GI Tag: मलिहाबाद की मिठास से बुद्ध के महाप्रसाद तक, दुनिया में बज रहा यूपी के GI कृषि उत्पादो का डंका

GI Tag: मलिहाबाद की मिठास से बुद्ध के महाप्रसाद तक, दुनिया में बज रहा यूपी के GI कृषि उत्पादो का डंका

उत्तर प्रदेश आज 70 से अधिक जीआई टैग के साथ पूरे देश में सबसे अव्वल राज्य बनकर दुनिया भर में अपने कृषि उत्पादों का लोहा मनवा रहा है. राज्य के 20 नायाब कृषि उत्पादों को यह खास कानूनी पहचान और शुद्धता की गारंटी मिल चुकी है, जिसमें मलिहाबाद के दशहरी आम की मिठास, सिद्धार्थनगर के महकते काला नमक चावल और बनारस के लंगड़े आम, लाल पेड़े व बनारसी पान का जादुई ज़ायका शामिल है.

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मलिहाबाद की मिठास से बुद्ध के महाप्रसाद तक, दुनिया में बज रहा यूपी के GI कृषि उत्पादो का डंकायूपी के GI कृषि उत्पादों का डंका (Photo- AI)

भारत की मिट्टी, यहां की आबोहवा और सदियों पुरानी परंपराओं में कुछ ऐसा अनोखापन है, जो दुनिया के किसी कोने में नहीं मिलता. इस अनोखेपन को कानूनी पहचान देने का काम करता है भौगोलिक संकेत, जिसे हम जीआई टैग (Geographical Indication Tag) कहते हैं. साल 2004 में जब पश्चिम बंगाल की 'दार्जिलिंग चाय' को देश का पहला जीआई टैग मिला था, तब किसी ने नहीं सोचा था कि अगले दो दशकों में यह कारवां 600 के आंकड़े को पार कर जाएगा. आज भारत दुनिया में सबसे ज़्यादा जीआई प्रमाणपत्र रखने वाले देशों में शुमार है. इस शानदार कामयाबी की कहानी में सबसे चमकदार नाम बनकर उभरा है उत्तर प्रदेश, जो 70 से अधिक जीआई टैग के साथ पूरे देश में सबसे अव्वल राज्य बन गया है. अपने बेहतरीन हस्तशिल्प के साथ-साथ उत्तर प्रदेश कृषि और खाने-पीने के सामानों के मामले में भी कामयाबी के झंडे गाड़ रहा है. देश के कुल पंजीकृत कृषि उत्पादों में से अकेले 20 नायाब कृषि उत्पाद उत्तर प्रदेश की झोली में आ चुके हैं. यह राज्य केवल इतिहास और सियासत का केंद्र नहीं है, बल्कि अपनी उपजाऊ जमीन के दम पर अनोखे स्वादों का गढ़ भी बन चुका है.

क्या है जीआई टैग?

सरल और आम बोलचाल की भाषा में समझें तो जीआई टैग सरकार की तरफ से मिलने वाली एक ऐसी कानूनी गारंटी या 'सर्टिफिकेट' है, जो यह साबित करती है कि कोई खास प्रोडक्ट सिर्फ और सिर्फ उसी इलाके की पैदावार है, जहां का वह दावा करता है. जैसे बनारस का लंगड़ा आम सिर्फ़ बनारस और उसके आस-पास की खास जलवायु और मिट्टी में ही अपना असली स्वाद और ख़ुशबू हासिल कर सकता है. अगर कोई शख़्स किसी दूसरी जगह आम उगाकर उसे 'बनारस लंगड़ा' के नाम से बेचने की कोशिश करेगा, तो वह कानूनी तौर पर जुर्म माना जाएगा. इसका सबसे बड़ा फायदा हमारे स्थानीय किसानों, बागवानों और छोटे कारीगरों को मिलता है. उन्हें नकली और मिलावटी सामान बेचने वाले जालसाजों से सुरक्षा मिलती है. इसके अलावा, अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार (International Market) में जीआई टैग वाले उत्पादों की साख बहुत ज़्यादा होती है. कारोबारी और निर्यात के लिहाज़ से देखें तो जीआई टैग मिलने के बाद इन चीज़ों की कीमत विदेशी बाज़ारों में आम उत्पादों के मुकाबले 20% से लेकर 40% तक ज़्यादा मिलती है. इससे न सिर्फ़ किसानों की आमदनी दोगुनी होती है बल्कि पूरी दुनिया में भारत के ट्रेडिशनल ब्रांड की साख मज़बूत होती है. 

यूपी का जलवा, जीआई टैग में सबसे आगे!

