केसर की खेती (फाइल फोटो)कश्मीर का विश्व प्रसिद्ध केसर, जिसे घाटी की 'सुनहरी फसल' कहा जाता है, गंभीर संकट से जूझ रहा है. बढ़ते तापमान, लंबे समय तक सूखे जैसे हालात और बदलते मौसम ने केसर की खेती के लिए जरूरी नाजुक परिस्थितियों को बिगाड़ दिया है. इसका असर पैदावार में गिरावट और सूखते खेतों के रूप में दिख रहा है.
संकट को और गहरा कर रहा है केसर उत्पादन के पारंपरिक इलाकों, खासकर पंपोर में हो रहा अनियंत्रित निर्माण. खेती की जमीन तेजी से रिहायशी और व्यावसायिक इस्तेमाल में बदली जा रही है. जम्मू-कश्मीर केसर अधिनियम, 2007 लागू होने के बावजूद खेती के लिए उपलब्ध रकबा लगातार सिकुड़ रहा है.
सरकार ने वर्ष 2010 में राष्ट्रीय केसर मिशन की शुरुआत की थी. इसके लिए शुरुआती तौर पर 371.18 करोड़ रुपये की राशि तय की गई थी. मिशन के तहत बेहतर सिंचाई, गुणवत्तापूर्ण बीज, बोरवेल और आधुनिक कृषि तकनीक का वादा किया गया था. हालांकि खराब क्रियान्वयन, अधूरे सिंचाई ढांचे, ठेकेदारों को भुगतान में देरी और विभागों के बीच तालमेल की कमी ने इसके उद्देश्यों को कमजोर कर दिया.
प्रस्तावित 126 बोरवेल में से कथित तौर पर केवल 101 ही बन पाए. वहीं, सिर्फ 8 से 10 स्प्रिंकलर ही चालू हालत में पाए गए. किसानों ने पर्याप्त प्रशिक्षण न मिलने की भी शिकायत की है. उनका कहना है कि करोड़ों रुपये का बकाया अब भी अदा नहीं किया गया है.
मिशन शुरू हुए एक दशक से ज्यादा समय बीत चुका है, लेकिन केसर की खेती को पटरी पर लाने का वादा पूरा नहीं हो सका. एक तरफ जलवायु परिवर्तन उत्पादकता घटा रहा है, तो दूसरी तरफ निर्माण लगातार केसर के खेतों को निगल रहा है. इस तरह कश्मीर की यह सुनहरी फसल पर्यावरणीय गिरावट और प्रशासनिक विफलता के बीच फंसी हुई है.
यदि खेती की जमीन को बचाया नहीं गया, सिंचाई ढांचे को चालू नहीं किया गया और किसानों को सरकार से ठोस मदद नहीं मिली, तो क्षेत्र केवल केसर उत्पादन ही नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक और कृषि विरासत का एक अहम हिस्सा भी खो सकता है.
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