गुजरात में बायो सीएनजी प्लांट का निर्माण तेजगुजरात सरकार ने बायो-CNG सेक्टर को अपने बजट में सबसे ऊपर रखा है, क्योंकि इसमें पशुपालकों के साथ किसानों के लिए कई संभावनाएं हैं. राज्य सरकार ने सहकारी दूध फेडरेशन के जरिये बायो-सीएनजी प्लांट लगाने का अभियान चलाया है. इसमें नए प्लांट लगाने के लिए 60 करोड़ रुपये का खास प्रावधान किया गया है. इस मदद का मकसद डेयरी सेक्टर को स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन का केंद्र बनाना और ग्रामीण अर्थव्यवस्थाओं को आत्मनिर्भर बनाना है. इस योजना के तहत, राज्य में चरणबद्ध तरीके से लगभग 10 बायो-CNG प्लांट लगाने का प्रस्ताव है.
हर प्लांट वैज्ञानिक तरीके से हर दिन लगभग 100 मीट्रिक टन (1 लाख किलोग्राम) गाय के गोबर को प्रोसेस करता है. लगभग 50-55 करोड़ रुपये के निवेश से बना यह प्लांट आधुनिक तकनीक और बुनियादी ढांचे का एक बेहतरीन उदाहरण है. इससे पर्यावरण की सुरक्षा, किसानों की खुशहाली और टेक्नोलॉजी में तेजी—ये तीनों चीजें एक साथ हासिल की जा सकती हैं.
बनासकांठा में मौजूद बायो-CNG प्लांट लगभग 20 किलोमीटर के दायरे में आने वाले 20-25 गांवों के पशुपालक परिवारों से जुड़े हुए हैं. ये परिवार नियमित रूप से गोबर की सप्लाई करते हैं. किसानों को गोबर के लिए 1 रुपया प्रति किलोग्राम का भुगतान किया जाता है, जिससे अनुमानित 400-450 पशुपालक परिवारों को अतिरिक्त आमदनी होती है. गोबर इकट्ठा करने और उसे प्लांट तक पहुंचाने के लिए लगभग 13 ट्रैक्टर-ट्रॉलियों का इस्तेमाल किया जा रहा है. हर चक्कर में ये ट्रॉलियां लगभग 4 मीट्रिक टन गोबर प्लांट तक पहुंचाती हैं, जिससे ग्रामीण इलाकों में रोजगार और स्थानीय आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलता है.
इसके अलावा, यह प्लांट एक 'मल्टी-प्रोडक्ट इकोनॉमिक मॉडल' पर काम करता है. यह हर दिन लगभग 1,800 किलोग्राम 'कम्प्रेस्ड बायोगैस' (CNG) का उत्पादन करता है, जिसे लगभग 75 रुपये प्रति किलोग्राम के हिसाब से बेचा जाता है. साथ ही, यह लगभग 25 मीट्रिक टन ठोस जैविक खाद और 75 मीट्रिक टन तरल जैविक खाद भी बनाता है, जिन्हें क्रमशः लगभग 6 रुपये प्रति किलोग्राम और 0.50 रुपया प्रति किलोग्राम के हिसाब से बेचा जाता है. इन तीनों उत्पादों से प्लांट को हर दिन 3 लाख रुपये से ज्यादा की आमदनी होती है, जो सालाना लगभग 12 करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है.
गुजरात के इस मॉडल में हर साल लगभग 6,750 टन CO2e (कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर) ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने की क्षमता है, जो जलवायु परिवर्तन की वैश्विक चुनौती को कम करता है. इससे एक साथ तीन फायदे हो रहे हैं, फास्वच्छ ईंधन का उत्पादन, रसायन-मुक्त जैविक खाद की उपलब्धता और वैज्ञानिक कचरा प्रबंधन, साथ में किसानों और पशुपालकों की कमाई भी बढ़ रही है.
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