
भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान (IIVR), वाराणसी ने 20 अप्रैल 2026 से 45 दिवसीय व्यापक किसान जागरुकता अभियान की शुरुआत की है. यह अभियान “मेरा गांव–मेरा गौरव” पहल के अंतर्गत वाराणसी, चंदौली, मिर्जापुर, प्रयागराज और गाजीपुर जिलों के चयनित गांवों में संचालित किया जाएगा. इसका मुख्य उद्देश्य किसानों को संतुलित उर्वरक उपयोग, टिकाऊ कृषि पद्धतियों और कम लागत वाली वैज्ञानिक खेती की ओर प्रेरित करना है.
आईआईवीआर के निदेशक डॉ. राजेश कुमार ने बताया कि यह अभियान रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक और असंतुलित उपयोग को कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है. उन्होंने कहा कि फसल की आवश्यकता के अनुसार संतुलित उर्वरक प्रयोग से न केवल उत्पादन और गुणवत्ता में सुधार होता है, बल्कि मिट्टी की उर्वरा शक्ति, सूक्ष्मजीव गतिविधि और दीर्घकालिक उत्पादकता भी बनी रहती है.
अभियान के शुभारंभ पर डॉ. ए. एन. सिंह और डॉ. के. के. पांडे के नेतृत्व में वैज्ञानिकों की टीम ने शाहंशाहपुर और बिकाना (दुबरी-पहाड़ी) गांवों का दौरा किया. यहां 100 से अधिक किसानों को मिट्टी परीक्षण, फसलवार पोषक तत्व प्रबंधन और संतुलित उर्वरक उपयोग की वैज्ञानिक जानकारी दी गई.
विशेषज्ञों के अनुसार संतुलित उर्वरक का मतलब केवल रासायनिक उर्वरकों को कम करना नहीं, बल्कि नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश और सूक्ष्म पोषक तत्वों का सही अनुपात में उपयोग करना है. इससे जड़ों का विकास बेहतर होता है, फूल-फलन बढ़ता है और उपज की गुणवत्ता और बाजार मूल्य दोनों में वृद्धि होती है.
अभियान के दौरान किसानों को बताया जाएगा कि अंधाधुंध उर्वरक उपयोग से मिट्टी की संरचना बिगड़ती है और उत्पादन लागत बढ़ती है. इसके विपरीत, समेकित पोषक प्रबंधन से उर्वरक उपयोग दक्षता बढ़ती है, पोषक तत्वों की हानि कम होती है और खेत की उत्पादकता लंबे समय तक बनी रहती है.
अभियान में हरी खाद, बायोफर्टिलाइजर, कंसोर्शिया और बायोस्टिमुलेंट्स के उपयोग पर विशेष जोर दिया जाएगा. ढैंचा, सनई, लोबिया और मूंग जैसी फसलों के माध्यम से मिट्टी में कार्बनिक पदार्थ बढ़ाने और नाइट्रोजन संधारण सुधारने के उपाय किसानों को बताए जाएंगे.
यह अभियान 45 दिनों तक लगातार चलेगा, जिसमें आईआईवीआर की 10 टीमें प्रतिदिन अलग-अलग गांवों में जाकर किसानों को प्रशिक्षण, फील्ड डेमो और तकनीकी मार्गदर्शन देंगी. अभियान से जुड़े आंकड़े प्रतिदिन आईसीएआर मुख्यालय को भेजे जाएंगे, ताकि इसके प्रभाव का विश्लेषण किया जा सके.
डॉ. ए. एन. सिंह ने कहा कि वैज्ञानिक टीम गांव-गांव जाकर किसानों को स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप टिकाऊ खेती के लिए मार्गदर्शन दे रही है. वहीं डॉ. के. के. पांडे ने बताया कि हरी खाद और जैव-उर्वरक खेती को अधिक लाभकारी और पर्यावरण-अनुकूल बना सकते हैं.
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