धान का पौधा 4 महीने में बढ़कर 2.9 मीटर यानी 9.6 फीट का हो गया. नागालैंड में धान की सबसे लंबी किस्म के पौधे को पाया गया है, जिसके बाद यह मामला चर्चा में बना हुआ है. जबकि, एक्सपर्ट मानना है कि अधिक लंबी किस्म के धान की खेती करना काफी मुश्किल है. क्योंकि, लंबे पौधे हल्की हवा के झोंके में गिर जाते हैं और फसल बर्बाद होती है. इससे किसान की लागत बढ़ेगी पर उपज घट जाएगी. इस स्थिति में किसान की आय बढ़ाने के उद्देश्य को भी बट्टा लगेगा. वैसे भी कृषि वैज्ञानिक बौनी धान किस्मों को विकसित कर रहे हैं.
नागालैंड के पूर्व मंत्री जैकब झिमोमी के आवास पर सबसे लंबी धान पाई गई है. उन्होंने स्थानीय समाचार संस्थान नागालैंड पोस्ट को बताया कि उन्हें खेती करने का शौक है. इसलिए वह धान ओरिजा सातिवा (oryza sativa) बीज लेकर आए थे. बिनी किसी उर्वरक का इस्तेमाल किए बिना धान का पौधा 4 महीने में बढ़कर 2.9 मीटर यानी 9.6 फीट का हो गया. कृषि विभाग की टीम ने पौधे के सैंपल कलेक्ट कर उसके ओरिजिन समेत अन्य पहलुओं का पता लगाएंगे.
धान की सबसे लंबी किस्म ओरिजा सातिवा के पौधे को सबसे पहले 2005 में महाराष्ट्र के कोल्हापुर में किसान तानाजी निकम ने उगाया था. यहां बता दें कि नागालैंड के पैडी मैन के नाम से मशहूर मेल्हिते केन्ये को 1998 में सबसे लंबी 2.5 मीटर यानी 8.5 फीट की धान किस्म को उगाया था. इसके लिए उन्हें गवर्नर गोल्ड मेडल से सम्मानित किया गया था. पैडी मैन मेल्हिते केन्ये का नाम गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड में भी दर्ज है.
धान की लंबी किस्मों के पौधे पाए जाने और उगाने को लेकर एक्सपर्ट का मानना है कि यह केवल रिकॉर्ड बनाने के लिए किया जाता है. क्योंकि, लंबा पौधा खेती के लिए ठीक नहीं है. क्योंकि, लंबा पौधा होने से हल्के हवा के झोंके में गिरने संभावना सबसे ज्यादा होती है. जबकि, धान खेत में पानी भी खूब रहता है, जिससे गिरा हुआ पौधा लगभग पूरी तरह से मिट्टी में दबकर उठने लायक हालत में नहीं रह सकता है. यह स्थिति उसमें बाली के विकास को रोक सकती है, जिससे धान का बीज तो हल्का होगा ही उपज भी तेजी से घट जाएगी. ऐसे किसानों की लागत ज्यादा आएगी और उपज कम होने से उन्हें भारी नुकसान भी उठाना पड़ सकता है.
लंबा पौधा हवा में गिरनी की समस्या दुनियाभर में वैज्ञानिक के लिए बड़ी चुनौती रही है, जिसकी वजह से कृषि वैज्ञानिक धान की छोटी किस्मों यानी बौनी किस्मों को विकसित करने में जुटे हैं. भारत में हरित क्रांति से पहले भी जमकर धान की खेती होती थी, लेकिन पौधों की लंबाई अधिक होने से फसल को नुकसान ज्यादा होता था. इसलिए भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान पूसा धान की बौनी प्रजातियों के बीजों का विकास काफी समय से कर रहा है.
आमतौर पर धान के पौधे की सही लंबाई 100 सेंटीमीटर से 105 सेंटीमीटर मानी जाती है. लेकिन, अधिक पैदावार हासिल करने के लिए इससे भी छोटी किस्मों को भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (ICAR) विकसित कर रहा है. एग्रोकेमिकल कंपनी बायर ने सबसे कम लंबाई 75 से 80 सेंटीमीटर वाली अराइज 6444 गोल्ड हाइब्रिड धान को विकसित किया है. आईसीएआर पूसा ने पूसा बासमती PB-1401, पूसा बासमती PB-1847, पूसा बासमती PB-1509, पूसा बासमती PB-1886, पूसा बासमती PB 1728 भी कम लंबाई वाली किस्में विकसित की हैं.
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