भारत में बायोफर्टिलाइजर का बाजार नरमपीएम मोदी ने देश में नेचुरल फार्मिंग को तेजी से अपनाने की अपील की है. केमिकल खाद के इस्तेमाल को 50 परसेंट तक घटाना है ताकि भविष्य में ईरान युद्ध जैसा कोई संकट हमारी खेती को बंधक ना बनाए. लेकिन क्या खाद कंपनियां इस अपील को मानेंगी? कतई नहीं. अगर ये कंपनियां रूस यूक्रेन युद्ध से कुछ सबक सीख गई होतीं तो आज किसानों को ऐसे बुरे दिन नहीं देखने पड़ते. रूस की लड़ाई के बाद भी खाद का संकट हुआ था, मगर उस दौर में भी बायोफर्टिलाइजर के इस्तेमाल को गंभीरता से नहीं लिया गया. आज हालत ये है कि देश में बायोफर्टिलाइजर ग्रोथ 8 परसेंट भी नहीं है जबकि भारत से बहुत छोटा देश ब्राजील 15 परसेंट ग्रोथ रेट हासिल कर चुका है. वह भी सोयाबीन, मक्का, गन्ना और पोल्ट्री के वेस्ट से.
भारत में ये सभी चीजें ब्राजील से कई गुना ज्यादा होती हैं, लेकिन बायोफर्टिलाइजर ग्रोथ रेट में हम उसका आधा भी नहीं हैं. वजह है, केमिकल खाद में होने वाली बेहिसाब लूट और जमाखोरी जो पीएम मोदी की नेचुरल फार्मिंग मिशन में पलीता लगा रही हैं.
बड़ा सवाल है कि बायोफर्टिलाइजर अब नहीं बढ़ाएंगे तो कब बढ़ाएंगे? दुनिया में खाद के लिए मचे हाहाकार के बीच हम इसके विकल्पों पर अभी गौर नहीं करेंगे, तो कब करेंगे? क्या सरकार और खाद कंपनियों को ईरान युद्ध को एक बड़े अवसर के रूप में नहीं लेना चाहिए और केमिकल खादों के निर्माण और इस्तेमाल को गिराना चाहिए. विशेषज्ञों की मानें तो बायोफर्टिलाइजर का बाजार और प्रयोग इतना भी मुश्किल नहीं कि खेती घाटे में चली जाएगी और बिजनेस चौपट हो जाएगा. शुरू में थोड़ी चुनौती जरूर आएगी, लेकिन बाद में कम खर्चे में अधिक मुनाफे का रास्ता खुल जाएगा. मिट्टी की सेहत सुधरने के साथ ही किसान और बायोफर्टिलाइजर कंपनियां अपना झोली भरेंगी.
लेकिन यह तब होगा जब केमिकल खाद कंपनियां आगे आएंगी और बायोफर्टिलाइजर को बढ़ावा देंगी. अभी तक इसमें बड़ी ढिलाई देखी जा रही है, तभी इसका ग्रोथ रेट 8 परसेंट के आसपास अटका हुआ है. बायोफर्टिलाइजर के मौजूदा मार्केट वैल्यू की बात करें तो यह 1300 करोड़ से 3,000 करोड़ रुपये तक सिमटा हुआ है. रिपोर्ट के मुताबिक, 8 परसेंट की मौजूदा ग्रोथ रेट 2030-32 तक 14 परसेंट तक जा सकती है.
दूसरी ओर, केमिकल खादों का घरेलू मार्केट वैल्यू 4 लाख करोड़ रुपये से अधिक का है. जिस विपरीत समय में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने, रासायनिक खादों के अंधे प्रयोग को घटाने की अपील की है, उस वक्त देश में नाइट्रोजन पोटाश या एनपीके खादों का इस्तेमाल 14 परसेंट से अधिक बढ़ा है. पोटाश की खपत 28 फीसद से अधिक पहुंच चुकी है. सरकार भले ही 2030 तक केमिकल खादों के इस्तेमाल में 25 परसेंट तक कमी लाने की अपील कर रही है, लेकिन धरातल पर यह अपील कारगर होती नहीं दिख रही है.
हालांकि कुछ राज्य ऐसे हैं जो इन तमाम नकारात्मक पहलुओं के बीच उम्मीद की बड़ी किरण जगा रहे हैं. देश के 4 राज्य ऐसे हैं जहां बायोफर्टिलाइजर का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है और किसान जागरूक हो रहे हैं. तमिलनाडु में बायोफर्टिलाइजर का बाजार 14 से 50 परसेंट तक बढ़ रहा है जबकि गुजरात में यह 14 से 31 परसेंट, महाराष्ट्र में 12 से 13 परसेंट और आंध्र प्रदेश में 11 परसेंट की ग्रोथ है. यह विकास दर छोटी भले लगे, लेकिन इसके दूरगामी परिणाम होंगे. किसानों की इस कोशिश से केमिकल खाद कंपनियों को अपना रुख बदलना होगा और केमिकल के बदले प्राकृतिक स्रोतों पर ध्यान लगाना होगा. इस काम में देर जरूर है, मगर अंधेर नहीं.
क्या केमिकल खाद कंपनियां ही देश में बायोफर्टिलाइजर निर्माण का अलख जगाएंगी? उनके बिना क्या देश में प्राकृतिक खेती का कोई भविष्य नहीं है? ऐसा नहीं है. सरकार ने बायोफर्टिलाइजर के क्षेत्र में कई बड़ी योजनाएं शुरू की हैं जिनकी मदद से कोई अदना व्यक्ति या किसान खेती और समाज में बड़ा बदलाव ला सकता है. उदाहरण के लिए 'कैपिटल इन्वेस्टमेंट सब्सिडी स्कीम' यानी CISS को ही लें. यह ऐसी योजना में जिसमें बायोफर्टिलाइजर यूनिट लगाने के लिए 100 परसेंट तक सब्सिडी दी जाती है. इसकी अधिकतम लिमिट 160 लाख रुपये प्रति यूनिट तक है. इस योजना के तहत कोई भी व्यक्ति सरकारी शर्तों को मानते हुए 200 टन सालाना उत्पादन का बायोफर्टिलाइजर यूनिट लगा सकता है.
प्राइवेट एजेंसियों और नए उद्यमियों के लिए भी सरकार ने दरवाजे खोल दिए हैं. कोई व्यक्ति नया बायोफर्टिलाइजर यूनिट शुरू करना चाहता है तो उसे कुल खर्च का 25 परसेंट तक सब्सिडी मिल सकती है जिसकी राशि 40 लाख रुपये तक होगी. इसके अलावा गोबरधन स्कीम से लेकर मार्केट डेवलपमेंट असिस्टेंस स्कीम जैसी कई योजनाएं चलाई जा रही हैं जिनका फायदा उठाकर बायोफर्टिलाइजर बनाया और बेचा जा सकता है. इससे मिट्टी की सेहत तो सुधरेगी ही, किसान का पैसा बचेगा और अनाज-सब्जी के जरिये शरीर में पैदा होने वाले कैंसर भागेगा. शुद्ध मिट्टी से शरीर निरोगी होगा, काया सुदृढ़ होगी और देश का पैसा भी देश में ही खर्च होगा.
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