गांव की डेयरी से करोड़ों का कारोबार, बुंदेलखंड की 1.05 लाख महिलाओं की बदली जिंदगी

गांव की डेयरी से करोड़ों का कारोबार, बुंदेलखंड की 1.05 लाख महिलाओं की बदली जिंदगी

बुंदेलखंड की ग्रामीण महिलाओं के लिए पशुपालन अब आत्मनिर्भरता का जरिया बन रहा है. वर्ष 2019 में 6-7 महिलाओं से शुरू हुई बलिनी पहल से आज करीब 1.05 लाख महिला दुग्ध उत्पादक जुड़ी हैं. संगठन का कारोबार 651 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है. दूध बेचकर महिलाएं बच्चों की पढ़ाई, खेती और परिवार की जरूरतों में आर्थिक योगदान दे रही हैं.

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गांव की डेयरी से करोड़ों का कारोबार, बुंदेलखंड की 1.05 लाख महिलाओं की बदली जिंदगी651 करोड़ का कारोबार और 1.05 लाख महिलाएं

कभी पशुपालन को गांवों में परिवार की जरूरत और थोड़ी अतिरिक्त कमाई का साधन माना जाता था. लेकिन बुंदेलखंड की ग्रामीण महिलाओं के लिए अब यही पशुपालन आर्थिक आत्मनिर्भरता का जरिया बन रहा है. दूध बेचकर महिलाएं परिवार की आमदनी बढ़ाने के साथ बच्चों की पढ़ाई, खेती और घर के जरूरी फैसलों में भी योगदान दे रही हैं. सोमवार को झांसी के लेमन ट्री होटल में आयोजित बलिनी की नौवीं वार्षिक आमसभा में इस बदलाव की तस्वीर देखने को मिली. कार्यक्रम में बुंदेलखंड के सातों जिलों से करीब 350 महिला दुग्ध उत्पादक यानी ‘दिदियां’ शामिल हुईं.

2019 में 6-7 महिलाओं से शुरू हुआ सफर

आमसभा में बलिनी के सफर, दूध उत्पादन, महिलाओं की आय में बदलाव और भविष्य की योजनाओं पर चर्चा हुई. बलिनी के निदेशक आरपी सिंह के मुताबिक, वर्ष 2019 में इस पहल की शुरुआत करीब छह-सात महिलाओं के साथ हुई थी. धीरे-धीरे बुंदेलखंड के अलग-अलग जिलों की महिलाएं इससे जुड़ती गईं. आज करीब 1.05 लाख महिला दुग्ध उत्पादक बलिनी से जुड़ी हैं. संगठन का कारोबार भी शून्य से बढ़कर पिछले वित्तीय वर्ष में करीब 651 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है.

एक-दो लीटर से अब 6-8 लीटर तक दूध उत्पादन

बलिनी की शुरुआत के समय बुंदेलखंड के गांवों में एक पशु से रोजाना औसतन एक से दो लीटर दूध ही मिल पाता था. इसके बाद बेहतर नस्ल के पशु, पशुपालन प्रशिक्षण और डेयरी प्रबंधन पर ध्यान दिया गया. इसका असर दूध उत्पादन पर दिखाई दे रहा है. कई महिलाएं अब रोजाना छह से आठ लीटर तक दूध बलिनी को उपलब्ध करा रही हैं. इससे पशुपालन उनके लिए नियमित आमदनी का जरिया बनता जा रहा है.

महिलाओं के बैंक खाते में सीधे पहुंचता है पैसा

बलिनी से जुड़ी महिलाएं अपने घर पर पशुपालन करती हैं और सुबह-शाम दूध गांव की डेयरी तक पहुंचाती हैं. दूध की बिक्री का पैसा सीधे उनके व्यक्तिगत बैंक खातों में डीबीटी के जरिए भेजा जाता है. इससे भुगतान व्यवस्था पारदर्शी रहती है और महिलाओं को अपनी कमाई पर सीधा अधिकार मिलता है. पशुओं की देखभाल, डेयरी प्रबंधन और पशुपालन की तकनीकी जानकारी भी महिलाओं को गांव स्तर पर देने का प्रयास किया जा रहा है.

