाइनीज सिरप की मिलावट से कारोबार पर असर

चितरंजन कहते हैं कि आज से करीब 3 से 4 साल पहले शहद का दाम उन्हें अच्छा मिलता था. आज जो शहद वह 80 से 85 रुपये प्रति किलो बेच रहे हैं. वहीं, शहद 150 रुपये किलो तक बेचते थे. लेकिन, बाजार में चाइना के सिरप के साथ शहद की मिलावट होने से दाम पर सीधा असर पड़ा है. वह कहते हैं कि आज कई ऐसी कंपनियां हैं, जो 70% सिरप और 30% शहद मिलाकर बाजार में शुद्ध शहद के नाम पर कारोबार कर रही हैं. इसके बारे में सरकार को भी जानकारी है, लेकिन वह खामोश है.

सालाना 20 हजार किलो शहद का उत्पादन

चितरंजन कहते हैं कि हाल के समय में वह सालाना करीब 20 हजार किलो सरसों शहद का उत्पादन कर लेते हैं. वह कहते हैं कि एक बॉक्स से करीब 40 किलो से 50 किलो तक शहद का उत्पादन होता है. वहीं, एक बॉक्स में करीब 8 से 10 छत्ते रहते हैं और हर छत्ते में करीब दो से तीन हजार के आसपास मधुमक्खियां रहती हैं.

अगर हम एक छत्ते से औसतन 2500 मधुमक्खियों की गणना करें तो 10 छत्ते यानी एक बॉक्स में 25,000 मधुमक्खियां होंगी. अगर 80 रुपये प्रति किलो हिसाब लगाएं तो 20 हजार किलो शहद का दाम 16 लाख रुपये के आसपास आता है.

शहद उत्पादन पर सरकार दे सब्सिडी

चितरंजन कहते हैं कि आज उनके जैसे बहुत से ऐसे किसान हैं, जो शहद पालन से नाता तोड़ चुके हैं, क्योंकि पहले से खर्च बढ़ा है. दाम कम हुआ है. वहीं, हाल के समय में शहद पालन को लेकर सरकार की ओर से जो अनुदान दिया जा रहा है, उसकी जगह शहद उत्पादन पर सरकार को अनुदान देने की जरूरत है. इससे लोगों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और जो शहद उत्पादन धीरे-धीरे नीचे की ओर गिर रहा है, उसे फिर से एक ऊंचाई मिलेगी.

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