Weed control: फसल के साइलेंट किलर, खरपतवारों से अरबों की लूट रोकने का क्या है पक्का इलाज?

Weed control: फसल के साइलेंट किलर, खरपतवारों से अरबों की लूट रोकने का क्या है पक्का इलाज?

भारत के खेतों में खरपतवार एक ऐसा अदृश्य दुश्मन है जो हर साल फसलों को चट कर देश को अरबों रुपये की भारी चपत लगा रहा है. यह बिन बुलाया मेहमान चुपके से जमीन की पूरी ताकत खींच लेता है, जिससे अकेले धान, गेहूं और सोयाबीन जैसी मुख्य फसलों में किसानों की गाढ़ी कमाई लुट जाती है. इस बड़े नुकसान से बचने का सबसे लाजवाब और पक्का इलाज 'फसल चक्र' अपनाना, गर्मी की गहरी जुताई करना और समय पर निराई-गुड़ाई जैसे देसी तरीके हैं. केमिकल या खरपतवारनाशी रसायनों का इस्तेमाल मिट्टी की सेहत के लिए हमेशा आखिरी उपाय के रूप में ही करना चाहिए.

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Weed control: फसल के साइलेंट किलर, खरपतवारों से अरबों की लूट रोकने का क्या है पक्का इलाज? फसलों के दुश्मन खरपतवार

किसान रात-दिन मेहनत करके, कर्ज लेकर अपने खेतों में महंगी खाद और पानी डालते हैं ताकि फसल अच्छी हो. लेकिन क्या आप जानते हैं कि एक ऐसा छिपा हुआ दुश्मन हमारे खेतों में बैठा है जो चुपके से इस पूरी ताकत को खुद चट कर जाता है? इसे हम 'खरपतवार' यानी फसलों के बीच उगने वाले अनचाहे पौधे कहते हैं. एक बड़े वैज्ञानिक शोध के मुताबिक, भारत में केवल इन खरपतवारों के कारण हर साल किसानों को लगभग 91,000 करोड़ रुपये का सीधा आर्थिक नुकसान होता है. यह आंकड़ा इतना बड़ा है कि हमारी सोच से भी परे है.

अगर अलग-अलग मुख्य फसलों की बात करें, तो अकेले धान की फसल में 36,000 करोड़, गेहूं में 28,000 करोड़ और सोयाबीन में 13,000  करोड़ रुपये से ज्यादा का अनाज सिर्फ इन बिन बुलाए पौधों की वजह से बर्बाद हो जाता है. यह ऐसा अदृश्य नुकसान है जो सीधे किसान की जेब पर डाका डालता है, क्योंकि ये खरपतार जमीन से 47% नाइट्रोजन, 42% फास्फोरस और 50% पोटाश जैसी जरूरी ताकत खुद खींच लेते हैं, जिससे हमारी मुख्य फसलें कमजोर और कुपोषित रह जाती हैं.

फसलों पर खरपतवार का 'डाका' 

कृषि वैज्ञानिकों के शोध से यह साफ हुआ है कि अगर खेतों में खरपतवारों को खुला छोड़ दिया जाए, तो खरीफ की  अलग-अलग फसलों की पैदावार 15% से लेकर 70% तक सीधे गिर जाती है. खरीफ के मौसम में तो इनका आतंक और ज्यादा बढ़ जाता है. आंकड़ों के अनुसार, तिलहनी फसलों में मूंगफली की पैदावार में 35.8% और सोयाबीन में 31.4% की सीधी गिरावट आती है. कई बार तो लापरवाही की वजह से कुछ खेतों में सोयाबीन और मूंगफली की उत्पादन क्षमता 50% से 76% तक पूरी तरह बर्बाद हो जाती है.

इसी तरह, दलहन फसलों में मूंग की दाल को 30.8% तक उपज का नुकसान उठाना पड़ता है. अगर अनाज और मोटे अनाजों की बात करें, तो बाजरा की पैदावार में 27.6%, मक्का में 25.3% और ज्वार में 25.1% तक की भारी कमी आती है. देश के सबसे मुख्य खाद्यान्न यानी सीधी बुवाई वाले धान में भी इसकी वजह से 21.4% की कमी देखी गई है, और सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि अलग-अलग राज्यों और वहां की मिट्टी के हिसाब से यह नुकसान 66% के खतरनाक स्तर तक पहुंच जाता है.

खरपतवारों को फैलने से कैसे रोकें?

खरपतवारों को खेत में बढ़ने से रोकने का सबसे पहला नियम है कि उन्हें पैर पसारने का मौका ही न दिया जाए. इसके लिए किसानों को खेती की शुरुआत से ही कुछ बहुत ही बुनियादी और आसान बातों का गांठ बांध लेनी चाहिए. सबसे जरूरी बात यह है कि बोने के लिए हमेशा पूरी तरह साफ और प्रमाणित बीजों का ही इस्तेमाल करें, जिनमें खरपतवार के बीज बिल्कुल न मिले हों.

