फल-सब्जियों में भी कीटनाशक का जहर! 70 हजार सैंपल की जांच में सामने आया बड़ा सच

फल-सब्जियों में भी कीटनाशक का जहर! 70 हजार सैंपल की जांच में सामने आया बड़ा सच

सरकार के मुताबिक 2023-26 के दौरान 23 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से फल-सब्जियों के 70,652 सैंपल जांचे गए. इनमें 2,223 सैंपल यानी 3.1 फीसदी में कीटनाशक अवशेष FSSAI की तय MRL सीमा से ज्यादा मिले. आखिर MRL क्या है, यह आंकड़ा कितना चिंताजनक है और फल-सब्जियों को लेकर उपभोक्ताओं को क्या समझना चाहिए? जानिए आसान भाषा में पूरी कहानी.

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फल-सब्जियों में भी कीटनाशक का जहर! 70 हजार सैंपल की जांच में सामने आया बड़ा सचकीटनाशक वाली सब्जियों का सच (फोटो - AI जेनरेटेड सांकेतिक तस्वीर)

फल और सब्जियां हमारी डेली डाइट का अहम हिस्सा हैं, लेकिन इन्हें लेकर अक्सर यह सवाल उठता है कि इनमें कीटनाशकों के अवशेष कितने हैं और क्या ये हमारी सेहत के लिए नुकसानदायक हो सकते हैं? सरकार ने लोकसभा में बताया है कि पिछले तीन साल में देशभर से जांचे गए फल और सब्जियों के 3.1 फीसदी सैंपल में कीटनाशक अवशेष तय सीमा से ज्यादा पाए गए. हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि बाजार में मिलने वाले हर फल और सब्जी में खतरनाक मात्रा में कीटनाशक मौजूद हैं. आइए आसान भाषा में जानते हैं कि पूरा मामला क्या है.

70 हजार से ज्यादा सैंपल की हुई जांच

केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मंगलवार को लोकसभा में बताया कि 2023-24 से 2025-26 के बीच 23 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से फल और सब्जियों के कुल 70,652 सैंपल लिए गए.

बिजनेस लाइन के मुताबिक इन सैंपल की जांच ‘Monitoring of Pesticide Residues at National Level’ यानी MPRNL परियोजना के तहत की गई. जांच में 2,223 सैंपल यानी करीब 3.1 फीसदी ऐसे पाए गए, जिनमें कीटनाशकों के अवशेष FSSAI की तय Maximum Residue Limit यानी MRL से ज्यादा थे. इसका सीधा मतलब है कि जांच किए गए हर 100 सैंपल में करीब 3 सैंपल ऐसे थे, जिनमें कीटनाशक की मात्रा तय सीमा से अधिक मिली.

पहले समझिए MRL क्या होता है?

अब सवाल है कि आखिर MRL यानी Maximum Residue Limit क्या है? जब किसान फसलों में कीटनाशकों का इस्तेमाल करते हैं तो उनका कुछ हिस्सा फल, सब्जियों या अनाज पर रह सकता है. फसल की कटाई के बाद भी इन रसायनों के बहुत छोटे अवशेष मौजूद रह सकते हैं.

इसीलिए खाद्य सुरक्षा से जुड़ी एजेंसियां वैज्ञानिक जांच के आधार पर एक अधिकतम सीमा तय करती हैं. इसे Maximum Residue Limit यानी MRL कहा जाता है. किसी खाद्य पदार्थ में कीटनाशक का अवशेष इस सीमा के भीतर है तो उसे तय मानकों के अनुसार स्वीकार्य माना जाता है. लेकिन अगर अवशेष MRL से ऊपर चला जाता है तो वह सैंपल निर्धारित खाद्य सुरक्षा मानक पर खरा नहीं उतरता. यही वजह है कि सरकार सिर्फ यह नहीं देखती कि किसी फल या सब्जी में कीटनाशक मौजूद है या नहीं, बल्कि यह भी देखती है कि उसकी मात्रा तय सुरक्षित सीमा के मुकाबले कितनी है.

