कालाजीरा चावलओडिशा में देसी चावल की पारंपरिक किस्मों की खेती को बढ़ावा देने के लिए राज्य सरकार ने एक बड़ा फैसला किया है. दरअसल, ओडिशा सरकार और फिलीपींस के इंटरनेशनल राइस रिसर्च इंस्टीट्यूट (IRRI) साथ मिलकर काम करेंगे. इस पहल में खास तौर पर कालाजीरा चावल की खेती को बढ़ाने और किसानों को बेहतर बाजार उपलब्ध कराने पर जोर दिया जाएगा. IRRI के मुख्य वैज्ञानिक डॉ. नेसे श्रीनिवासुल के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल ने मंगलवार को ओडिशा के उपमुख्यमंत्री के.वी. सिंह देव से मुलाकात की. इस दौरान राज्य में कालाजीरा और चावल की दूसरी देसी किस्मों का उत्पादन बढ़ाने को लेकर चर्चा हुई.
कालाजीरा ओडिशा की एक पारंपरिक और खुशबूदार चावल की किस्म है. इसे 'चावल का राजकुमार' भी कहा जाता है. इसकी खेती मुख्य रूप से कोरापुट जिले के आदिवासी किसान करते हैं. यह चावल अपनी खुशबू और खास स्वाद के लिए जाना जाता है और इसे GI टैग भी मिला हुआ है. सरकार का मानना है कि कालाजीरा की खेती बढ़ने से कोरापुट और दूसरे इलाकों के किसानों और आदिवासी परिवारों की आमदनी बढ़ सकती है. IRRI इस चावल की खासियत और क्वालिटी को बनाए रखने के लिए किसानों और सरकार को आधुनिक तकनीकी सहयोग देगा. इसमें चावल की शुद्ध किस्म, अच्छी क्वालिटी और दूसरी खास खूबियों को सुरक्षित रखने पर ध्यान दिया जाएगा.
इस साझेदारी का एक बड़ा लक्ष्य किसानों को उनकी उपज का बेहतर दाम दिलाना है. राज्य सरकार कालाजीरा चावल को एक प्रमुख डेमोंस्ट्रेशन प्रोजेक्ट के तौर पर विकसित करने की तैयारी में है. इससे किसानों को बेहतर बाजार और अच्छी कीमत मिलने की उम्मीद है. इसके अलावा टूटे हुए चावल से भी कई तरह के वैल्यू-एडेड फूड प्रोडक्ट तैयार करने की योजना है. इसके लिए स्थानीय स्तर पर चावल मिल और प्रोसेसिंग से जुड़ी सुविधाएं विकसित की जाएंगी.
चावल की प्रोसेसिंग और उससे जुड़े कारोबार में ग्रामीण किसानों के साथ-साथ महिला स्वयं सहायता समूहों को भी जोड़ा जाएगा. इससे महिलाओं को छोटे स्तर पर अपना कारोबार शुरू करने और कमाई बढ़ाने का मौका मिल सकता है. IRRI और ओडिशा सरकार के बीच यह सहयोग फसल कटाई के बाद होने वाली प्रोसेसिंग, टिकाऊ खेती और महिलाओं के नेतृत्व वाले कृषि कारोबार को बढ़ावा देने पर भी केंद्रित है.
आंकड़ों के मुताबिक, खरीफ सीजन 2024 में कोरापुट के आठ ब्लॉक में 1,800 से ज्यादा किसानों ने करीब 1,365 एकड़ जमीन पर कालाजीरा चावल की खेती की थी. इस दौरान किसान समूहों की ओर से बनाई गई स्थानीय मंडियों के जरिए करीब 1,900 क्विंटल धान की सीधी खरीद की गई. इसके बाद 2025 में कालाजीरा समेत दूसरी स्थानीय चावल की किस्मों की खेती का क्षेत्र बढ़ाकर करीब 2,000 एकड़ कर दिया गया.
ओडिशा का कालाजीरा चावल बाजार में अच्छी कीमत पर बिकता है. इसकी कीमत ब्रांड, प्रोसेसिंग और पैकेजिंग के आधार पर करीब 150 रुपये से 350 रुपये प्रति किलो तक बताई गई है. सरकार और IRRI की इस पहल से उम्मीद है कि ओडिशा की पारंपरिक चावल की किस्मों को नई पहचान मिलेगी. साथ ही किसानों को बेहतर बाजार, ज्यादा आमदनी और स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर मिल सकते हैं. इस पहल का उद्देश्य सिर्फ देसी चावल की किस्मों को बचाना नहीं है, बल्कि इन्हें बाजार से जोड़कर किसानों और ग्रामीण परिवारों के लिए कमाई का मजबूत जरिया बनाना भी है. (PTI)
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