पशुपालन के साथ मिल रही दूसरी सुविधाएं

बलिनी का काम केवल किसानों से दूध खरीदने तक सीमित नहीं है. महिला पशुपालकों को कृत्रिम गर्भाधान, पशु प्रशिक्षण और डेयरी मैनेजमेंट जैसी सुविधाएं भी दी जा रही हैं. शुरुआत में उत्तर प्रदेश राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन से मिली सरकारी ग्रांट से इस पहल को आगे बढ़ाया गया. इसके बाद भी संचालन और जरूरी सुविधाओं के लिए सरकारी सहयोग मिलता रहा.

अब दूध से दही, छाछ और पनीर बनाने की तैयारी

बलिनी अब अपने कारोबार को और आगे बढ़ाने की तैयारी में है. फिलहाल संस्था मुख्य रूप से किसानों से दूध खरीदकर उसकी थोक बिक्री करती है. आने वाले समय में पैकेट दूध के साथ दही, छाछ और पनीर जैसे उत्पाद बाजार में उतारने की योजना है. इसके लिए प्रोसेसिंग प्लांट, उत्पादन और मार्केटिंग व्यवस्था को मजबूत किया जाएगा. इसका उद्देश्य दूध से बनने वाले उत्पादों की बिक्री से होने वाले अतिरिक्त लाभ का फायदा दुग्ध उत्पादकों तक पहुंचाना है.

पिछले साल महिलाओं को मिला 6 करोड़ रुपये का बोनस

आमसभा में महिलाओं को दिए जाने वाले बोनस की भी चर्चा हुई. अधिकारी के मुताबिक, पिछले वर्ष बलिनी से जुड़ी महिला दुग्ध उत्पादकों को करीब छह करोड़ रुपये का बोनस दिया गया था. इस साल भी पिछले वर्ष के बराबर या उससे अधिक बोनस मिलने की उम्मीद जताई गई है. बलिनी का लक्ष्य आने वाले वर्षों में महिलाओं की आय को और बढ़ाना है.

कीर्ति ने 10 हजार रुपये से शुरू किया कारोबार

आमसभा में बलिनी से जुड़ी कीर्ति ने अपनी कहानी भी साझा की. उन्होंने बताया कि वह 2019 से संगठन से जुड़ी हैं. शुरुआत में वह सदस्य थीं और बाद में बोर्ड डायरेक्टर की जिम्मेदारी भी मिली. कीर्ति के मुताबिक, नोटबंदी के समय उनके पास करीब 10 हजार रुपये थे. पिछले पांच-छह वर्षों में उन्होंने करीब सात से आठ लाख रुपये का कारोबार किया है. अब वह बच्चों की पढ़ाई, खेती और परिवार की जरूरतों में आर्थिक योगदान दे पा रही हैं.

एक पशु से शुरुआत, अब 20 हजार रुपये तक मासिक आय

दूसरी महिला दुग्ध उत्पादक निशा ने बताया कि वह भी वर्ष 2019 में बलिनी से जुड़ी थीं. उन्होंने एक पशु से पशुपालन शुरू किया और धीरे-धीरे दूध के कारोबार को बढ़ाया. निशा के मुताबिक, आमदनी बढ़ने के बाद उन्होंने 2020 में अपने बेटे का दाखिला बबीना के सेंट ज्यूड्स स्कूल में कराया. उन्होंने अपनी वर्तमान मासिक आय करीब 20 हजार रुपये बताई. निशा ने अन्य ग्रामीण महिलाओं से भी पशुपालन को आय का साधन बनाने और बलिनी से जुड़ने की अपील की.

‘लखपति दीदी’ से आगे ‘करोड़पति दीदी’ बनाने का लक्ष्य

बलिनी के निदेशक आरपी सिंह ने कहा कि संस्था की अब तक की प्रगति आगे के बड़े सफर की शुरुआत है. आने वाले समय में दूध उत्पादन के साथ प्रोसेसिंग और मार्केटिंग को मजबूत करने पर जोर दिया जाएगा. लक्ष्य है कि बलिनी से जुड़ी महिलाएं सिर्फ ‘लखपति दीदी’ तक सीमित न रहें, बल्कि आगे चलकर ‘करोड़पति दीदी’ बनने की दिशा में बढ़ें. बुंदेलखंड में पशुपालन के जरिए महिलाओं की आय बढ़ाने और उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत बनाने की कोशिश आगे भी जारी रहेगी. (अजय झा का इनपुट)

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