3.1 फीसदी आंकड़े को ऐसे समझें

मान लीजिए किसी बाजार से 100 फल और सब्जियों के सैंपल जांच के लिए लिए गए. इनमें औसतन 3 सैंपल ऐसे हो सकते हैं जिनमें कीटनाशक अवशेष तय MRL से ज्यादा मिले. लेकिन इसका दूसरा पहलू भी समझना जरूरी है. 70,652 में से 68,429 सैंपल ऐसे थे जिनमें कीटनाशक अवशेष MRL से ज्यादा नहीं पाए गए. इसलिए 3.1 फीसदी का आंकड़ा यह नहीं बताता कि देश में बिकने वाले 3.1 फीसदी फल और सब्जियां जहरीली हैं. यह केवल उन सैंपल का आंकड़ा है, जिनमें जांच के दौरान कीटनाशक अवशेष निर्धारित सीमा से अधिक मिले.

सैंपल कहां से लिए जाते हैं?

सरकार के मुताबिक MPRNL परियोजना के तहत अलग-अलग जगहों से सैंपल लिए जाते हैं. इसमें बाजारों के अलावा जरूरत के हिसाब से खेत के स्तर यानी farm-gate से भी सैंपल लिए जा सकते हैं. सैंपल कहां से लिया गया, इसे रिकॉर्ड में रखने के लिए GPS लोकेशन भी दर्ज की जाती है. अगर सैंपल सीधे खेत से लिया जाता है तो उसकी खेती वाली जगह तक की जानकारी भी दर्ज की जाती है. इस व्यवस्था का फायदा यह है कि अगर किसी सैंपल में तय सीमा से ज्यादा कीटनाशक अवशेष मिलते हैं तो यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि वह सैंपल किस इलाके या उत्पादन क्षेत्र से आया था.

2005 से चल रही है कीटनाशक अवशेषों की निगरानी

फल और सब्जियों में कीटनाशक अवशेषों की निगरानी के लिए MPRNL परियोजना कोई नई व्यवस्था नहीं है. इसे 2005-06 में शुरू किया गया था. सरकार के अनुसार इस समय परियोजना के तहत 40 प्रयोगशालाएं काम कर रही हैं. इनमें पांच नई प्रयोगशालाएं भी शामिल हैं. यह व्यवस्था 22 राज्यों को कवर करती है और परियोजना को 2028-29 तक जारी रखने की मंजूरी दी गई है.

इसके अलावा 21 राज्यों में राज्य स्तर पर समितियां भी बनाई गई हैं. इनका उद्देश्य कीटनाशक अवशेषों की निगरानी के साथ किसानों और दूसरे संबंधित लोगों के बीच Good Agricultural Practices यानी अच्छी कृषि पद्धतियों और Integrated Pest Management यानी एकीकृत कीट प्रबंधन को बढ़ावा देना है.

किसानों के लिए इसका क्या मतलब है?

कीटनाशक फसलों को कीटों और बीमारियों से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. लेकिन इनका इस्तेमाल सही मात्रा और सही समय पर होना जरूरी है. अगर किसान जरूरत से ज्यादा कीटनाशक का इस्तेमाल करते हैं या फसल की कटाई से ठीक पहले उनका इस्तेमाल करते हैं, तो फसल में रासायनिक अवशेष अधिक रह सकते हैं.

इसीलिए सरकार का जोर अब सिर्फ कीटनाशकों के इस्तेमाल को रोकने पर नहीं, बल्कि सही दवा, सही मात्रा और सही समय पर इस्तेमाल करने पर भी है. एकीकृत कीट प्रबंधन जैसी तकनीकों में रासायनिक दवाओं पर निर्भरता कम करने के लिए जैविक और दूसरे तरीकों का भी इस्तेमाल किया जाता है.

