बायोफर्टिलाइज से किसानांं का खर्च भी कम होगा और उत्पादन बढ़ेगा- फोटो किसान तकखरीफनामा: खेतों में रासायनिक खादों का इस्तेमाल बढ़ा है. इससे खेतों की उर्वरक क्षमता भी प्रभावित हुई है. कुल मिलाकर रासायनिक खादों के प्रयोग से खेत की मिट्टी की सेहत बिगड़ रही है. ऐसे में खेतों से उत्पादन भी कम होता है, लेकिन किसान अधिक उत्पादन के लिए मिट्टी की सेहत सुधारने के बजाय अधिक उर्वरकों का प्रयोग करने लगते हैं. इसका परिणाम यह हो रहा की खेती में लागत खर्च दिन पर दिन बढ़ रहा हैं. विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर इन सब परेशानियों से निजात पाना है तो खेत की मिट्टी की सेहत सुधारने वाले जैव उर्वरकों यानी बायोफर्टिलाइजर के इस्तेमाल पर जोर देना होगा. खरीफनामा की इस कड़ी में खेतों की सेहत सुधारने के लिए बायोफर्टिलाइजर की भूमिका की पूरी पड़ताल...
कृषि विज्ञान केन्द्र जमुई बिहार के कृषि वैज्ञानिक डॉ प्रमोद कुमार सिंह ने बताया कि बायोफर्टिलाइजर एक जीवाणु खाद है, जिसमें मौजूद लाभकारी सूक्ष्म जीवाणु वायुमण्डल में पहले से उपस्थित नाइट्रोजन को अवशोषित कर और मिट्टी में मौजूद अघुलनशील फास्फोरस को पानी में घुलनशील बनाकर पौधों को देते हैं, जिससे पौधो को नाइट्रोजन और फास्फोरस की जरूरतों को पूरा किया जा सकता है. अगर नाइट्रोजन की पूर्ति करने वाला जैव उर्वरक राइजोबियम कल्चर,एजेक्टोबैक्टर का इस्तेमाल करते हैं, तो इसके प्रयोग से 30 से 40 किलो ग्राम नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर खेतों को मिल जाती है और फसलों की उपज में लगभग 10 से 20 प्रतिशत तक बढ़ोत्तरी देखी गई है.
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इसी तरह अगर किसान फास्फोबैक्टीरिया और माइकोराइजा बायोफर्टिलाइजर का इस्तेमाल करते हैं. वे खेतों में 20 से 30 प्रतिशत फास्फोरस की मौजूदगी बढ़ा सकते है. इन बायोफर्टिलाइजर के इस्तेमाल से एक तरफ किसान की फसल उत्पादन लागत घटती है. वहीं दूसरी तरफ उनकी खेतों की मृदा संरचना बेहतर होती है .
किसान तक से बातचीत में डॉ प्रमोद कुमार सिंह ने कहा कि दलहनी फसलों में नाइट्रोजन की पूर्ति के लिए बायोफर्टिलाइर राईजोबियम कल्चर (एक तरह के बैक्टिरिया) का इस्तेमाल बीजों के उपचारऔर मृदा उपचार के रुप में किया जाता है. खेतों में बीजों के बुवाई के बाद राइजोबियम के जीवाणु पौधों के जड़ों में प्रवेश करके छोटी-छोटी गांठें बना लेते है और इन गांठों में जीवाणु अपनी संख्या बढ़ाते हुए प्रकृति में मौजूद नाइट्रोजन को वायुमण्डल से शोषित करके उसे पोषक तत्वों में परिवर्तितकर पौधों को उपलब्ध कराते हैं.
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राइजोबिएमकल्चर दलहनी फसलों की जड़ों में गांठे बनाता है, जिससे जमीन में नाइट्रोजन का स्थितिकरण होता है. राइजोबिएम दलहनी फसलों में नाइट्रोजन की मात्रा को 70 प्रतिशत तक पूरा करता है. इसका इस्तेमाल दहलनी फसलों जैसे अरहर, चना, मूंग, उड़द, मटर, मसूर,सोयाबीन, मूंगफली व सेम इत्यादि में किया जाता है
डॉ प्रमोद के अनुसार खाद्यान्न फसलों में नाइट्रोजन की पूर्ति के लिए एजोटोबैक्टर का इस्तेमाल किया जाता हैं. इसके जीवाणु पौधों के जड़ क्षेत्र में स्वतंत्र रहते हुए नाइट्रोजन का स्थिरीकरण कर पौधों को नाइट्रोजन उपलब्ध कराते हैं.इसके अलावा वायुमंडल से बहुत से एसिड हार्मोन्स का उत्सर्जन करते हैं, जिससे बीजों का जमाव और पौधों के बढ़वार पर अच्छा प्रभाव पड़ता है. इस बायोफर्टिलाइजर का इस्तेमाल सभी प्रकार अनाज वाली फसले जैसे, धान, गेहूं, जौ, जई, मक्का और बाजरा के आलवा तिलहनी फसलों जैसे सरसों, और सूरजमूखी में इस्तेमाल किया जाता है.
कृषि वैज्ञानिक कहना था कि एजोस्पाइलम कल्चर फसलों को नाइट्रोजन पूर्ति करने वाला एक बायो फर्टिलाइजर है, जिसके जीवाणु एजोबैक्टर के जीवाणु की तरह कार्य करते हैं. यह अधिक नमी में उगाए जाने वाली फसलों के लिए काफी लाभकारी होता है. विभिन्न रिसर्च में पाया गया है कि अगर धान की रोपाई के पहले एजोस्पाइलम का इस्तेमाल किया जाता है, तो धान की फसल की अच्छी बढ़वार होती है और उपज में भी बढ़ोत्तरी होती है. एजोस्पाइलम का इस्तेमाल धान, मक्का, गन्ना सहित छोटे अनाज वाली फसलों में करना काफी लाभकारी पाया गया है. अगर एजोस्पाइलम कल्चर बीज उपचार करते हैं तो प्रति किलो बीज के लिए 5 से 6 ग्राम एजोस्पाइलम कल्चर की जरुरत पड़ती है. इसके प्रयोग से बीजों के अंकुरण क्षमता सुधार होता है और पौधे की जड़े मजबूत होती है.
डॉ प्रमोद ने बताया कि फसलों की अच्छी बढ़वार के लिए नाइट्रोजन के बाद सबसे महत्वपूर्ण पोषक तत्व फास्फोरस है. इसके लिए रासायनिक उर्वरकों की जगह फास्फोरस घोलक जीवाणु का यानि पीएसबी कल्चर का इस्तेमाल किया जाता है. इस कल्चर के जीवाणु जमीन में मौजूद अघुलनशील फास्फोरस को घुलनशील अवस्था में बदल कर पौधों को उपल्बध कराते हैं. इसके इस्तेमाल से प्रति हेक्टयर 10 से 40 किलोग्राम फास्फोरस पौधों को मिल जाता है.पीएसबी कल्चर का इस्तेमाल बीजों के उपचार और मृदा उपचार के रुप में किया जाता है. इसके इस्तेमाल से पौधों की जड़ो और ग्रन्थियों में विकास होता है.
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