कार्बोसल्फान पर सरकार का शिकंजा!केंद्र सरकार खेती में इस्तेमाल होने वाले एक और कीटनाशक कार्बोसल्फान (Carbosulfan) के इस्तेमाल को सीमित करने पर विचार कर रही है. यह कीटनाशक धान, कपास, सब्जियों और बागवानी फसलों में कई तरह के कीटों को नियंत्रित करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है. सरकार इस पर अंतिम फैसला इसी महीने के अंत तक ले सकती है. खास बात यह है कि यह फैसला ऐसे समय में सामने आया है, जब सरकार पहले ही पैराक्वाट डाइक्लोराइड (Paraquat Dichloride) पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव रख चुकी है.
कार्बोसल्फान एक कीटनाशक है, जिसका इस्तेमाल फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले कीड़ों से बचाने के लिए किया जाता है. यह खास तौर पर धान, कपास, सब्जियों और कुछ दूसरी फसलों में पाए जाने वाले कीटों को नियंत्रित करने में काम आता है. यह कीड़ों पर संपर्क और उनके पेट के जरिए असर करता है. यानी जब कीट इस दवा के संपर्क में आता है या इसे खा लेता है, तो यह उसके शरीर पर असर डालता है.
भारत में एफएमसी इंडिया (FMC India) इसे ‘मार्शल’ (Marshal) ब्रांड नाम से बेचती है. इसमें 25 फीसदी कार्बोसल्फान होता है. कंपनी के मुताबिक, यह कई तरह के चूसने और काटने वाले कीटों को नियंत्रित करने में प्रभावी है. किसानों के बीच यह उत्पाद कई वर्षों से इस्तेमाल किया जा रहा है.
कार्बोसल्फान को सरकार की ओर से ‘अत्यधिक जहरीले’ (Highly Toxic) की श्रेणी में रखा गया है. इसके इस्तेमाल को सीमित करने का मामला केंद्रीय कीटनाशक बोर्ड एवं पंजीकरण समिति यानी CIB&RC की सिफारिश के बाद आगे बढ़ा है. पंजीकरण समिति की 29 जून को हुई बैठक में पैराक्वाट डाइक्लोराइड और कार्बोसल्फान से जुड़ी विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट पर चर्चा की गई. बैठक में इस मुद्दे पर विस्तार से विचार करने के बाद समिति ने अपनी सिफारिशें अलग से केंद्र सरकार को भेजने का फैसला किया. अब अंतिम निर्णय सरकार को लेना है.
अगर सरकार कार्बोसल्फान को ‘प्रतिबंधित श्रेणी’ में डालती है, तो किसानों के लिए इसका इस्तेमाल पहले की तरह पूरी तरह खुला नहीं रहेगा. सरकार इसके इस्तेमाल, बिक्री या किन फसलों में इसका प्रयोग किया जा सकता है, इस पर अलग-अलग तरह की शर्तें लगा सकती है.
अगर कार्बोसल्फान के इस्तेमाल पर पाबंदी या कड़े नियम लागू होते हैं, तो इसका सीधा असर उन किसानों पर पड़ सकता है जो अपनी फसलों में इसका इस्तेमाल करते हैं. अभी किसान इसे सामान्य तरीके से खरीदकर फसल में इस्तेमाल कर सकते हैं. लेकिन प्रतिबंधित श्रेणी में आने के बाद इसकी बिक्री और इस्तेमाल के लिए कुछ नियम बनाए जा सकते हैं.
हालांकि अभी यह साफ नहीं है कि सरकार किस तरह की पाबंदी लगाएगी. इसका फैसला केंद्र सरकार की अंतिम अधिसूचना के बाद ही स्पष्ट होगा. इसलिए फिलहाल किसानों को घबराने की जरूरत नहीं है, बल्कि सरकार के अंतिम फैसले का इंतजार करना होगा.
कार्बोसल्फान पर विचार ऐसे समय में हो रहा है, जब सरकार पैराक्वाट डाइक्लोराइड पर प्रतिबंध लगाने की प्रक्रिया पहले ही शुरू कर चुकी है. 14 जुलाई को केंद्र सरकार ने पैराक्वाट पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने का ड्राफ्ट आदेश जारी किया था. इस प्रस्ताव में पैराक्वाट के निर्माण, आयात, बिक्री और वितरण पर रोक लगाने की बात कही गई है. सरकार ने इसके पीछे इंसानों और जानवरों के लिए इसकी गंभीर विषाक्तता को प्रमुख कारण बताया है. इस प्रस्ताव पर लोगों और उद्योग से 12 अगस्त तक सुझाव और आपत्तियां मांगी गई थीं.