क्या फल-सब्जियां खाना बंद कर दें?

नहीं. इस आंकड़े को देखकर फल और सब्जियां खाना बंद करने की जरूरत नहीं है. सरकार द्वारा जारी आंकड़ा जांच किए गए सैंपल में MRL से अधिक अवशेष मिलने की स्थिति बताता है. फल और सब्जियां संतुलित आहार का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं. घर पर इन्हें अच्छी तरह साफ करना और बहते पानी में धोना सामान्य तौर पर अपनाई जाने वाली अच्छी खाद्य स्वच्छता की आदत है.

हालांकि, केवल धोने से हर तरह के कीटनाशक अवशेष पूरी तरह खत्म हो जाएंगे, ऐसा मानना सही नहीं होगा. इसलिए लंबे समय में सबसे जरूरी कदम खेत से ही सुरक्षित और वैज्ञानिक तरीके से उत्पादन सुनिश्चित करना है.

भारत में फल-सब्जियों का कारोबार कितना बड़ा है?

सरकार ने लोकसभा में भारत के फल और सब्जी कारोबार से जुड़े आंकड़े भी साझा किए हैं. इनके मुताबिक भारत लगातार फल और सब्जियों का नेट एक्सपोर्टर रहा है, यानी भारत का निर्यात आयात से ज्यादा रहा है. 2016-17 में भारत ने करीब 2.45 अरब डॉलर के फल और सब्जियों का निर्यात किया था. 2025-26 में यह बढ़कर करीब 3.93 अरब डॉलर हो गया. इसी अवधि में निर्यात की मात्रा भी करीब 49.5 लाख टन से बढ़कर 58.2 लाख टन हो गई.

वहीं घरेलू खपत बढ़ने के साथ फल और सब्जियों का आयात भी बढ़ा है. 2016-17 में करीब 1.78 अरब डॉलर के फल और सब्जियों का आयात हुआ था, जो 2025-26 में बढ़कर करीब 3.82 अरब डॉलर हो गया. यानी भारत एक तरफ दुनिया को फल-सब्जियां बेच रहा है, वहीं घरेलू मांग पूरी करने के लिए कुछ मात्रा में आयात भी कर रहा है.

डिजिटल सर्वे से अब फसलों का अनुमान भी होगा ज्यादा पारदर्शी

लोकसभा में कृषि से जुड़ा एक और महत्वपूर्ण अपडेट सामने आया. सरकार Digital General Crop Estimation Survey यानी DGCES के जरिए फसल उत्पादन का अनुमान लगाने की प्रक्रिया को डिजिटल बना रही है.

इसकी शुरुआत खरीफ 2023-24 में 10 राज्यों के चुनिंदा जिलों में पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर हुई थी. इसके बाद रबी 2023-24 में इसे 22 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों तक बढ़ाया गया. फिलहाल यह व्यवस्था 23 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में लागू है. इसमें फसल कटाई प्रयोग यानी Crop Cutting Experiments की जानकारी मोबाइल ऐप के जरिए डिजिटल तरीके से दर्ज की जाती है. इसमें GPS लोकेशन, समय और फोटो जैसी जानकारी भी रिकॉर्ड होती है. इससे सरकार के पास फसल उत्पादन के आंकड़े जुटाने और उनकी निगरानी करने का काम पहले के मुकाबले ज्यादा पारदर्शी और तेज हो सकता है.

गन्ने से जुड़े ड्राफ्ट आदेश को सरकार ने वापस लिया

कृषि क्षेत्र से जुड़ी एक और खबर में सरकार ने Draft Sugarcane (Control) Order, 2026 को वापस ले लिया है. केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री रामनाथ ठाकुर ने लोकसभा में बताया कि इस ड्राफ्ट को 20 अप्रैल 2026 को जारी किया गया था और राज्यों तथा दूसरे हितधारकों से सुझाव मांगे गए थे. सरकार को मिले सुझावों और टिप्पणियों के बाद इस ड्राफ्ट पर दोबारा विचार करने की जरूरत महसूस हुई. इसके बाद इसे 29 मई 2026 को वापस ले लिया गया.

