Cotton Farming: कपास की खेती के ल‍िए हर‍ियाणा कृष‍ि व‍िश्वव‍िद्यालय ने क‍िसानों को द‍िए ट‍िप्स 

Cotton Farming: कपास की खेती के ल‍िए हर‍ियाणा कृष‍ि व‍िश्वव‍िद्यालय ने क‍िसानों को द‍िए ट‍िप्स 

कृष‍ि वैज्ञान‍िकों ने बताया क‍ि गुलाबी सुंडी से कैसे बचेगी कॉटन की खेती. इसके प्रकोप से हो रहा है ज्यादा नुकसान. जुलाई महीने में कपास की फसल में थ्रिप्स, सफेद मक्खी व हरे तेला का भी प्रकोप हो जाता है. जीवाणु अंगमारी रोग भी लगता है. जान‍िए इन रोगों का क्या है न‍िदान. 

Advertisement
Cotton Farming: कपास की खेती के ल‍िए हर‍ियाणा कृष‍ि व‍िश्वव‍िद्यालय ने क‍िसानों को द‍िए ट‍िप्स कपास की खेती को रोगों से कैसे बचाएं (Photo-HAU).

इन द‍िनों कई राज्यों में जमकर बार‍िश हो रही है. हर‍ियाणा भी बाढ़ और बार‍िश से प्रभाव‍ित है. हर‍ियाणा कृष‍ि व‍िश्वव‍िद्यालय ह‍िसार के कुलपत‍ि प्रो. बीआर काम्बोज ने अधिक बरसात में कपास की फसल को नुकसान से बचाने के ल‍िए टिप्स द‍िए हैं. ज‍िनका पालन करके क‍िसान कपास की अच्छी खेती कर सकते हैं. बरसात के बाद कपास में निराई गुड़ाई करने की सलाह दी गई है. अगर बिजाई के समय डीएपी डाल दिया है तो अच्छी बारिश के बाद बीटी कपास में एक बैग यूरिया का छिड़काव करें. अगर बिजाई के समय डीएपी नहीं डाला है तो अब अच्छी बरसात के बाद उसमें डीएपी का इस्तेमाल करें. देसी कपास में कोई भी खाद डालने की आवश्यकता नहीं है.

कुलपति ने बताया कि बिना वैज्ञान‍िकों की सिफारिश के कपास के खेत में खाद न डालें. फसल में एनपीके इत्यादि का छिड़काव भी बिजाई के सौ दिन बाद ही करें. अधिक बरसात के बाद कपास के खेत से पानी की निकासी सुनिश्चित करें. उन्होंने बताया कि बरसात के मौसम में स्प्रे के घोल में चिपचिपा पदार्थ जैसे सेण्डवित, सेलवेट 99 या टीपोल की 60 मिलीलीटर मात्रा प्रति 200 लीटर में घोल मिलाएं. जुलाई माह में कपास की फसल में थ्रिप्स, चूरड़ा, सफेद मक्खी व हरे तेला का भी प्रकोप हो जाता है. 

इसे भी पढ़ें: बासमती चावल का बंपर एक्सपोर्ट, पर कम नहीं हैं पाक‍िस्तान और कीटनाशकों से जुड़ी चुनौत‍ियां 

क्या है न‍िदान

अगर कपास के खेत में 60 दिनों से कम अवधि की फसल में थ्रिप्स की संख्या प्रति पत्ता 30 मिले तो नीम आधारित कीटनाशक का प्रयोग करें. सफेद मक्खी यदि 6-8 प्रौढ़ प्रति पत्ता एवं हरा तेला 2 शिशु प्रति पत्ता मिले तो फ्लॉनिकामिड़ (उलाला) 50 डब्लू जी की 60 ग्राम मात्रा प्रति 200 लीटर पानी की दर से एक छिड़काव करें. 

क‍िन खेतों में ज्यादा लगती है गुलाबी सुंडी

व‍िश्वव‍िद्यालय के अनुसंधान निदेशक जीतराम शर्मा ने बताया कि नरमा की फसल के आसपास बीते साल की नरमा की बनछटिया रखी हुए हैं या उनके खेतों के आसपास कपास की जिनिंग और बिनौलों से तेल निकालने वाली मिल लगती है तो उन किसानों को अपने खेतों पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है. क्योंकि इन खेतों में गुलाबी सुंडी का प्रकोप पहले से अधिक होता है. उन्होंने बताया कि गुलाबी सुंडी अधखिले टिंडों में नरमे के दो बीजों (बिनौले) को जोड़कर भंडारित लकड़ियों में निवास करती है.

