मराठवाड़ा में 14 साल बाद सूखे जैसे हालात, खेतों में जल रहीं फसलें, बीड में सूखा घोषित करने की मांग तेज

मराठवाड़ा में 14 साल बाद सूखे जैसे हालात, खेतों में जल रहीं फसलें, बीड में सूखा घोषित करने की मांग तेज

मराठवाड़ा में मॉनसून की लंबी बेरुखी ने सूखे जैसे हालात पैदा कर दिए हैं. बीड समेत कई जिलों में बारिश में भारी कमी के कारण सोयाबीन, कपास और अन्य खरीफ फसलें बर्बाद हो रही हैं. जलाशयों का जलस्तर तेजी से घटने के बाद प्रशासन ने पानी को सिर्फ पेयजल के लिए सुरक्षित कर दिया है. किसान सूखा घोषित करने और तत्काल राहत पैकेज की मांग कर रहे हैं.

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मराठवाड़ा में 14 साल बाद सूखे जैसे हालात, खेतों में जल रहीं फसलें, बीड में सूखा घोषित करने की मांग तेजमराठवाड़ा भी भीषण सूखा

महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र में इस साल मॉनसून की बेरुखी ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है. अगस्त महीना लगभग पूरी तरह सूखा गुजरने और सितंबर के पहले सप्ताह तक पर्याप्त बारिश नहीं होने के कारण पूरे क्षेत्र में सूखे जैसे हालात बन गए हैं. हालात इतने गंभीर हैं कि कई जगह किसान अपनी सूख चुकी फसलों को ट्रैक्टर से नष्ट कर रहे हैं, जबकि कई किसान फसलों को उखाड़कर पशुओं के चारे के रूप में इस्तेमाल करने को मजबूर हैं.

सबसे खराब स्थिति बीड जिले की बताई जा रही है, जहां पूरे महाराष्ट्र में सबसे कम बारिश दर्ज की गई है. लगातार 35 से 45 दिनों तक बारिश नहीं होने से खरीफ सीजन की प्रमुख फसलें खेतों में ही झुलसने लगी हैं. किसान संगठनों ने राज्य सरकार से तत्काल सूखा घोषित करने और प्रभावित किसानों के लिए विशेष राहत पैकेज जारी करने की मांग की है.

34 फीसदी से ज्यादा बारिश की कमी

मराठवाड़ा में सितंबर के पहले सप्ताह तक सामान्य से 34 फीसदी से अधिक कम बारिश दर्ज की गई है. वहीं बीड जिले में यह कमी करीब 49 फीसदी तक पहुंच गई है. अगस्त महीने में जिले को सामान्य बारिश का केवल एक छोटा हिस्सा ही मिला, जिससे खेती पर सीधा असर पड़ा.

इस साल जिले में करीब 7 लाख 43 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में खरीफ फसलों की बुआई हुई थी. इनमें सोयाबीन, कपास, मक्का, अरहर और मूंग प्रमुख फसलें हैं. लेकिन बारिश नहीं होने से लगभग 3 लाख हेक्टेयर क्षेत्र की सोयाबीन और कपास की फसल गंभीर संकट में बताई जा रही है.

खेतों में सूख रही है सोयाबीन और कपास

मराठवाड़ा के हिंगोली, जालना, परभणी और बीड जिलों में किसानों की उम्मीदें बारिश पर टिकी थीं, लेकिन लंबे सूखे अंतराल ने फसलों को भारी नुकसान पहुंचाया है. कई क्षेत्रों में पौधों की वृद्धि रुक गई है, जबकि कुछ खेतों में फसल पूरी तरह सूखने लगी है.

किसानों का कहना है कि खाद, बीज, दवाइयों और सिंचाई पर भारी खर्च करने के बावजूद अब उत्पादन मिलने की संभावना बेहद कम नजर आ रही है. ऐसे में खेती की लागत निकालना भी मुश्किल हो सकता है.

जलाशयों में घटा पानी, सिंचाई पर रोक

बारिश की कमी का असर केवल खेती तक सीमित नहीं है. क्षेत्र के प्रमुख बांधों और जलाशयों का जलस्तर भी तेजी से गिरा है.

जानकारी के अनुसार, सीना-कोलेगांव बांध का उपयोगी जल भंडार शून्य प्रतिशत तक पहुंच गया है. माजलगांव बांध में केवल 26 फीसदी और मांजरा बांध में करीब 12 फीसदी पानी बचा है. स्थिति की गंभीरता को देखते हुए प्रशासन ने जायकवाड़ी बांध को छोड़कर अन्य प्रमुख जल स्रोतों से सिंचाई के लिए पानी देने पर रोक लगा दी है.