खाद्य तेलों के लिए भी घरेलू उत्पादन बढ़ाने की कोशिश

सरकार खाद्य तेलों में आयात पर निर्भरता कम करने के लिए National Mission on Edible Oils यानी NMEO चला रही है. इसके तहत NMEO-Oil Palm और NMEO-Oilseeds दो प्रमुख कार्यक्रम हैं. NMEO-Oil Palm की शुरुआत 2021-22 में हुई थी. इसका लक्ष्य 2021-22 से 2025-26 के बीच 6.5 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में ऑयल पाम की खेती लाना था. सरकार के मुताबिक इस मिशन के तहत 2021-22 से अब तक करीब 2.98 लाख हेक्टेयर क्षेत्र ऑयल पाम की खेती के तहत आया है.

ऑयल पाम एक बार लगाने के बाद तुरंत उत्पादन नहीं देता. इसे पूरी तरह उत्पादन में आने में करीब चार से पांच साल लगते हैं. इसलिए अभी मिशन के तहत लगाए गए काफी क्षेत्र में पूरा उत्पादन शुरू होना बाकी है.

रबर उत्पादन बढ़ा, लेकिन आयात पर भी निर्भरता

प्राकृतिक रबर के मामले में भी भारत घरेलू उत्पादन के साथ आयात पर निर्भर है. सरकार के आंकड़ों के मुताबिक 2025-26 में भारत ने करीब 9.05 लाख टन प्राकृतिक रबर का उत्पादन किया, जबकि करीब 4.59 लाख टन रबर का आयात हुआ. 2026-27 में जून तक के शुरुआती आंकड़ों के अनुसार भारत में करीब 1.49 लाख टन रबर का उत्पादन हुआ और करीब 1.14 लाख टन का आयात किया गया.

सरकार ने बताया कि प्राकृतिक रबर की कीमत मांग और आपूर्ति के आधार पर खुले बाजार में तय होती है. अंतरराष्ट्रीय कीमतों का असर भी घरेलू बाजार पर पड़ता है. केरल के कोट्टायम में RSS-4 ग्रेड प्राकृतिक रबर की औसत कीमत अप्रैल-जून 2026-27 के दौरान करीब ₹253.21 प्रति किलो रही, जबकि 2025-26 में यह औसत करीब ₹197.32 प्रति किलो थी.

पूरी तस्वीर एक नजर में समझें...

लोकसभा में सामने आए इन आंकड़ों से कृषि क्षेत्र की कई अहम तस्वीरें एक साथ दिखाई देती हैं. एक तरफ फल और सब्जियों के हजारों सैंपल की जांच के जरिए खाद्य सुरक्षा पर नजर रखी जा रही है, तो दूसरी तरफ किसानों के उत्पादन और फसल के आंकड़ों को डिजिटल बनाने की कोशिश हो रही है.

फल-सब्जियों का निर्यात लगातार बढ़ रहा है, लेकिन घरेलू मांग के कारण आयात भी बढ़ा है. खाद्य तेलों में आयात निर्भरता कम करने के लिए ऑयल पाम की खेती बढ़ाने पर जोर है, जबकि प्राकृतिक रबर में भारत अभी भी घरेलू उत्पादन के साथ आयात पर निर्भर है.

यानी कृषि क्षेत्र में तस्वीर सिर्फ उत्पादन बढ़ने की नहीं है. असली चुनौती सुरक्षित उत्पादन, किसानों की बेहतर आमदनी, घरेलू जरूरत पूरी करने और आयात पर निर्भरता कम करने के बीच संतुलन बनाने की है.

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