Google-Mitti Labs की साझेदारी से घटेगा मीथेन (सांकेतिक तस्वीर)भारत के धान के खेतों में अब पानी की बचत के साथ-साथ मीथेन गैस का उत्सर्जन कम करने की कोशिश तेज होने जा रही है. डीप-टेक कंपनी Mitti Labs ने Google के साथ पांच साल का बड़ा करार किया है. इस साझेदारी के तहत भारत के छोटे किसानों के करीब 1 लाख हेक्टेयर धान के खेतों में जल और मीथेन बचाने वाली खेती की तकनीक को बढ़ावा दिया जाएगा. इसका फायदा 70 हजार से ज्यादा किसानों तक पहुंचाने का लक्ष्य है.
धान की खेती में आमतौर पर खेतों में लंबे समय तक पानी भरा रहता है. ऐसे पानी भरे खेतों में मीथेन गैस बनने की स्थिति पैदा होती है. मीथेन एक ऐसी ग्रीनहाउस गैस है, जो कम समय में धरती के तापमान को बढ़ाने में कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में काफी ज्यादा असर डालती है. दुनिया में इंसानों की गतिविधियों से होने वाले मीथेन उत्सर्जन में धान के खेतों का भी बड़ा योगदान है. दुनियाभर में मीथेन उत्सर्जन का 10 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा धान की खेती से जुड़ा बताया जाता है. इसलिए धान के खेतों में मीथेन कम करना जलवायु परिवर्तन की रफ्तार को कम करने के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
Google और Mitti Labs की साझेदारी का उद्देश्य छोटे किसानों को ऐसी सिंचाई पद्धतियां अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना है, जिनसे खेतों में लगातार पानी भरा रखने की जरूरत कम हो. इससे खेतों से निकलने वाली मीथेन गैस को कम करने के साथ पानी की भी बचत होगी. Mitti Labs के अनुसार, इस कार्यक्रम के तहत 70 हजार से ज्यादा किसानों को पानी और मीथेन बचाने वाली सिंचाई तकनीकों से जोड़ा जाएगा. कुल मिलाकर 1 लाख हेक्टेयर छोटे किसानों की जमीन को इस कार्यक्रम में शामिल करने की योजना है.
इस साझेदारी के तहत Mitti Labs वर्ष 2030 तक Google को 10 लाख हाई-क्वालिटी कार्बन क्रेडिट उपलब्ध कराएगी. यह धान की खेती से मीथेन कम करने वाले कार्बन क्रेडिट का अब तक का सबसे बड़ा खरीद समझौता बताया गया है. इन क्रेडिट के जरिए उन गतिविधियों को आर्थिक समर्थन मिलता है, जिनसे वातावरण में ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम होता है. इसका मकसद खेती को जलवायु के लिए बेहतर बनाने के साथ किसानों को भी नई तकनीक से जोड़ना है.
Mitti Labs के मुताबिक, इस कार्यक्रम से मीथेन उत्सर्जन में कमी के जरिए करीब 30 लाख टन के निकट अवधि वाले ग्लोबल वार्मिंग प्रभाव को कम करने में मदद मिल सकती है. यह 100 साल की अवधि के हिसाब से करीब 10 लाख टन के प्रभाव के बराबर बताया गया है. कंपनी का कहना है कि मीथेन वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में कम समय तक रहती है. इसलिए आज मीथेन उत्सर्जन में कमी करने से आने वाले वर्षों में तापमान बढ़ने की रफ्तार को कम करने में सीधा फायदा मिल सकता है.
Mitti Labs ऐसी सिंचाई तकनीकों को बढ़ावा दे रही है, जिनमें धान के खेतों में लगातार पानी भरकर रखने के बजाय जरूरत के अनुसार पानी दिया जाता है. इसे वैकल्पिक सिंचाई पद्धति के तौर पर देखा जाता है. कंपनी के अनुसार, इस तरीके से धान के खेतों से निकलने वाली मीथेन को 50 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है. साथ ही सिंचाई में इस्तेमाल होने वाले पानी की मात्रा भी करीब 40 प्रतिशत तक घटाई जा सकती है. कंपनी का दावा है कि इससे धान की पैदावार को बनाए रखते हुए पानी और मीथेन दोनों की बचत की जा सकती है.
