पंखिया सेम का जीनोम सिक्वेंस तैयारभारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के वैज्ञानिकों ने खेती और विज्ञान की दुनिया में एक बहुत बड़ी कामयाबी हासिल की है. रांची में स्थित ICAR-इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एग्रीकल्चरल बायोटेक्नोलॉजी के वैज्ञानिकों ने 'विंग्ड बीन' यानी पंखिया सेम नाम की सब्जी का दुनिया का पहला सबसे हाई-क्वालिटी क्रोमोसोम-स्केल जीनोम सीक्वेंस तैयार कर लिया है. साधारण भाषा में कहें, तो वैज्ञानिकों ने इस अनोखी फली का पूरा 'डीएनए मैप' खोलकर रख दिया है. यह खोज इसलिए खास है क्योंकि विंग्ड बीन न सिर्फ सेहत के लिए बहुत फायदेमंद है, बल्कि यह बदलते मौसम और सूखे की मार को भी आसानी से झेल सकती है. इस बड़ी कामयाबी से आने वाले समय में देश के किसानों को बहुत फायदा होने वाला है.
विंग्ड बीन एक ऐसी फलीदार सब्जी है जो पोषण से भरपूर होती है. वैज्ञानिकों की इस नई रिसर्च से अब इस पौधे के बारे में सब कुछ जानना आसान हो जाएगा. इस रिसर्च की सबसे खास बात यह है कि यह दुनिया का पहला 'रेफरेंस जीनोम' है, यानी अब दुनिया भर के वैज्ञानिक इसी डेटा की मदद से इस पौधे पर आगे की रिसर्च करेंगे. इस फली में प्रोटीन, विटामिन और अन्य जरूरी पोषक तत्व कूट-कूट कर भरे होते हैं. सबसे अच्छी बात यह है कि खराब मौसम, कम पानी या तेज गर्मी में भी यह फसल खराब नहीं होती, जिससे किसानों की फसल बर्बाद होने का खतरा बहुत कम हो जाता है.
इस बड़ी कामयाबी को हासिल करने के लिए वैज्ञानिकों ने लैब में दिन-रात एक करके अत्याधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया है. वैज्ञानिकों ने पैकबायो हाईफाई इलुमिना (और हाई-सी) जैसी दुनिया की सबसे एडवांस टेक्नोलॉजी की मदद से इस पौधे के जेनेटिक कोड को डिकोड किया. इस पूरी रिसर्च में सामने आया है कि विंग्ड बीन का जीनोम 698 MB साइज का है, जिसका 98% हिस्सा इसके 9 क्रोमोसोम्स पर पूरी तरह मैप कर लिया गया है. इस तकनीक की वजह से अब पौधे की खूबियों और उसकी बीमारियों से लड़ने की क्षमता को बारीकी से समझा जा सकता है.
इस जीनोम सीक्वेंसिंग के जरिए वैज्ञानिकों ने विंग्ड बीन के अंदर कुल 53,745 जीन्स की पहचान की है. सबसे हैरान करने वाली और अच्छी बात यह है कि इनमें से 750 से भी ज्यादा जीन्स सीधे तौर पर लिपिड मेटाबॉलिज्म यानी फैट और तेल को पचाने और बनाने की प्रक्रिया से जुड़े हुए हैं. इसका मतलब यह है कि इस फली का इस्तेमाल आने वाले समय में सेहतमंद तेल और बेहतरीन न्यूट्रिशन प्रोडक्ट्स बनाने के लिए बड़े पैमाने पर किया जा सकता है. यह खोज कुपोषण की समस्या को दूर करने में भी एक गेम-चेंजर साबित हो सकती है.
इस ऐतिहासिक खोज को मुमकिन बनाने के पीछे भारत के बेहतरीन वैज्ञानिकों की एक पूरी टीम की कड़ी मेहनत है. इस रिसर्च टीम में डॉ. किशोर यू. त्रिभुवन, डॉ. निखिल कुमार सिंह, डॉ. बिनय कुमार सिंह, डॉ. अविनाश पांडे, डॉ. सुधीर कुमार, डॉ. सुजीत कुमार बिशी, डॉ. कनका के., डॉ. तन्मय कुमार साहू, डॉ. ए. पटनायक, डॉ. विजय पाल भदाना और डॉ. सुजय रक्षित शामिल हैं. इन वैज्ञानिकों की इस सफलता ने साबित कर दिया है कि जब हमारा जीनोमिक्स (Genomमजबूत होगा, तभी हमारे देश का भविष्य और हमारी खेती मजबूत होगी. यह कदम भारत को कृषि के क्षेत्र में आत्मनिर्भर और शक्तिशाली बनाने की दिशा में एक मील का पत्थर साबित होगा.
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