इसलिए बनछटिया का प्रबंधन नरमा की फसल में बौकी या डोडी निकलने से पहले ही करें. नरमा की बनछटिया से टिंडे एवं पत्तें झाड़कर नष्ट कर दें. उन्होंने बताया कि फसल की शुरुआती अवस्था में गुलाबी सुंडी से प्रभावित पौधों पर लगे रोजेटी फूल (गुलाबनुमा फूल) को समय-समय पर एकत्रित कर नष्ट करते रहें. 

कब करें दवा का स्प्रे

कपास अनुभाग के प्रभारी डॉ. करमल सिंह मलिक ने बताया कि कपास की फसल में गुलाबी सुंडी की निगरानी के लिए 2 फेरोमोन ट्रैप प्रति एकड़ लगाएं तथा इनमें फंसने वाले गुलाबी सुंडी के पतंगों को 3 दिनों के अंतराल पर गिनती करें. जून से मध्य अगस्त तक यदि इनमें कुल 12-15 पतंगे प्रति ट्रैप तीन दिन में आते हैं तो कीटनाशक के छिड़काव की आवश्यकता है. साठ दिनों तक की फसल में एक छिड़काव नीम आधारित कीटनाशक (नीम्बीसिडीन या अचूक) की 5 मिली मात्रा प्रति लीटर पानी के हिसाब से करें.  

गुलाबी सुंडी से ऐसे करें बचाव

कीट वैज्ञानिक डॉ. अनिल जाखड़ ने बताया कि कपास की फसल 60 दिनों की होने के बाद तथा गुलाबी सुंडी का प्रकोप फलीय भागों पर 5-10 प्रतिशत होने पर एक छिड़काव प्रोफेनोफोस (क्यूराक्रोन/सेल्क्रोन/कैरिना) 50 ईसी की 3 मिलीलीटर मात्रा प्रति लीटर पानी की दर से करें. इसके बाद अगला छिड़काव जरुरत पड़ने पर क्यूनालफास 20 एएफ की 4 मिलीलीटर मात्रा प्रति लीटर पानी की दर से 10-12 दिनों बाद करें. 

कपास के इन रोगों का क्या है न‍िदान 

पैराविल्ट के लिए किसानों को लक्षण दिखाई देते ही 24 से 48 घंटों के अंदर 2 ग्राम कोबाल्ट क्लोराइड 200 लीटर पानी में घोल बनाकर 24 से 48 घंटे में खेत में छिड़काव करें. जीवाणु अंगमारी रोग के लिए किसान भाई 6 से 8 ग्राम स्ट्रेप्टोसाक्लीन और 600 से 800 ग्राम कॉपर ऑक्सिक्लोराइड को 150 से 200 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ 15 से 20 दिन के अंतराल पर दो से तीन छिड़काव करें. जड़ गलन बीमारी से सूखे हुए पौधों को खेत में से उखाड़ कर जमीन में दबा दें. 

इस रोग से प्रभावित पौधों के आसपास स्वस्थ पौधों में 1 मीटर तक कार्बेंडाजिम 2 ग्राम प्रति लीटर पानी का घोल बनाकर 400-500 मिलीलीटर प्रति पौधा जड़ों में डालें. पत्ती मरोड़ रोग के कारण नसें मोटी, पत्तियों का ऊपर की ओर मुड़ना व पौधे छोटे रह जाते हैं. यह रोग विषाणु द्वारा फैलता है. सफेद मक्खी इस रोग को फैलाने में सहायक है. इसल‍िए सफेद मक्खी का नियंत्रण जरूरी है.

इसे भी पढ़ें: New Crop Variety: कृष‍ि वैज्ञान‍िकों ने व‍िकस‍ित की बासमती धान की दो अनोखी क‍िस्में, जान‍िए इनके बारे में सबकुछ 

 

POST A COMMENT