कश्मीरी सेब की बढ़ी मांगपश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष और आर्थिक मंदी का डर अब कश्मीर के सेब उद्योग पर भी असर डाल रहा है. यह असर एक साथ फायदे और चुनौतियों दोनों के रूप में सामने आ रहा है. विशेषज्ञों के अनुसार, हालात बिगड़ने से जहां निर्यात पर कुछ दबाव बढ़ा है, तो वहीं दूसरी तरफ देश के भीतर कश्मीरी सेबों की मांग और दाम में हल्की बढ़ोतरी देखने को मिल रही है. दरअसल वजह ये है कि ईरान, जो पहले भारत में सस्ते सेबों का बड़ा सप्लायर था, वहां से आपूर्ति में रुकावट आई है.
इसका सीधा असर भारतीय बाजार पर पड़ा है और अब कश्मीर के सेबों को देश में थोड़ा बेहतर मौका मिल रहा है. जम्मू-कश्मीर के पूर्व वित्त मंत्री और अर्थशास्त्री हसीब द्राबू के मुताबिक, ईरान से जुड़ी बाधाओं का कश्मीरी सेब व्यापार पर असर मिला-जुला रहा है, लेकिन कुल मिलाकर ये समय कुछ हद तक फायदेमंद साबित हुआ है.
हसीब द्राबू के अनुसार, पहले ईरानी सेब बहुत सस्ते दाम पर भारत के कई बड़े बाजारों. खासकर दक्षिण और पश्चिम भारत में आसानी से मिल जाते थे. इससे कश्मीरी सेबों को कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता था. लेकिन अब जब ईरान से सप्लाई कम हो गई है, तो बाजार में थोड़ी राहत और बेहतर अवसर पैदा कर दिए हैं. इसे देखते हुए महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्यों के थोक व्यापारी अब ज्यादा कश्मीरी सेब खरीदने लगे हैं. इसका नतीजा यह हुआ कि अप्रैल 2026 के दौरान थोक बाजार में सेबों की कीमतें बढ़ गई हैं और कश्मीर के सेब किसानों को बेहतर दाम मिलने लगे हैं.
पूर्व वित्त मंत्री हसीब द्राबू का कहना है कि कम प्रतिस्पर्धा की वजह से कश्मीरी सेब अब देश के बाजारों में ज्यादा मजबूती से बिक रहे हैं. घरेलू उत्पादन अच्छा होने के बावजूद किसानों और व्यापारियों दोनों को फायदा हुआ है. इसके साथ ही केंद्र सरकार द्वारा मार्च 2026 में ‘RoDTEP’ योजना के तहत निर्यात कर रिफंड फिर से शुरू करने से निर्यातकों को भी थोड़ी राहत मिली है. खासकर उन बागवानी व्यापारियों को जो पहले से ही पश्चिम एशिया में चल रही समस्याओं से परेशान थे.
हालांकि, विशेषज्ञ चेतावनी भी दे रहे हैं कि हालात पूरी तरह स्थिर नहीं हैं. अंतरराष्ट्रीय तनाव के कारण सेब के निर्यात पर दबाव बना हुआ है. खाड़ी देशों को भेजे जाने वाले सेबों का निर्यात लगभग 65 फीसदी तक गिर गया है, और पिछले तीन सालों में जम्मू-कश्मीर का कुल सेब निर्यात भी करीब 26 फीसदी तक कम हो चुका है.
आर्थिक मंदी को लेकर विशेषज्ञों का कहना है कि अगर लोग खर्च करने में सावधानी बरतने लगें, तो इसका असर प्रीमियम यानी महंगे फलों की बिक्री पर पड़ सकता है. ऐसे में कुछ लोग सस्ते फलों की ओर रुख कर सकते हैं, जिससे सेब की मांग थोड़ी प्रभावित हो सकती है. हालांकि, विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि सेब उद्योग में किसी बड़ी या लंबे समय तक चलने वाली मंदी की संभावना नहीं है.
हसीब द्राबू के अनुसार, अगर दुनिया में राजनीतिक तनाव और आर्थिक अनिश्चितता बनी रहती है, तो सेब व्यापार पर मुनाफे का दबाव जरूर रह सकता है, लेकिन यह उद्योग पूरी तरह कमजोर नहीं होगा. इसकी सबसे बड़ी ताकत घरेलू बाजार की लगातार बनी रहने वाली मांग है, जो कश्मीर की सेब अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाती है. उन्होंने यह भी कहा कि आने वाले समय में उत्पादन स्थिर रहने या थोड़ा बढ़ने की उम्मीद है. साथ ही, कोल्ड स्टोरेज सुविधाओं का विस्तार और हाई-डेंसिटी बागवानी जैसी सरकारी योजनाएं इस क्षेत्र को और मजबूत बना रही हैं.
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