केमिकल के जहर से मिट्टी को बचाने के लिए जीवाणु खाद का प्रयोग जरूरीपीएम मोदी ने इस बात पर जोर दिया कि हमारी खेती एक ऐसा जरिया बन चुकी है जहां बहुत बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा खर्च हो रही है, क्योंकि हमें हर साल विदेशों से महंगे उर्वरक आयात करने पड़ते हैं. इन रसायनों के अंधाधुंध इस्तेमाल से हमारी धरती मां की सेहत खराब हो रही है और खेत बंजर होने की कगार पर पहुंच गए हैं. उन्होंने आगाह किया कि अगर हमने आज अपनी मिट्टी को नहीं बचाया, तो आने वाले वक्त में फसलों की पैदावार ही खतरे में पड़ जाएगी. इसलिए यह बेहद जरूरी है कि हम रासायनिक खादों की खपत को घटाकर आधा 50 फीसदी कर दें और तेजी से नेचुरल फार्मिंग की तरफ कदम बढ़ाएं, ताकि देश का कीमती पैसा भी बचे और हमारी जमीन भी महफूज रहे.
आजादी के बाद आई हरित क्रांति ने यकीनन देश को अनाज के मामले में आत्मनिर्भर बनाया, लेकिन ज्यादा पैदावार की अंधी दौड़ में हमने खेतों में जरूरत से ज्यादा यूरिया, डीएपी और पोटाश झोंक दिया. इसका खौफनाक नतीजा यह हुआ कि मिट्टी की कुदरती ताकत खत्म होने लगी और अब उतनी ही फसल उगाने के लिए हर साल पहले से कहीं ज्यादा खाद डालनी पड़ती है. इस चक्रव्यूह की वजह से किसानों की खेती की लागत लगातार बढ़ रही है और उनका मुनाफा सिकुड़ता जा रहा है. अगर हमने आज अपनी जमीन को बचाने के लिए कड़े कदम नहीं उठाए, तो आने वाले वक्त में हमारी फसलों और खाद्य सुरक्षा पर बहुत बड़ा खतरा मंडराने लगेगा.
भारत कृषि प्रधान देश होने के बावजूद खाद और उसे बनाने के कच्चे माल के लिए बहुत बड़े पैमाने पर दूसरे देशों पर निर्भर है. हम हर साल अल्जीरिया, ओमान, रूस, सऊदी अरब, चीन, कतर और अमेरिका जैसे दर्जनों देशों से यूरिया, डीएपी, एमओपी और एनपीके का आयात करते हैं.
आंकड़ों के मुताबिक, सिर्फ वित्त वर्ष 2024-25 में ही भारत ने करीब 56.47 लाख टन यूरिया, 45.69 लाख टन डीएपी, 35.41 लाख टन एमओपी और 22.72 लाख टन एनपीके बाहर से मंगाया. साल 2024-25 में तो इस आयात पर रिकॉर्ड करीबन 86,500 करोड़ रुपये से अधिक खर्च हुए थे. साल 2025-26 में इससे अधिक पहुंचने का अनुमान है. जब भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे माल या गैस की कीमतें बढ़ती हैं, तो देश में खाद की किल्लत हो जाती है और किसानों को कतारों में खड़ा होना पड़ता है. इसलिए रासायनिक खादों की खपत घटाकर हम न सिर्फ अपनी मिट्टी बचा सकते हैं, बल्कि देश की कीमती विदेशी मुद्रा भी महफूज रख सकते हैं.
खेती को दोबारा खुशहाल बनाने के लिए हमें खाद के बुनियादी गणित को समझना होगा, जिसे मुख्य रूप से तीन हिस्सों में बांटा जाता है. पहली है रासायनिक खाद यूरिया, डीएपी, एसएसपी, जो फैक्टरियों में बनती है और पौधों को तुरंत ताकत देती है, लेकिन मिट्टी को बेजान कर देती है. दूसरी है जैविक खाद जैसे गोबर की खाद, कम्पोस्ट, वर्मी कम्पोस्ट और हरी खाद, जो मिट्टी में कार्बन की मात्रा बढ़ाकर उसकी गुणवत्ता में सुधार करती है. तीसरी और सबसे कमाल की चीज है जैव उर्वरक जिन्हें हम 'जीवाणु खाद' भी कहते हैं. इनमें एजोटोबैक्टर, राइजोबियम और नीली-हरी शैवाल जैसे जिंदा और मददगार सूक्ष्म जीव होते हैं, जो प्राकृतिक तरीके से हवा की नाइट्रोजन को मिट्टी में घोलते हैं और मिट्टी में जमे पड़े फॉस्फोरस और लोहे को पौधों के सोखने लायक बनाते हैं. असल में मिट्टी कोई बेजान चीज नहीं बल्कि एक जीवंत प्रणाली है, जिसमें जैविक और रासायनिक गुण होते हैं. रासायनिक खादों के ज्यादा इस्तेमाल से मिट्टी के ये मददगार जीवाणु मर जाते हैं, जिससे जमीन बीमार हो जाती है.
