गन्ने की खेती (सांकेतिक तस्वीर)उत्तर प्रदेश में गन्ने की खेती को ज्यादा टिकाऊ और पर्यावरण अनुकूल बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया है. गन्ना विकास विभाग और इफको के संयुक्त तत्वावधान में शुक्रवार को आयोजित वर्चुअल कार्यशाला में रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से होने वाले दुष्प्रभावों को कम करने और स्मार्ट उर्वरकों के इस्तेमाल को बढ़ावा देने पर विशेष जोर दिया गया. कार्यशाला की अध्यक्षता आयुक्त, गन्ना एवं चीनी ने की.
बैठक में सभी चीनी मिलों को स्पष्ट निर्देश दिए गए कि किसानों तक केवल सिफारिश की गई और मंजूर खाद और कीटनाशक ही पहुंचाए जाएं. साथ ही चेतावनी दी गई कि किसी भी परिस्थिति में अधोमानक या अस्वीकृत कृषि रसायन किसानों को उपलब्ध नहीं कराए जाएं. विभाग ने इसे किसानों के हित और कृषि गुणवत्ता से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय बताया.
कार्यशाला में इफको के विशेषज्ञों ने नैनो यूरिया प्लस, नैनो डीएपी, सागरिका, जैव उर्वरक, वाटर सॉल्युबल फर्टिलाइजर और अन्य स्मार्ट उत्पादों के वैज्ञानिक इस्तेमाल की जानकारी दी. विशेषज्ञों के अनुसार, इन उत्पादों के संतुलित इस्तेमाल से मिट्टी की सेहत सुधारने, पौध वृद्धि बढ़ाने और उर्वरक दक्षता बेहतर करने में मदद मिल सकती है. साथ ही कृषि लागत घटाने और उत्पादन क्षमता बढ़ाने की संभावना भी जताई गई.
आयुक्त ने निर्देश दिए कि प्रदेश के प्रत्येक चीनी मिल क्षेत्र में स्मार्ट उर्वरकों के इस्तेमाल के लिए पांच-पांच प्रदर्शन प्लॉट स्थापित किए जाएं. फसल की परिपक्वता के समय इन स्थलों पर कृषक गोष्ठियां आयोजित कर किसानों के साथ परिणाम और अनुभव साझा किए जाएंगे, ताकि नई तकनीकों को जमीन पर परखा जा सके.
स्मार्ट उर्वरकों के इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए प्रदेश की गन्ना समितियों के माध्यम से किसानों को 50 प्रतिशत अनुदान पर 5,000 पावर स्प्रेयर और 10,000 बैटरी स्प्रेयर उपलब्ध कराने के निर्देश दिए गए. इसका उद्देश्य किसानों को आधुनिक कृषि उपकरणों तक आसान पहुंच देना और छिड़काव प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाना है.
कार्यशाला के दौरान पर्यावरण संरक्षण को कृषि विकास से जोड़ते हुए सभी गन्ना समितियों, परिषदों और क्षेत्रीय कार्यालयों में वृक्षारोपण अभियान चलाने का आह्वान किया गया. "एक पेड़ मां के नाम" अभियान के तहत अधिकारियों और कर्मचारियों को पौधरोपण का संकल्प भी दिलाया गया. साथ ही स्मार्ट उर्वरकों, बायोफर्टिलाइजर और बायोपेस्टिसाइड के उपयोग संबंधी जानकारी किसानों तक पहुंचाने के लिए प्रचार सामग्री उपलब्ध कराने और नियमित कार्यशालाएं आयोजित करने के निर्देश दिए गए.
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