भारत के कई हिस्सों में खेती के लिए पानी की उपलब्धता एक बड़ी चुनौती है. धान ऐसी फसल है जिसमें काफी पानी की जरूरत होती है. ऐसे में सिंचाई में कम पानी इस्तेमाल करने वाली तकनीक किसानों के लिए काफी उपयोगी हो सकती है. इस साझेदारी के तहत देश के अलग-अलग इलाकों में अरबों लीटर पानी बचाने का अनुमान है. कंपनी के मुताबिक, बचने वाले पानी की मात्रा करीब इतनी हो सकती है, जितनी बेंगलुरु शहर की तीन साल की पानी की जरूरत के बराबर है.
Mitti Labs अपनी GeoAI तकनीक का इस्तेमाल कर रही है. इस तकनीक में सैटेलाइट से मिलने वाले डेटा और खेतों से जुटाई गई जानकारी को मिलाकर खेती की स्थिति को समझा जाता है. इससे अलग-अलग खेतों के स्तर पर फसल की सेहत, मिट्टी में नमी और खेत में पानी भरने जैसी जानकारी हासिल की जा सकती है. कंपनी के अनुसार, उसके प्लेटफॉर्म में हाई-रिजॉल्यूशन सैटेलाइट रडार डेटा का इस्तेमाल किया जाता है. इस तकनीक को विकसित करने में NASA का भी सहयोग रहा है.
भारत में बड़ी संख्या में किसान छोटे खेतों पर खेती करते हैं. ऐसे में पूरे इलाके की सामान्य जानकारी के बजाय हर खेत की स्थिति को समझना जरूरी है. Mitti Labs का GeoAI प्लेटफॉर्म छोटे-छोटे खेतों के स्तर पर जानकारी जुटाने की दिशा में काम कर रहा है. Google के सहयोग से कंपनी AI और सैटेलाइट रडार तकनीक को और बेहतर बनाने की योजना बना रही है. आगे चलकर दुनिया के लाखों धान के खेतों का डिजिटल डेटा तैयार करने का लक्ष्य है. कंपनी इन्हें 'डिजिटल ट्विन' डेटासेट के रूप में विकसित करना चाहती है.
इस तकनीक का एक बड़ा उद्देश्य आने वाले समय में किसानों को कम पानी में धान की खेती करने में मदद करना है. जलवायु परिवर्तन के कारण कई इलाकों में पानी की उपलब्धता पर दबाव बढ़ रहा है. ऐसे में कम पानी वाली खेती किसानों के लिए जरूरी हो सकती है. Mitti Labs का कहना है कि डिजिटल तकनीक और खेतों की सही जानकारी के जरिए किसानों को यह समझने में मदद मिल सकती है कि उनके खेत में कब पानी की जरूरत है और कब खेत को सूखा छोड़ा जा सकता है. इससे पानी की बचत के साथ खेती को भी अधिक टिकाऊ बनाया जा सकता है.
Google की चीफ सस्टेनेबिलिटी ऑफिसर केट ब्रांट ने कहा कि कंपनी ऐसे समाधानों की तलाश में है, जो कम और लंबी दोनों अवधि में धरती के गर्म होने के असर को कम कर सकें. उनके मुताबिक, Mitti Labs का मॉडल मीथेन कम करने, पानी बचाने और छोटे किसानों को बेहतर जल प्रबंधन तकनीक अपनाने में मदद कर सकता है. Mitti Labs के को-फाउंडर जेवियर लागुआर्टा ने भी कहा कि धान की खेती से मीथेन कम करना कम समय में जलवायु पर पड़ने वाले असर को घटाने का एक प्रभावी तरीका है. उनके मुताबिक, Google के साथ साझेदारी से कंपनी का काम बड़े स्तर तक पहुंचाने में मदद मिलेगी.
Mitti Labs ने वर्ष 2023 में काम शुरू किया था. कंपनी के अनुसार, इसके बाद उसने दुनिया के सबसे बड़े वैकल्पिक सिंचाई कार्यक्रमों में से एक को बड़े स्तर पर लागू किया है. कंपनी को उसके मीथेन आधारित कार्बन क्रेडिट के लिए रेटिंग एजेंसी Sylvera से 'A' रेटिंग भी मिली है. अब Google के साथ पांच साल के इस करार से भारत में धान की खेती को पानी बचाने और मीथेन कम करने वाली तकनीक से जोड़ने की कोशिश और तेज होगी. अगर यह मॉडल बड़े स्तर पर सफल होता है, तो इससे किसानों की खेती में पानी की जरूरत घटाने के साथ पर्यावरण पर पड़ने वाले असर को भी कम करने में मदद मिल सकती है.
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