पंजाब में किसानों ने कपास की खेती से बनाई दूरी, रकबा घटकर 94,000 हेक्टेयर पर पहुंचा, जानें वजह

पंजाब में किसानों ने कपास की खेती से बनाई दूरी, रकबा घटकर 94,000 हेक्टेयर पर पहुंचा, जानें वजह

मानसा, फाजिल्का और बठिंडा के कुछ गांवों में कपास उत्पादक अपने खेतों में कपास की फसल को वापस जोत रहे हैं और पीआर 126 धान की किस्म की रोपाई का विकल्प चुन रहे हैं, जिसकी वृद्धि अवधि 110 दिन है. राज्य कृषि विभाग के एक अधिकारी ने कहा कि बॉलवर्म और व्हाइटफ्लाई से लड़ने के लिए कीटनाशकों के छिड़काव की इनपुट लागत में काफी वृद्धि होती है और फसल आर्थिक रूप से अव्यवहारिक हो गई है.

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पंजाब में किसानों ने कपास की खेती से बनाई दूरी, रकबा घटकर 94,000 हेक्टेयर पर पहुंचा, जानें वजहकपास की फसल पर कीट का खतरा. (सांकेतिक फोटो)

पंजाब में कपास के रकबे में भारी गिरावट आई है. इस चालू सीजन में कपास का रकबा गिरकर 94,000 हेक्टेयर पर पहुंच गया है. हालांकि, साल 2019 में इसका रकबा 3.35 लाख हेक्टेयर था. ऐसे में राज्य कृषि विभाग के अधिकारियों को डर है कि अगर समय रहते सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए, तो किसान कपास उगाना पूरी तरह से बंद कर सकते हैं. उनकी रूचि धान की खेती की तरफ शिफ्त हो सकती है. इससे राज्य में भूजल का दोहन बढ़ जाएगा. साथ ही यह पर्यावरण के लिए खतरा भी है.

हिन्दुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, पंजाब के 162 ब्लॉकों में से लगभग 145 ब्लॉक पहले ही ग्रे जोन में जा चुके हैं, क्योंकि भूमिगत जल स्तर में सालाना एक मीटर की औसत गिरावट आ रही है. जल स्तर में वृद्धि की दर इसके उपयोग की तुलना में धीमी है. पिछले साल के 1.73 लाख हेक्टेयर से, चालू सीजन में कपास की फसल के तहत 45 फीसदी की गिरावट देखी गई है. खास बात यह है कि किसानों ने संक्रमित कपास की फसलों को वापस जोतना शुरू कर दिया है, ताकि पछेती धान की किस्मों की बुवाई की जा सके.

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110 दिन में तैयार हो जाती है यह किस्म

मानसा, फाजिल्का और बठिंडा के कुछ गांवों में कपास उत्पादक अपने खेतों में कपास की फसल को वापस जोत रहे हैं और पीआर 126 धान की किस्म की रोपाई का विकल्प चुन रहे हैं, जिसकी वृद्धि अवधि 110 दिन है. राज्य कृषि विभाग के एक अधिकारी ने कहा कि बॉलवर्म और व्हाइटफ्लाई से लड़ने के लिए कीटनाशकों के छिड़काव की इनपुट लागत में काफी वृद्धि होती है और फसल आर्थिक रूप से अव्यवहारिक हो गई है. उन्होंने कहा कि कपास इस सीजन में अन्य फसलों की तुलना में बेहतर कमाई देता है, लेकिन धान निश्चित आय देता है. हालांकि यह नकदी फसल से कम है. लुधियाना स्थित पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (पीएयू) ने पछेती किस्मों की जानकारी दी है, लेकिन उसे चिंता है कि ये किस्में धान के रकबे पर कब्जा कर लेंगी. 

पीएयू के कुलपति डॉ. एसएस गोसल ने कहा कि हम चाहते हैं कि कपास का रकबा बढ़े और किसान, खास तौर पर दक्षिण-पश्चिम पंजाब के कपास क्षेत्र में, धान की खेती न करें. उन्हें बेहतर किस्म के बीजों की तत्काल जरूरत है. कृषि विभाग के प्रमुख विशेष प्रधान सचिव केएपी सिन्हा के अनुसार, केंद्र के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय को स्थिति से अवगत करा दिया गया है. पंजाब सरकार किसानों को पानी की अधिक खपत वाले धान की खेती से दूर करके विविधीकरण पर जोर दे रही है.

किसान कर रहे इन किस्मों की खेती

कृषि विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि विविधीकरण की दिशा में कदम उठाते हुए हम मक्का, सुगंधित प्रीमियम धान बासमती और सीधे बीज वाले चावल के रकबे को बढ़ाने में सफल रहे हैं, लेकिन कपास के रकबे में गिरावट एक बड़ी चिंता है. बीजी किस्म का चरण-2 बेकार हो गया है और बीज का चरण-3 जेनेटिक इंजीनियरिंग मूल्यांकन समिति (जीईएसी) से मंजूरी का इंतजार कर रहा है. राज्य के कृषि निदेशक जसवंत सिंह ने कहा कि केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने हमें जल्द से जल्द बीजी-III कपास बीज उपलब्ध कराने को कहा है, लेकिन यह इस बात पर निर्भर करता है कि वे कितनी जल्दी उपलब्ध होते हैं. 

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