फसल विविधीकरण (AI- तस्वीर)हरियाणा में फसल विविधीकरण और जल संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए कृषि और किसान कल्याण विभाग ने एक बड़ी पहल की है. इसके तहत ‘मेरा पानी मेरी विरासत’ (MPMV) योजना को और अधिक प्रभावी तरीके से लागू किया जा रहा है. इस योजना का मुख्य उद्देश्य राज्य में धान की खेती के बढ़ते दबाव को कम करना और किसानों को वैकल्पिक फसलों की ओर प्रेरित करना है. विभाग ने वर्ष 2026-27 के लिए बड़ा लक्ष्य तय करते हुए करीब 1 लाख एकड़ भूमि को इस योजना के अंतर्गत शामिल करने की योजना बनाई है.
इसके तहत उन किसानों को आर्थिक सहायता दी जाएगी जो धान की जगह कम पानी वाली फसलों जैसे दालें, तिलहन और कपास की खेती करेंगे. किसानों को प्रति एकड़ 8,000 रुपये का प्रोत्साहन दिया जाएगा. इसके अलावा, चयनित फसलों की खेती करने वाले किसानों को प्रति एकड़ 2,000 रुपये का अतिरिक्त बोनस भी मिलेगा. यह पूरी राशि डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) के माध्यम से एक ही किस्त में सीधे किसानों के बैंक खातों में भेजी जाएगी.
सरकार का मानना है कि इस योजना से न केवल भूजल स्तर में सुधार होगा, बल्कि किसानों की आय में भी स्थिरता आएगी. लगातार धान की खेती से जमीन और पानी पर पड़ रहे दबाव को देखते हुए यह कदम बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
इस योजना के तहत 22 जिलों के लिए अलग-अलग लक्ष्य तय किए गए हैं. सबसे अधिक लक्ष्य सिरसा जिले को दिया गया है, जहां 18,000 एकड़ भूमि पर वैकल्पिक फसलें लगाने की योजना है. इसके बाद यमुनानगर को 12,000 एकड़, जींद को 11,500 एकड़, फतेहाबाद को 9,000 एकड़, कैथल को 7,200 एकड़, करनाल को 6,400 एकड़ और हिसार को 6,000 एकड़ का लक्ष्य मिला है. अंबाला जिले के लिए 5,000 एकड़, पलवल के लिए 4,000 एकड़, पानीपत के लिए 3,500 एकड़, हांसी के लिए 2,800 एकड़ और सोनीपत के लिए 2,600 एकड़ का लक्ष्य निर्धारित किया गया है. अन्य जिलों में भी इसी तरह के संतुलित लक्ष्य तय किए गए हैं ताकि पूरे राज्य में फसल विविधीकरण को बढ़ावा दिया जा सके.
अंबाला के कृषि उप निदेशक डॉ. जसविंदर सैनी ने बताया कि विभाग ने सभी जिलों को लक्ष्य जारी कर दिए हैं और किसानों को लगातार जागरूक किया जा रहा है. उन्होंने कहा कि किसानों को वैकल्पिक फसलों की ओर प्रेरित करना इस योजना का मुख्य उद्देश्य है. इससे न केवल पानी की बचत होगी बल्कि खेती को भी अधिक टिकाऊ बनाया जा सकेगा. ऐसे में ‘मेरा पानी मेरी विरासत’ योजना हरियाणा में कृषि संरचना को बदलने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो रही है, जिससे आने वाले समय में पर्यावरण और किसानों दोनों को लाभ मिलने की उम्मीद है.
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