देश में धान का उत्पादन और खरीद दोनों में वृद्धिकेंद्र सरकार ने 2025-26 (अक्टूबर से मार्च) के दौरान किसानों से धान की खरीद में बड़ी बढ़ोतरी दर्ज की है. इस अवधि में कुल 484.27 लाख टन धान की खरीद की गई, जो पिछले साल की तुलना में 6.1 प्रतिशत अधिक है. सरकार ने इस सीजन के लिए संशोधित लक्ष्य 487 लाख टन तय किया है, जो पहले 477 लाख टन था.
आंकड़ों के अनुसार, खरीद में फरवरी महीने में 17 प्रतिशत की गिरावट देखी गई, लेकिन मार्च में इसमें जोरदार वापसी हुई और लगभग 10 गुना वृद्धि दर्ज की गई. इससे कुल खरीद के आंकड़े को मजबूती मिली है.
राज्यवार प्रदर्शन की बात करें तो उत्तर प्रदेश सबसे आगे रहा, जहां 41.75 लाख टन धान की खरीद की गई, जो पिछले वर्ष की तुलना में 6.8 प्रतिशत अधिक है. वहीं, वृद्धि के मामले में आंध्र प्रदेश ने सबसे शानदार प्रदर्शन करते हुए 79.3 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की. ओडिशा में भी 29.8 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई.
दूसरी ओर, कुछ राज्यों में गिरावट भी दर्ज की गई है. तमिलनाडु में धान खरीद 16.8 प्रतिशत घटी, जबकि पंजाब में 9.7 प्रतिशत की कमी आई है.
रबी सीजन के लिए सरकार ने 79.57 लाख टन धान खरीद का लक्ष्य रखा है, जिसमें तेलंगाना की हिस्सेदारी सबसे अधिक 35 लाख टन है.
पिछले 2024-25 सीजन में खरीफ और रबी दोनों मिलाकर कुल 545.22 लाख टन धान की खरीद हुई थी. वहीं, खरीफ धान उत्पादन 123.93 मिलियन टन रहा, जिसमें 1 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है.
विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारी खरीद में यह बढ़ोतरी किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) का लाभ दिलाने और बाजार में स्थिरता बनाए रखने में मददगार साबित होगी.
बीते वित्त वर्ष की बात करें तो भारत ने चीन को पीछे छोड़कर दुनिया का सबसे बड़ा चावल उत्पादक देश बनने का रिकॉर्ड हासिल किया है. उस साल भारत ने लगभग 150 मिलियन मीट्रिक टन चावल का उत्पादन किया, जबकि चीन का उत्पादन 145.28 मिलियन टन रहा. वर्तमान में, वैश्विक चावल उत्पादन में भारत की हिस्सेदारी लगभग 28% है.
हालांकि, एक दशक पहले भारत का चावल उत्पादन 104.4 मिलियन मीट्रिक टन था, जबकि चीन का उत्पादन 148.5 मिलियन मीट्रिक टन था—जो भारत के उत्पादन में लगातार वृद्धि और चीन के उत्पादन में ठहराव की ओर इशारा करता है.
विशेषज्ञों की मानें तो धान का यह उत्पादन पानी की कीमत पर मिल रहा है. धान की खेती से मिलने वाले लाभों के कारण, अब इसकी खेती उन क्षेत्रों में भी होने लगी है जहां पानी की भारी कमी है. अलग-अलग राज्यों में इसकी पैदावार में काफी असमानता देखने को मिलती है. धान की खेती उन इलाकों के लिए चुनौती बनती जा रही है जहां भूजल स्तर बहुत नीचे चला गया है और किसान सिंचाई के लिए पंप आदि का सहारा लेते हैं. इससे पानी का स्तर तेजी से नीचे जा रहा है जो बाकी फसलों के लिए भी खतरा है.
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