अब उपलब्ध पानी को केवल पेयजल जरूरतों के लिए आरक्षित किया जा रहा है. साथ ही कृषि कार्यों के लिए अवैध रूप से पानी उठाने पर कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं.

450 गांवों में टैंकरों से पहुंच रहा पानी

जल संकट का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मराठवाड़ा के 450 से अधिक गांवों में लोगों को पीने का पानी टैंकरों के जरिए उपलब्ध कराया जा रहा है. वर्तमान में 88 से ज्यादा टैंकर प्रभावित गांवों में पानी पहुंचा रहे हैं.

किसानों का कहना है कि यदि जल्द ही बारिश नहीं हुई तो सिर्फ फसल ही नहीं, बल्कि पशुओं के चारे और ग्रामीण इलाकों में पेयजल की समस्या भी और गंभीर हो जाएगी.

किसान सभा ने सरकार पर लगाए अनदेखी के आरोप

किसान सभा के बीड जिला अध्यक्ष अजय बुरांडे ने कहा कि क्षेत्र में सूखा घोषित करने के सभी मानदंड पूरे हो चुके हैं. बारिश की भारी कमी, फसलों का नुकसान और जल स्रोतों में पानी की कमी साफ संकेत दे रही है कि हालात बेहद गंभीर हैं.

उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य सरकार ने अभी तक इस मुद्दे पर गंभीरता से चर्चा नहीं की है. किसान संगठनों ने मांग की है कि कर्नाटक की तरह महाराष्ट्र सरकार भी केंद्र को रिपोर्ट भेजकर सूखा राहत की प्रक्रिया शुरू करे, ताकि किसानों की आर्थिक हालत और आत्महत्याओं की आशंका को रोका जा सके.

पिछले साल बाढ़, इस साल सूखे की मार

बीड के एक किसान ने बताया कि पिछले साल बाढ़ के कारण उनकी 70 फीसदी जमीन प्रभावित हो गई थी और इलाके की दो झीलें टूट गई थीं. किसी तरह उस आपदा से उबरने के बाद इस साल उन्होंने करीब डेढ़ लाख रुपये उधार लेकर खेती की थी.

किसान का कहना है कि अब डेढ़ महीने से बारिश नहीं होने के कारण पूरी फसल बर्बाद होने की कगार पर है. उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि न तो पिछले साल का फसल बीमा मिला और न ही नुकसान का पर्याप्त मुआवजा.

महिला किसान बोलीं, फसल उखाड़कर पशुओं को खिला रहे

बीड की महिला किसान संगीता उबाले ने बताया कि उन्होंने पांच एकड़ में सोयाबीन की खेती की थी. खेती पर करीब दो लाख रुपये खर्च किए गए, लेकिन बारिश नहीं होने से पूरी फसल सूख रही है.

उन्होंने कहा कि अब हालात ऐसे हैं कि फसल को खेत से निकालकर पशुओं को खिलाना पड़ रहा है. परिवार पर कर्ज का बोझ बढ़ रहा है, बच्चों की पढ़ाई और बेटी की शादी जैसी जिम्मेदारियां सामने हैं. उन्होंने सरकार से प्रति हेक्टेयर कम से कम एक लाख रुपये की राहत देने की मांग की है.

13-14 सितंबर को बारिश की उम्मीद

हालांकि मौसम विभाग ने किसानों को कुछ राहत की उम्मीद दी है. बंगाल की खाड़ी में बन रहे कम दबाव के क्षेत्र के प्रभाव से 13 और 14 सितंबर को मराठवाड़ा के कुछ हिस्सों में भारी से बहुत भारी बारिश होने का अनुमान व्यक्त किया गया है.

अब किसानों की निगाहें आसमान पर टिकी हैं. यदि यह बारिश अच्छी होती है तो कुछ फसलों को आंशिक राहत मिल सकती है. लेकिन कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि जिन फसलों को लंबे समय तक नमी नहीं मिली है, उनकी भरपाई केवल एक-दो दिन की बारिश से आसान नहीं होगी.

मराठवाड़ा के किसानों के सामने फिलहाल दोहरी चुनौती है. एक तरफ सूखती फसलें हैं, दूसरी तरफ पेयजल संकट गहराता जा रहा है. ऐसे में किसान संगठनों की मांग है कि सरकार तत्काल सूखा घोषित कर राहत और मुआवजा प्रक्रिया शुरू करे, ताकि किसानों को आर्थिक संकट से उबारा जा सके.

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