दूसरी सबसे बड़ी गलती जो अक्सर किसान करते हैं, वह है खेत में कच्ची या अधकची गोबर की खाद डालना. कच्ची खाद में खरपतवारों के बीज जिंदा रहते हैं और पानी पाते ही उग जाते हैं. इसलिए हमेशा अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद या वर्मी कंपोस्ट का ही प्रयोग करें. इसके साथ ही, अपने खेत की मेड़ों, कतारों और सिंचाई की नालियों को हमेशा साफ रखें, क्योंकि हवा और पानी के बहाव के साथ इनके बीज पूरे खेत में फैल जाते हैं.

कुछ जहरीले खरपतवार जैसे 'गाजर घास' और 'धतूरा' फसल की क्वालिटी तो बिगाड़ते ही हैं, साथ ही इंसानों और मवेशियों के शरीर के लिए भी जानलेवा हैं, इसलिए इन्हें देखते ही तुरंत उखाड़ फेंकना चाहिए.

बिना केमिकल, खरपतवार ऑल-आउट

अगर आप बिना किसी खर्चे और बिना किसी साइड-इफेक्ट के खरपतवारों को हमेशा के लिए अपने खेत से खदेड़ना चाहते हैं, तो सबसे लाजवाब तरीका है "फसल चक्र" अपनाना. जब आप हर साल एक ही खेत में लगातार एक ही फसल बोते हैं, तो उस फसल के साथ उगने वाले खरपतवारों का हौसला बढ़ जाता है और उनकी तादाद दोगुनी हो जाती है. इसलिए हर सीजन में फसलों को बदल-बदल कर बोएं. इसके अलावा हमारे पास कुछ बेहतरीन देसी और वैज्ञानिक तरीके भी हैं जो सबसे ज्यादा काम आते हैं. जैसे, मई-जून के कड़कड़ाती गर्मी के महीने में खेत की गहरी जुताई करके उसे कुछ दिनों के लिए खुला छोड़ दें. इससे जमीन के अंदर छिपे खरपतवारों के बीज और उनकी जड़ें तेज धूप की गर्मी से पूरी तरह जलकर भस्म हो जाती हैं.

इसके बाद, फसल बोने के 20 से 25 दिन के भीतर खुरपी या हैंड-हो की मदद से पहली निराई-गुड़ाई जरूर करें और जरूरत पड़ने पर 40 से 45 दिन पर दूसरी बार गुड़ाई कर दें. इससे मिट्टी में हवा का आना-जाना बढ़ता है और फसल की जड़ें मजबूत होती हैं. फसलों की लाइनों के बीच सूखी घास, गन्ने का भूसा या प्लास्टिक की शीट बिछाकर मल्चिंग करना भी एक बढ़िया तरीका है, जिससे धूप न मिलने के कारण अनचाहे पौधे उग ही नहीं पाते.

अंतिम हथियार केमिकल खरपतवार नाशी

खेती के जानकारों का साफ कहना है कि रसायनों का अंधाधुंध इस्तेमाल हमारी धरती मां और पर्यावरण दोनों को बीमार कर रहा है. इसलिए, रासायनिक खरपतवारनाशी का प्रयोग हमेशा अंतिम उपाय लास्ट ऑप्शन के रूप में ही करना चाहिए—यानी जब हाथ से निराई-गुड़ाई करने के लिए मजदूर न मिलें या बाकी सारे देसी तरीके फेल हो जाएं. अगर रसायन डालना बेहद जरूरी हो, तो फसल के अनुसार सही दवा और सही समय का चुनाव करें.

पहली सावधानी फसल बोने या रोपाई के तुरंत बाद यानी खरपतवारों के अंकुरण से पहले, 0 से 4 दिन के भीतर बरतनी चाहिए, जिससे ये अनचाहे पौधे उग ही न पाएं. दूसरी तरफ, जब फसल थोड़ी बड़ी हो जाए और खेत में हरी-भरी घास या चौड़ी पत्ती वाले जिद्दी खरपतवार दिखाई देने लगें, तब खड़ी फसल में बहुत ही नाप-तोल कर सुझाई गई मात्रा में दवाओं का छिड़काव करना चाहिए.

सबसे जरूरी बात यह याद रखें कि रेतीली या हल्की जमीनों में इन रसायनों की थोड़ी कम मात्रा और भारी या काली मिट्टी में थोड़ी अधिक मात्रा का इस्तेमाल करें. साथ ही, दवा छिड़कते समय खेत में पर्याप्त नमी का होना बेहद जरूरी है ताकि फसल को नुकसान न पहुंचे और खरपतवार पूरी तरह साफ हो जाएं.

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