उत्तर प्रदेश भौगोलिक और प्राकृतिक तौर पर बेहद खुशनसीब राज्य है. क्षेत्रफल के मामले में यह देश का चौथा सबसे बड़ा राज्य है, जिसका दायरा 29.4 मिलियन हेक्टेयर तक फैला है. यहां की सबसे बड़ी ताकत गंगा, यमुना, गोमती, घाघरा, रामगंगा और बेतवा जैसी पवित्र और बारहमासी नदियां हैं, जिन्होंने यहां के मैदानी इलाकों को बेइंतहा उपजाऊ बनाया है. राज्य को तीन मुख्य हिस्सों में बांटा जा सकता है— हिमालय की तलहटी वाला शिवालिक और तराई क्षेत्र, विशाल गंगा का मैदान और दक्षिण का विंध्य पहाड़ी इलाका. इसी भौगोलिक विविधता के कारण उत्तर प्रदेश पूरे देश के कुल अनाज का 21%, फलों का 10.8% और सब्ज़ियों का 15.4% हिस्सा अकेले पैदा करता है. 18 मंडलों और 75 जिलों में फैले इस विशाल सूबे के पास हर जिले में एक नया स्वाद, एक नई तासीर और एक अलग ख़ुशबू है, जो इसे जीआई टैग की रेस में सबसे आगे खड़ा करती है.

मलिहाबाद की मिठास से बुद्ध के महाप्रसाद तक

उत्तर प्रदेश के जिन 20 कृषि उत्पादों को जीआई टैग मिला है, उनमें से हर एक की अपनी एक लाजवाब और दिलचस्प दास्तान है. मलिहाबाद का मशहूर 'दशहरी आम' अपनी मिठास और पतली गुठली के लिए दुनिया भर में मशहूर है, तो बागपत का 'रतौल आम' अपनी अनोखी ख़ुशबू के लिए जाना जाता है. वहीं दूसरी तरफ, सिद्धार्थनगर का 'कालानमक चावल' जिसे 'बुद्ध का महाप्रसाद' भी कहा जाता है, पकने के बाद पूरे मोहल्ले को अपनी महक से सराबोर कर देता है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश का 'बासमती चावल' अपनी लंबाई और उम्दा स्वाद के लिए खाड़ी देशों और यूरोप में धूम मचा रहा है. प्रयागराज का 'सुर्खा अमरूद' अंदर से सेब की तरह गुलाबी और बेहद मीठा होता है. प्रतापगढ़ का 'आंवला' अपनी सेहतमंद खूबियों के लिए जाना जाता है, तो महोबा का 'देशावरी पान' और 'बनारसी पान' अपनी कोमलता और जायके के लिए सदियों से नवाबों और आम अवाम की पसंद रहे हैं. मुज़फ्फरनगर का सोंधा 'गुड़' और हाथरस की कड़क 'हींग' जिस खाने में मिल जाएं, उसका स्वाद सातवें आसमान पर पहुंच जाता है.

जीआई टैग वाले बनारसी जायके

हाल के सालों में वाराणसी और उसके आस-पास के क्षेत्रों ने जीआई टैग के मामले में एक नया इतिहास रचा है. यहां के 'राम नगर भंटा' याविगोल और बड़े बैंगन एवं 'चिराईगांव के करौंदा' ने अपनी एक अलग पहचान बनाई है. बात अगर मीठे के शौकीनों की करें, तो बनारस का 'लाल पेड़ा', देश के स्वतंत्रता आंदोलन की याद दिलाने वाली 'तिरंगी बर्फ़ी' और जौनपुर की रसीली 'इमरती' को भी जीआई का तमगा मिल चुका है. गर्मियों में जान फूंकने वाली 'बनारस की ठंडाई' और तीखेपन का शौकीन बनाने वाली 'बनारसी लाल भरवां मिर्च' भी इस लिस्ट की शान बढ़ा रही हैं. झांसी के इलाके से आने वाला 'बुंदेलखंड का कठिया गेहूँ' अपनी पौष्टिकता के लिए मशहूर है. उत्तर प्रदेश की यह जीआई यात्रा यहीं थमने वाली नहीं है. प्रशासन और किसानों की संस्थाएं मिलकर 14 और नए कृषि उत्पादों को जीआई कतार में शामिल करने की पुरज़ोर कोशिशों में जुटी हैं. उत्तर प्रदेश की यह तरक्की साफ़ इशारा करती है कि आने वाले वक़्त में जब भी दुनिया के बाज़ार में शुद्धता, अनोखे स्वाद और बेहतरीन क्वालिटी की बात होगी, तो उत्तर प्रदेश के कृषि उत्पाद वहां सबसे आगे खड़े दिखाई देंगे.

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