बीड की महिला किसान पारंपरिक तरीके से तैयार करती हैं मूंग दालमहाराष्ट्र के बीड जिले में सिंधी का अष्टविनायक किसान महिला स्वशासन समूह पारंपरिक तरीके से मूंग की दाल तैयार करता है. इस दाल की खेती खुद महिलाएं करती हैं और मूंग की दाल बनाती हैं. जैसे ग्रामीण इलाकों में होता है, यहां की महिलाएं भी जांत पर पारंपरिक तरीके से दाल दल कर बनाती हैं. दाल बनाने का पूरा काम पारंपरिक तरीके से होता है, इसलिए दाल की क्वालिटी पूरी तरह से बनी रहती है. मशीनों में बनने वाली दाल ऐसी नहीं होती क्योंकि उसमें पॉलिस देने से कई पोषक तत्व खत्म हो जाते हैं.
बीड जिले को सूखा और गन्ना श्रमिकों के जिले के रूप में जाना जाता है. लेकिन कृषि विज्ञान केंद्र और नवचेतना संस्थाओं के मार्गदर्शन में इस जिले की महिलाओं को अपना रोजगार मिलना शुरू हुआ है. इसलिए अब सिंधी गांव की महिलाएं दूसरे राज्यों में गन्ना काटने नहीं जा रही हैं. ये महिलाएं अपने राज्य और अपने जिले में ही स्वरोजगार कर अच्छी कमाई कर रही हैं. इसी में एक काम दाल बनाने का भी है जो कि पूरी तरह से पारंपरिक है.
बीड जिले के सिंधी गांव की 40 महिलाओं ने अपना ग्रुप बनाकर अपने ही खेत में एक एकड़ में मूंग की दाल उगाई है. ये महिलाएं अपनी दालें मूंग मार्केट में नहीं बेचती हैं बल्कि उसे पारंपरिक तरीके से दाल बनाकर बेचती हैं. इससे उन्हें मूंग दाल से अच्छी कमाई मिल जाती है. अगर वही मूंग सामान्य दाल के लिए बाजार में बेचा जाता तो इन महिलाओं को अच्छा मुनाफा नहीं होता. लेकिन पांरपरिक तरीके से दाल बनाने से महिला किसानों की कमाई बढ़ गई है. इन महिलाओं को अपने ही गांव में रोजगार मिल रहा है.
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महिला किसानों का कहना है कि जब उन्हें गन्ना काटने दूसरे राज्यों में जाना पड़ता था तब बच्चे साथ में ले जाना पड़ता था. इससे बच्चों की पढ़ाई-लिखाई पर असर पड़ता था क्योंकि घरों में बुजुर्ग ही रहते हैं. अब इन महिलाओं को मूंग की खेती करने और मूंग दाल बेचने से महीने में 50 से 60 हजार रुपये तक की कमाई हो जाती है. रोजगार मिलने और कमाई बढ़ने से महिला किसानों में खुशी देखी जा रही है.
इस बारे में एक किसान मनीषा मुले ने कहा कि ग्रामीण इलाके में रहने के कारण हमें कुछ पता नहीं था. जब हमारी मुलाकात गांव के बोरा मैडम और नवचेतना संस्था की मनीषा घुले मैडम से हुई तब उन्होंने हमें महिला स्वसहायता समूह बनाने का सुझाव दिया. बीड जिला पहले से ही गन्ना काटने वाले जिले के नाम से मशहूर है. अब यहां मूंग की खेती बड़े पैमाने पर हो रही है और महिला किसान इसमें बड़ी भागीदारी निभा रही हैं. इससे महिला किसानों को रोजगार भी मिला हुआ है.
एक और किसान शिला मुले ने बताया है कि जो मूंग दाल वे तैयार करती हैं, उनमें केमिकल नहीं होता और न ही किसी तरह के केमिकल का प्रयोग किया जाता है. इस दाल से लोगों को किसी तरह की बीमारी नहीं होगी. किसानों ने चालीस महिलाओं का ग्रुप बनाकर दाल बेचने का काम शुरू किया है. ये महिला किसान अपने खेत में ही दाल भी उगाती हैं.
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महिला किसान सारिका मुनसुके ने बताया कि पहले हमें घर के बाहर निकलना मुश्किल होता था. लेकिन जब से हमने अपनी संस्था बनाई है, तब से हमें बाहर का नॉलेज मिलना शुरू हुआ है. अब हम खुद का रोगजार करते हैं. नवचेतना संस्था की मनीषा घुले ने बताया है कि उनकी संस्था महिलाओं के साथ काम करके उन्हें सक्षम बनाती है. पहले इस इलाके में रासायनिक खेती होती थी, लेकिन अब ऑर्गेनिक खेती ने लोगों को आकर्षित किया है. कृषि विज्ञान केंद्र के माध्यम से इन महिलाओं को खेती करने की ट्रेनिंग दी जाती है. अब इन किसानों को एक दिन में 300-400 रुपये तक कमाई हो जाती है.(रोहिदास हातागले की रिपोर्ट)
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