अगर हमें फसलों की पैदावार भी कम नहीं करनी है और जमीन को भी बचाना है, तो हमें 'समेकित पोषण प्रबंधन' (Integrated Nutrient Management) के रास्ते पर चलना होगा. यह एक ऐसा बेहतरीन और वैज्ञानिक तरीका है जिसमें रासायनिक, जैविक और जैव उर्वरकों का एक तयशुदा और संतुलित अनुपात में तालमेल बिठाकर इस्तेमाल किया जाता है. कृषि वैज्ञानिकों के मुताबिक, फसलों की जरूरत के हिसाब से जैविक, कार्बनिक और रासायनिक खादों का इस्तेमाल 1:2:2 के अनुपात में करना सबसे बेहतर माना जाता है.
जब हम खेतों में प्राकृतिक और जैविक खादों का इस्तेमाल बढ़ाते हैं, तो मिट्टी को न सिर्फ जरूरी पोषक तत्व मिलते हैं बल्कि भरपूर कार्बन भी मिलता है. यह कार्बन मिट्टी में मौजूद उन सूक्ष्म जीवों के लिए खुराक और ऊर्जा का जरिया बनता है जो जमीन को उपजाऊ बनाए रखते हैं. जैव उर्वरक पर्यावरण के पूरी तरह अनुकूल, बेहद सस्ते और बेहद असरदार होते हैं, जो मिट्टी की कुदरती खूबियों को बिना नुकसान पहुंचाए पौधों को भरपूर पोषण देते हैं. दूसरी तरफ हम 50 फीसदी कम करने आयात कम कर सकते हैं.
प्रधानमंत्री ने रासायनिक उर्वरकों के इस्तेमाल को 50 प्रतिशत तक घटाने का जो लक्ष्य दिया है, उसे हासिल करने के लिए हमारे सरकारी तंत्र को अपनी रफ्तार और तैयारी दोनों को कई गुना बढ़ाना होगा. हालांकि देश में मिट्टी की जांच के लिए सॉइल हेल्थ कार्ड जैसी योजनाएं चल रही हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि ब्लॉक और जिला स्तर पर आज भी बुनियादी ढांचे और कृषि विशेषज्ञों की भारी कमी है.
सरकार को सबसे पहले हर गांव तक मिट्टी जांचने की आधुनिक प्रयोगशालाएं पहुंचानी होंगी ताकि किसान को मालूम हो कि उसके खेत को असल में किस चीज की जरूरत है. इसके साथ ही, जैविक खादों और जैव उर्वरकों यानी बायोफर्टिलाइजर्स के बड़े पैमाने पर उत्पादन और उनकी सुगम सप्लाई चेन के लिए सरकारी कंपनियों और सहकारी समितियों को युद्धस्तर पर काम करना होगा. जब तक बाजारों में रासायनिक खादों के मुकाबले जैविक और जीवाणु खादें आसानी से और कम कीमत पर उपलब्ध नहीं होंगी, तब तक इस व्यवस्था को पूरी तरह बदलना मुमकिन नहीं होगा.
इस बड़े बदलाव को अमली जामा पहनाने के लिए किसानों का भरोसा जीतना और उन्हें मानसिक रूप से तैयार करना सबसे जरूरी कदम है. आम किसान के मन में यह खौफ बैठा हुआ है कि अगर उसने रासायनिक खाद कम कर दी, तो उसकी फसल बर्बाद हो जाएगी और पैदावार घट जाएगी. इस डर को दूर करने के लिए कृषि विभाग और किसान विज्ञान केंद्रों को हर पंचायत में 'मॉडल फार्म' यानी प्रदर्शन खेत तैयार करने चाहिए, जहां समेकित पोषण प्रबंधन के जरिए बिना किसी नुकसान के अच्छी फसल उगाकर दिखाई जा सके.
किसानों को यह समझाना होगा कि शुरुआत में रासायनिक खाद को एकाएक बंद नहीं करना है, बल्कि धीरे-धीरे उसकी मात्रा आधी करनी है और साथ में जैव उर्वरकों का इस्तेमाल बढ़ाना है. जब किसान अपनी आंखों से देखेगा कि कम लागत में भी उतनी ही शानदार उपज मिल रही है और जमीन की सेहत भी सुधर रही है, तो वह खुद-ब-खुद इस मुहिम का हिस्सा बन जाएगा. यही वह रास्ता है जिससे हमारी धरती मां भी महफूज रहेगी, देश का पैसा भी बचेगा और किसानों की तकदीर भी बदलेगी.
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