सेब किसानों के लिए एडवाइजरी जारी (सांकेतिक तस्वीर)हिमाचल प्रदेश में लगातार हो रही बारिश के बीच डॉ. यशवंत सिंह परमार औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, नौणी ने सेब उत्पादक किसानों के लिए रोग प्रबंधन से जुड़ी विस्तृत एडवाइजरी जारी की है. विश्वविद्यालय के पादप रोग विज्ञान विभाग ने कहा है कि मौजूदा मौसम में तापमान, अधिक आर्द्रता और पत्तियों पर लंबे समय तक नमी बने रहने से सेब के बगीचों में कई फफूंदजनित और मिट्टी जनित रोग तेजी से फैल सकते हैं. ऐसे में किसानों को नियमित निगरानी और समय पर प्रबंधन अपनाने की जरूरत है.
विश्वविद्यालय की ओर से बताया गया कि डॉ. यशवंत सिंह परमार औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, नौणी के वैज्ञानिक, बागवानी विभाग के अधिकारी और प्रगतिशील किसान हर महीने ऑनलाइन बैठक करते हैं. इन बैठकों में प्रदेश के अलग-अलग क्षेत्रों की बागवानी फसलों से जुड़े मुद्दों पर चर्चा की जाती है और मौसम और रोगों की स्थिति को देखते हुए किसानों के लिए जरूरी सलाह जारी की जाती है.
पादप रोग विज्ञान विभाग ने बताया कि वर्तमान मौसम पत्ती झुलसा, पत्ती धब्बा, मार्सोनिना लीफ ब्लॉच, व्हाइट रूट रॉट और कॉलर रॉट जैसे रोगों के फैलाव के लिए अनुकूल है. जिन बगीचों में पिछले वर्ष इन रोगों का प्रकोप देखा गया था, वहां विश्वविद्यालय और बागवानी विभाग की अनुशंसित स्प्रे सारिणी के अनुसार फफूंदनाशकों का छिड़काव करने की सलाह दी गई है. किसानों को इन सभी रोगों की नियमित निगरानी करते हुए जरूरत पड़ने पर सिफारिश की गई दवाओं का ही प्रयोग करना चाहिए.
विश्वविद्यालय ने किसानों को बगीचों के भीतर और आसपास उगने वाले खरपतवार नियमित रूप से हटाने की सलाह दी है. अल्टरनेरिया पत्ती धब्बा, पत्ती झुलसा और मार्सोनिना लीफ ब्लॉच के शुरुआती बचाव के लिए जरूरत पड़ने पर मेटीराम 600 ग्राम प्रति 200 लीटर पानी की दर से सुरक्षात्मक छिड़काव करने की सिफारिश की गई है.
जिन बगीचों में रोग का संक्रमण अधिक हो, वहां लस्टर (Lustre 5% SE) 160 मिलीलीटर प्रति 200 लीटर पानी, कैब्रियो टॉप (Cabrio Top 60 WG) 200 ग्राम प्रति 200 लीटर पानी, शमीर 500 मिलीलीटर प्रति 200 लीटर पानी, लूना एक्सपीरियंस 126 मिलीलीटर प्रति 200 लीटर पानी या अवतार 500 ग्राम प्रति 200 लीटर पानी का बारी-बारी से प्रयोग करने की सलाह दी गई है.
व्हाइट रूट रॉट के प्रबंधन के लिए वर्षा ऋतु की शुरुआत से पेड़ के चारों ओर लगभग 15 से 20 सेंटीमीटर गहराई तक कार्बेन्डाजिम 200 ग्राम प्रति 200 लीटर पानी के घोल से तीन से चार बार ड्रेंचिंग करने की सलाह दी गई है.
वहीं, कॉलर रॉट की रोकथाम के लिए वर्षा ऋतु के दौरान तने से लगभग 30 सेंटीमीटर दूरी पर पूरे वृक्ष बेसिन में मैनकोजेब 600 ग्राम प्रति 200 लीटर पानी के घोल से ड्रेंचिंग करने को कहा गया है.
पादप रोग विज्ञान विभाग ने सिल्वर लीफ कैंकर और अन्य कैंकर रोगों के प्रबंधन के लिए फल तुड़ाई के 24 घंटे के भीतर क्यूप्रोफिक्स डिस्प्रेस 1200 ग्राम प्रति 200 लीटर पानी की दर से छिड़काव करने की सलाह दी है, ताकि संक्रमण का खतरा कम किया जा सके.
विश्वविद्यालय ने स्पष्ट किया है कि फफूंदनाशकों के साथ किसी भी कीटनाशी, अन्य रसायन, सूक्ष्म पोषक तत्व, वृद्धि नियामक या हार्मोन को मिलाकर छिड़काव नहीं करना चाहिए. ऐसा करने से पौधों पर विषाक्त प्रभाव, फलों पर रसेटिंग और अन्य शारीरिक विकार पैदा हो सकते हैं. अगर इनका उपयोग जरूरी हो तो अलग-अलग समय पर छिड़काव किया जाए.
विश्वविद्यालय के पादप रोग विज्ञान विभाग ने किसानों से कहा है कि अगर बगीचे में किसी भी रोग के लक्षण दिखाई दें या तकनीकी मार्गदर्शन की जरूरत हो तो रोगग्रस्त पौधों के साफ फोटो के साथ अपनी समस्या ईमेल hodmpp@uhf.ac.in पर भेज सकते हैं. इससे विशेषज्ञ समय पर उचित सलाह उपलब्ध करा सकेंगे.
Copyright©2026 Living Media India Limited. For reprint rights: Syndications Today