चने की खेतीरबी सीजन की शुरुआत होते ही किसान प्रमुख फसलों की खेती में जुटे हुए हैं. इस सीजन की एक काफी प्रमुख फसल है चना, जिसकी खेती से किसान बंपर मुनाफा कमा सकते हैं. लेकिन खेती के समय कई बार किसान चने की बेहतर किस्मों को लेकर थोड़े असमंजस में रहते हैं कि आखिर कौन से किस्मों की खेती से उन्हें बंपर पैदावार मिले. ऐसे में अगर आप भी इस रबी सीजन चने की खेती करना चाहते हैं और किस्मों को लेकर चिंतित है तो बिहार राज्य बीज निगम ने की ओर से 5 खास किस्मों के बारे में बताया गया है,जो न केवल बंपर पैदावार देने की क्षमता रखती हैं, बल्कि कई रोगों के प्रति भी प्रतिरोधी होती हैं. आइए जानते हैं उनकी खासियत.
1. GG-4: GG-4 चने की एक खास वैरायटी है. इस किस्म को 2000 में विकसित किया गया था. इसकी खेती नवंबर और दिसंबर महीने में की जाती है. ये किस्म 120 से 130 दिनों में पककर तैयार हो जाता है. वहीं, इससे किसान प्रति हेक्टेयर 19-20 क्विंटल तक उपज देती है. इसकी खासियत ये है कि यह मुरझाने के प्रति सहनशील है.
2. सबौर चना-1: चने की सबौर चना-1 एक देसी किस्म है जो मात्र 130 से 135 दिनों में पक कर तैयार हो जाती है. इस किस्म के पौधे की ऊंचाई दो फ़ीट से भी कम होती है. वहीं, इसमें पाला पड़ने की संभावना कम रहती है. ये किस्म मुरझान, जड़ सड़न और कॉलर रॉट रोग के प्रति प्रतिरोधी होता है. इस की पैदावार प्रति हेक्टेयर 24 से 25 क्विंटल तक होती है. वहीं, इस किस्म को 2020 में विकसित किया गया था.
3. GNG-2207 (अवध): GNG-2207 (अवध) चने की एक उन्नत देसी किस्म है, जिसे 2018 में श्रीगंगानगर (राजस्थान) के कृषि अनुसंधान केंद्र द्वारा विकसित किया गया था. यह किस्म औसतन 130 दिनों में पक जाती है और 16-17 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक की पैदावार दे सकती है. यह पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, और पश्चिम बंगाल जैसे क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है और उकठा रोग के प्रति सहनशील है.
4. आरबीजी-202: आरबीजी-202 चने की एक खास वैरायटी है. इस किस्म को 2015 में विकसित किया गया था. ये किस्म चने की पुरानी किस्मों की तुलना में कम उगता है. इसमें पाला पड़ने की संभावना कम रहती है. पौधे की ऊंचाई भी पौने दो फीट तक रहती है. पैदावार प्रति हेक्टेयर में 20 से 21 क्विंटल तक रहती है.
5. BG- 3043 (पूसा 3043): BG- 3043 (पूसा 3043) चने की एक अधिक उपज देने वाली देसी किस्म है, जिसे 2018 में भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) ने विकसित किया था. यह किस्म मध्यम बड़े दानों वाली है और सूखे के साथ-साथ जड़ सड़न, स्टंट और एस्कोकाइटा ब्लाइट जैसे रोगों के प्रति सहनशील है. इसकी औसत उपज 16 से 17 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है और यह पकने में 127-134 दिन लेती है.
Copyright©2026 Living Media India Limited. For reprint rights: Syndications Today