संगरूर में पराली जलाने की घटनाओं में तेजीपंजाब में पराली जलाने के मामलों को रोकने के लिए प्रशासन और सरकार की ओर से किए जा रहे दावों के बीच संगरूर के खेतों से आग की लगातार तस्वीरें सामने आ रही हैं. जिले में बड़े स्तर पर धान की पराली को आग लगाई जा रही है. खेतों में उठते धुएं के कारण वातावरण में धुंध बढ़ती दिखाई दे रही है और विजिबिलिटी भी प्रभावित हो रही है. हालात ऐसे हैं कि शाम करीब 5 बजे के बाद धुएं और धुंध के चलते सूरज भी दिखाई देना बंद हो जाता है.
संगरूर के खेतों से सामने आई तस्वीरों में साफ देखा जा सकता है कि किस तरह धान की पराली को आग के हवाले किया जा रहा है. इसका असर न केवल पर्यावरण पर पड़ रहा है, बल्कि लोगों के स्वास्थ्य और सड़क पर आवाजाही के लिए भी चिंता बढ़ रही है. जिले में एयर क्वालिटी को लेकर भी लगातार चिंता जताई जा रही है.
भारतीय किसान यूनियन डकौंदा से जुड़े किसान नेता सतनाम सिंह ने पराली जलाने के पीछे किसानों की मजबूरियों को जिम्मेदार ठहराया है. उनका कहना है कि पराली का धुआं सबसे पहले किसानों और उनके बच्चों को प्रभावित करता है, क्योंकि किसान खुद खेतों में रहते हैं. इसके बाद यह धुआं दूसरे इलाकों तक पहुंचता है. किसान पराली जलाने के शौकीन नहीं हैं, बल्कि मौजूदा परिस्थितियों में उनके पास इसका कोई आसान विकल्प नहीं है.
सतनाम सिंह ने आरोप लगाया कि पंजाब सरकार और प्रशासन पराली प्रबंधन को लेकर बड़े-बड़े दावे तो कर रहे हैं, लेकिन किसानों को अभी तक इसका व्यावहारिक समाधान नहीं मिला है. उन्होंने बताया कि पराली प्रबंधन करने वाली मशीनों पर मिलने वाली सब्सिडी के लिए अनुसूचित जाति वर्ग के किसानों को प्राथमिकता मिलती है, जबकि उन्होंने सामान्य वर्ग से तीन बार मशीनों के लिए आवेदन किया, लेकिन उन्हें मशीनें नहीं मिल सकीं.
किसान नेता ने सवाल उठाया कि जिन लोगों के पास खेती योग्य जमीन ही नहीं है, उन्हें भी पराली प्रबंधन से जुड़े नियमों के दायरे में रखने का क्या औचित्य है? उनका कहना है कि किसानों को इस समय सबसे ज्यादा जरूरत उन मशीनों की है, जिनसे पराली का खेतों में ही उचित प्रबंधन किया जा सके.
उन्होंने कहा कि धान की कटाई के बाद गेहूं की बिजाई के लिए किसानों के पास बहुत कम समय बचता है. करीब 10 दिनों के भीतर खेतों से पराली हटाकर अगली फसल की तैयारी करनी होती है. ऐसे में अगर मशीनें और जरूरी संसाधन उपलब्ध नहीं होते तो किसान के सामने मुश्किल खड़ी हो जाती है.
सतनाम सिंह ने सरकार से मांग की कि किसानों को पराली प्रबंधन के लिए 5,000 रुपये प्रति एकड़ आर्थिक सहायता दी जाए, ताकि इस समस्या का समाधान निकाला जा सके. उनका कहना है कि डीजल की कीमत करीब 100 रुपये प्रति लीटर होने के कारण मशीनों और अन्य कृषि साधनों से पराली का प्रबंधन करना किसानों के लिए महंगा पड़ता है.
वहीं, दूसरी ओर जिला प्रशासन का दावा है कि पराली जलाने की घटनाओं को रोकने के लिए सभी जरूरी प्रबंध किए गए हैं. डिप्टी कमिश्नर संगरूर के अनुसार, खेतों पर निगरानी रखी जा रही है और ड्रोन के माध्यम से भी नजर रखी जा रही है.
लेकिन खेतों में लगातार सामने आ रही आग की तस्वीरों ने प्रशासन के दावों पर सवाल खड़े कर दिए हैं. किसान एक तरफ खुद को अन्नदाता बताते हुए पराली प्रबंधन के लिए पर्याप्त संसाधन और आर्थिक सहायता की मांग कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ उनका आरोप है कि ड्रोन के जरिए निगरानी के नाम पर किसानों पर जुर्माने लगाए जा रहे हैं.
अब बड़ा सवाल यह है कि जब प्रशासन पराली जलाने की घटनाओं को रोकने के लिए पुख्ता इंतजाम होने का दावा कर रहा है, तो फिर संगरूर के खेतों में लगातार आग क्यों दिखाई दे रही है? आखिर पराली प्रबंधन का ऐसा स्थायी समाधान कब निकलेगा, जिससे पर्यावरण भी सुरक्षित रहे और किसानों को भी आर्थिक नुकसान न उठाना पड़े?(कुलवीर सिंह की रिपोर्ट)
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