देर से ही सही, मेहरबान हुआ मॉनसूनउत्तर प्रदेश औऱ बिहार के खेतों में देर से ही सही, मॉनसून की बारिश ने रौनक लौटा दी है. लगभग दो हफ्ते के लंबे इंतजार के बाद आखिरकार आसमान मेहरबान हुआ है और ज्यादातर हिस्सों में अच्छी बरसात हुई है. इस राहत की फुहार से किसानों के चेहरों पर रौनक आ गई है. अमूमन बिहार औऱ पूर्वी उत्तर प्रदेश में दक्षिण-पश्चिम मॉनसून 15 से 18 जून के बीच दस्तक दे देता है,लेकिन इस साल यह करीब 12-15 दिन की देरी से आया.इस वजह से खरीफ फसलों की बुआई, धान का नर्सरी और खेतों को तैयार करने का सारा काम अटक गया था.अब जब कई इलाकों में 100 मिलीमीटर या उससे ज्यादा पानी बरस चुका है और खेतों की मिट्टी में अच्छी-खासी नमी आ गई है, तो खेती की शुरुआत करने का यह बिल्कुल सही मौका है. मगर याद रहे, इस बार हमें सिर्फ पुराने ढर्रे पर नहीं, बल्कि मौसम के मिजाज को समझकर समझदारी से कदम बढ़ाना होगा.
राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय प्रोफेसर और हेड, पौध सुरक्षा विभाग डॉ. एस. के. सिंह का कहना है कि साल 2026 का खरीफ सीजन किसानों के लिए किसी बड़ी परीक्षा से कम नहीं है. इसकी वजह यह है कि इस बार खेती पर बदलते मौसम और अल-नीनो का सीधा असर पड़ रहा है. मौसम के जानकारों की मानें तो इस बार मॉनसून की शुरुआत काफी सुस्त रही और जून के महीने में पूरे देश में सामान्य से करीब 40 फीसदी कम बारिश दर्ज की गई.
अल-नीनो की वजह से आगे भी बारिश का बंटवारा बहुत अजीब हो सकता हैमुमकिन है कि कहीं भारी बरसात हो जाए और कहीं लंबा सूखा पड़ जाए। ऐसी अनिश्चित सूरत में पारंपरिक तरीकों के भरोसे बैठना भारी नुकसान करा सकता है. इसलिए इस सीजन में हमें ऐसी फसलों और बीजों का चुनाव करना होगा, जो मौसम के इस उतार-चढ़ाव और सूखे के झटके को आसानी से बर्दाश्त कर सकें.
डॉ. सिंह का कहना है बिहार के किसानों के लिए खरीफ का मतलब मुख्य रूप से धान की फसल ही होता है. चूंकि इस बार मॉनसून की गाड़ी थोड़ी लेट हो चुकी है, इसलिए अब खेतों में ऐसी किस्में लगाने से बचना चाहिए जो पकने में बहुत ज्यादा वक्त लेती हैं. इसकी जगह मध्यम या कम समय में तैयार होने वाली धान की वैरायटी चुनना सबसे सुरक्षित और फायदेमंद रहेगा. जिन किसानों ने पहले ही बिचड़ा तैयार कर लिया था और खेतों में पानी जमा हो चुका है, वे फौरन रोपाई का काम शुरू कर दें.
लेकिन अगर किसी वजह से आप अभी तक नर्सरी नहीं डाल पाए हैं, तो परेशान होने की जरूरत नहीं है. ऐसे हालात में आप कम दिनों वाली किस्मों का सीधी बुआई यानि डायरेक्ट सीडेड राइस यानि DSR का तरीका अपना सकते हैं, जिससे समय और पानी दोनों की बचत होगी.
विशेषज्ञ के अनुसार खेतों में आई ताजी नमी का फायदा सिर्फ धान तक सीमित नहीं है. यह समय मक्का, दलहन और तिलहन की बुआई के लिए सबसे बेहतरीन है. इस वक्त अपने खेतों में मक्का, अरहर, उड़द, मूंग और तिल जैसी फसलें लगाकर किसान भाई अपनी आमदनी बढ़ा सकते हैं. इन फसलों को धान के मुकाबले काफी कम पानी की जरूरत होती है, जिससे सूखे का खतरा न के बराबर हो जाता है. इस साल मौसम के जोखिम को कम करने का सबसे उम्दा नुस्खा 'मिश्रित खेती' या 'इंटरक्रॉपिंग' अपनाना है.अगर आप एक ही खेत में दो फसलें मिलाकर बोते हैं, तो क्योकि अगर एक फसल मौसम की मार से खराब भी हो गई, तो दूसरी फसल आपकी लागत और मुनाफा दोनों सुरक्षित रखेगी.
बारिश के बाद सबसे पहला काम खेतों की अच्छी जुताई करना और उन्हें समतल बनाना है, ताकि पानी पूरे खेत में एक समान फैले. इसके साथ ही जल निकासी यानी फालतू पानी को बाहर निकालने का भी पुख्ता इंतजाम होना चाहिए, क्योंकि जरूरत से ज्यादा जलभराव फसलों की जड़ों को सड़ा सकता है. दूसरी तरफ, चूंकि अल-नीनो का खतरा बना हुआ है और मुमकिन है कि आगे चलकर बारिश में लंबा गैप आ जाए, इसलिए हमें वाटर हार्वेस्टिंग पर जोर देना होगा. अपने खेतों की मेड़ों को मजबूत और ऊंचा करें, ताकि आसमान से गिरी पानी की एक-एक बूंद आपके खेत की मिट्टी में समा सके. यह नमी आने वाले सूखे दिनों में आपकी फसल के लिए अमृत का काम करेगी.
अक्सर बारिश होते ही किसान हड़बड़ी में बाजार से जो भी बीज मिलता है, उसे खरीदकर बो देते हैं. यह जल्दबाजी फसल को तबाह कर सकती है. ड़ॉ एस.के सिंह ने सुझाव दिया कि हमेशा सरकारी या भरोसेमंद दुकान से सर्टिफाइड और अच्छी क्वालिटी के बीजों का ही इस्तेमाल करें. इसके अलावा, आंख बंद करके यूरिया या डीएपी डालने की बजाय अपनी मिट्टी की जांच के हिसाब से संतुलित मात्रा में ही खादों का इस्तेमाल करें. रासायनिक खादों के साथ-साथ जैविक खाद और कंपोस्ट को तरजीह दें, क्योंकि जैविक कार्बन से मिट्टी की पानी रोकने की ताकत बढ़ती है.
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