अखरोट की बंपर पैदावारजम्मू-कश्मीर के राजौरी जिले के दूर-दराज के पहाड़ी इलाकों में अखरोट की खेती किसानों के लिए कमाई का अच्छा जरिया बनती जा रही है. कोटरांका-बुधाल जैसे क्षेत्रों में बागवानी विभाग किसानों को अखरोट की खेती के लिए प्रोत्साहित कर रहा है. बागवानी विभाग की ओर से नई और बेहतर किस्मों के पौधे भी उपलब्ध कराए जा रहे हैं. इससे किसानों के साथ-साथ स्थानीय मजदूरों के लिए भी रोजगार के अवसर बढ़ रहे हैं.
बागवानी विभाग के फील्ड टेक्नीशियन वली मोहम्मद के मुताबिक, इस इलाके में अखरोट की खेती की काफी संभावनाएं हैं. विभाग किसानों को नई किस्मों के बारे में जानकारी दे रहा है और इसके लिए जागरूकता कैंप भी लगाए जा रहे हैं. इन कैंपों में किसानों को अखरोट की खेती के फायदे और नई तकनीक के बारे में बताया जाता है. उन्होंने बताया कि किसानों और स्थानीय लोगों की ओर से भी अच्छा रिस्पॉन्स मिल रहा है. उनका कहना है कि अखरोट की खेती ग्रामीण इलाकों में लोगों को अपना रोजगार शुरू करने का मौका दे सकती है.
किसान शमशेर अहमद ने बताया कि अखरोट इस इलाके की प्रमुख फसलों में शामिल है. ‘एक जिला एक उत्पाद’ योजना के तहत भी राजौरी के प्रमुख उत्पाद के रूप में अखरोट को बढ़ावा दिया जा रहा है. उन्होंने कहा कि सरकार की सब्सिडी और अच्छी बिक्री की वजह से किसानों को अखरोट की खेती से फायदा मिल रहा है. अहमद के मुताबिक, किसान अखरोट के साथ हाई-डेंसिटी सेब जैसी फसलों की ओर भी बढ़ रहे हैं, लेकिन पहाड़ी इलाकों में अखरोट अभी भी किसानों की प्रमुख फसल है. उन्होंने बागवानी विभाग से अखरोट के अधिक से अधिक पौधे लगाने के लिए जमीन मालिकों को प्रोत्साहित करने की अपील की.
अखरोट के कॉन्ट्रैक्टर शकूर ने बताया कि राजौरी के पहाड़ी इलाकों में अच्छी क्वालिटी वाले अखरोट पैदा होते हैं. यहां से बड़ी मात्रा में अखरोट जम्मू भेजे जाते हैं. उन्होंने बताया कि कई लोगों की जमीन पर सिर्फ चार-पांच अखरोट के पेड़ हैं और इनसे होने वाली कमाई उनके परिवार की आजीविका में मदद करती है. अखरोट की खेती और कारोबार से स्थानीय मजदूरों को भी काम मिल रहा है. कॉन्ट्रैक्टर स्थानीय लोगों को ही मजदूरी के लिए काम पर रखते हैं. इससे क्षेत्र के गरीब परिवारों के लिए रोजगार के अवसर पैदा हो रहे हैं.
कोटरांका तहसील के फलनी गांव के अखरोट कारोबारी मोहम्मद शब्बीर करीब 30 साल से इस कारोबार से जुड़े हैं. उन्होंने बताया कि उनके साथ लगभग 500 से 600 लोग काम करते हैं. उनके मुताबिक, इस इलाके में पैदा होने वाले अखरोट की क्वालिटी अच्छी है और आसपास के क्षेत्रों से बड़ी मात्रा में अखरोट उनके पास पहुंचता है. उन्होंने बताया कि बागवानी विभाग की ओर से कारोबार से जुड़े लोगों को मशीनरी और सब्सिडी के जरिए मदद भी मिली है. हालांकि, अखरोट को सुरक्षित रखने के लिए क्षेत्र में कोल्ड स्टोरेज की कमी है. उन्होंने सरकार से कोल्ड स्टोरेज और पानी की टंकी जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराने की मांग की है.
बुधाल नर्सरी के टेक्नीशियन अज़हर महमूद ने बताया कि यह नर्सरी साल 1978 में शुरू हुई थी. यहां अखरोट, सेब, आड़ू समेत कई तरह के पौधे तैयार किए जाते हैं. नर्सरी में हाई-डेंसिटी सेब के साथ ग्राफ्टेड अखरोट और ग्राफ्टेड आड़ू के पौधे भी तैयार किए जा रहे हैं. उन्होंने बताया कि सरकार की सब्सिडी योजना के तहत किसानों को पौधे उपलब्ध कराए जाते हैं. इससे किसानों के लिए नए बाग लगाने की लागत कम होती है और वे बेहतर किस्म के पौधे लगाने के लिए प्रोत्साहित होते हैं.
ऐसे में राजौरी के पहाड़ी इलाकों में अखरोट की खेती सिर्फ किसानों की आमदनी बढ़ाने का जरिया नहीं बन रही है, बल्कि इससे स्थानीय स्तर पर मजदूरी और कारोबार के अवसर भी पैदा हो रहे हैं. अगर भंडारण, सिंचाई और बाजार जैसी सुविधाओं को और मजबूत किया जाए, तो अखरोट की खेती क्षेत्र की ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए और बड़ा सहारा बन सकती है. (ANI)
Copyright©2026 Living Media India Limited. For reprint rights: Syndications Today