कार्बोसल्फान का मामला इससे थोड़ा अलग बताया जा रहा है. उद्योग से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, पैराक्वाट की तुलना में कार्बोसल्फान को लेकर स्वास्थ्य और जहरीलेपन से जुड़ी चिंता उतनी ज्यादा नहीं है. हालांकि, इसके इस्तेमाल और फसल में इसके अवशेष को लेकर दूसरे सवाल उठ रहे हैं.
कार्बोसल्फान का मुद्दा सिर्फ देश में इसके इस्तेमाल तक सीमित नहीं है. इसका संबंध भारत से होने वाले कृषि उत्पादों के निर्यात से भी है. खासकर यूरोपीय संघ यानी EU के बाजार में इसके अवशेष की सीमा काफी कम है.
उदाहरण के तौर पर जीरे जैसी फसल में कार्बोसल्फान के इस्तेमाल को लेकर विशेषज्ञों ने चिंता जताई है. यूरोपीय संघ में कार्बोसल्फान की अधिकतम अवशेष सीमा यानी MRL 0.01 मिलीग्राम प्रति किलोग्राम है. इसका मतलब है कि अगर किसी कृषि उत्पाद में इस कीटनाशक का अवशेष तय सीमा से ज्यादा पाया जाता है, तो उसके निर्यात में परेशानी हो सकती है.
यही वजह है कि विशेषज्ञों का मानना है कि कार्बोसल्फान के इस्तेमाल को लेकर सरकार का फैसला किसानों के साथ-साथ कृषि निर्यात के लिए भी महत्वपूर्ण हो सकता है.
भारत में खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण यानी FSSAI ने अलग-अलग फसलों के लिए कार्बोसल्फान की अलग-अलग अधिकतम अवशेष सीमा तय की है. चावल में यह सीमा 0.2 मिलीग्राम प्रति किलोग्राम, जबकि मिर्च में 2 मिलीग्राम प्रति किलोग्राम है. सूखी मिर्च के लिए यह सीमा 20 मिलीग्राम प्रति किलोग्राम बताई गई है.
वहीं, कई दूसरी फसलों के लिए कार्बोसल्फान की कोई अलग अवशेष सीमा तय नहीं है. इसी वजह से घरेलू नियमों और दूसरे देशों के नियमों के बीच अंतर भी किसानों और निर्यातकों के लिए चुनौती बन सकता है.
कार्बोसल्फान को रॉटरडैम कन्वेंशन के तहत शामिल किया गया है. यह एक अंतरराष्ट्रीय समझौता है, जिसका उद्देश्य खतरनाक रसायनों और कीटनाशकों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार में जानकारी और सावधानी सुनिश्चित करना है.
सूत्रों के मुताबिक, कार्बोसल्फान के इस कन्वेंशन में शामिल होने के बाद इसके मामले को विशेषज्ञ समिति के सामने भी रखा गया. इसका मतलब यह नहीं है कि भारत में इसका इस्तेमाल अपने आप बंद हो जाता है, लेकिन इसके आयात और अंतरराष्ट्रीय व्यापार को लेकर अतिरिक्त प्रक्रियाएं लागू हो सकती हैं.
कार्बोसल्फान को लेकर चर्चा के बीच एफएमसी इंडिया के कारोबार से जुड़ा एक बड़ा बदलाव भी सामने आया है. मई में FMC Corporation ने भारत में अपने कमर्शियल बिजनेस को Crystal Crop Protection को बेचने के लिए 252 मिलियन डॉलर के समझौते की घोषणा की थी.
इस सौदे के तहत क्रिस्टल क्रॉप प्रोटेक्शन भारत में FMC के क्रॉप प्रोटेक्शन कारोबार और उसके ब्रांड्स से जुड़े लाइसेंस हासिल करेगी. कंपनी को कुछ सक्रिय रसायनों और तैयार उत्पादों की सप्लाई के लिए भी प्राथमिकता मिलेगी.
ऐसे में कार्बोसल्फान पर सरकार का फैसला FMC के मौजूदा कारोबार और आगे इस उत्पाद के बाजार में बने रहने की स्थिति के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
फिलहाल कार्बोसल्फान पर कोई अंतिम प्रतिबंध नहीं लगाया गया है. केंद्र सरकार विशेषज्ञ समिति और CIB&RC की सिफारिशों को देखते हुए इस पर अंतिम फैसला करेगी. अगर इसे प्रतिबंधित श्रेणी में रखा जाता है, तो इसके इस्तेमाल और बिक्री को लेकर नए नियम सामने आ सकते हैं.
किसानों के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वे सरकार की अंतिम अधिसूचना का इंतजार करें और बिना कृषि विशेषज्ञ की सलाह के किसी भी कीटनाशक का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल न करें. फसल में कीटनाशक का गलत या अधिक इस्तेमाल न केवल उत्पादन और लागत को प्रभावित कर सकता है, बल्कि फसल के अवशेष और उसके निर्यात पर भी असर डाल सकता है.
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