सोयाबीन फसल को नुकसानमहाराष्ट्र के मराठवाड़ा और विदर्भ क्षेत्र में बारिश का लंबा ब्रेक किसानों के लिए बड़ी मुसीबत बन गया है. खरीफ सीजन की प्रमुख फसलें सोयाबीन और कपास पानी की कमी से प्रभावित हो रही हैं. खेतों में खड़ी फसलों की पत्तियां पीली पड़ने लगी हैं, फूल झड़ रहे हैं और पौधों की बढ़वार रुक गई है. कई इलाकों में किसान अब फसल बचने की उम्मीद भी खोने लगे हैं.
जून और जुलाई में हुई शुरुआती बारिश के भरोसे किसानों ने बड़े पैमाने पर सोयाबीन और कपास की बुवाई की थी. लेकिन अगस्त के आखिरी सप्ताह और सितंबर की शुरुआत में बारिश लगभग थम जाने से खेतों में नमी खत्म हो गई है. इसका सबसे ज्यादा असर उन किसानों पर पड़ रहा है, जिनकी खेती पूरी तरह मॉनसून पर निर्भर है.
विदर्भ क्षेत्र देश के प्रमुख सोयाबीन और कपास उत्पादक इलाकों में शामिल है. यहां हर साल लगभग 85 से 95 लाख एकड़ भूमि पर इन दोनों फसलों की खेती की जाती है.
आंकड़ों के अनुसार, इस खरीफ सीजन में विदर्भ में:
सोयाबीन
19 से 21 लाख हेक्टेयर क्षेत्र
लगभग 47 से 52 लाख एकड़ भूमि
कपास
15 से 17 लाख हेक्टेयर क्षेत्र
लगभग 37 से 42 लाख एकड़ भूमि
यानी अकेले विदर्भ में करीब 85 से 95 लाख एकड़ क्षेत्र में किसानों का भविष्य इन दो फसलों पर टिका हुआ है.
अमरावती संभाग, जिसमें अकोला, बुलढाणा, वाशिम, अमरावती और यवतमाल जिले शामिल हैं, सोयाबीन और कपास उत्पादन का बड़ा केंद्र माना जाता है.
अमरावती संभाग
सोयाबीन
14 से 15 लाख हेक्टेयर
35 से 37 लाख एकड़
कपास
10 से 11 लाख हेक्टेयर
25 से 27 लाख एकड़
इसी तरह नागपुर संभाग के वर्धा, नागपुर, चंद्रपुर समेत कई जिलों में भी हालात चिंताजनक हैं.
नागपुर संभाग
सोयाबीन
5 से 6 लाख हेक्टेयर
12 से 15 लाख एकड़
कपास
5 से 6 लाख हेक्टेयर
12 से 15 लाख एकड़
कृषि जानकारों का कहना है कि पौधों में फूल और दाना बनने का यह सबसे महत्वपूर्ण समय है. ऐसे में लंबे समय तक बारिश नहीं होने से उत्पादन पर सीधा असर पड़ सकता है.
धाराशिव में किसानों के सामने गहराया संकट
शिवसेना सांसद ओमप्रकाश राजेनिंबालकर ने धाराशिव जिले का दौरा करने के बाद कहा कि क्षेत्र के किसान गंभीर संकट में हैं. उनके मुताबिक जिले में पिछले 30 से 35 दिनों से पर्याप्त बारिश नहीं हुई है, जिससे सोयाबीन की फसल बुरी तरह प्रभावित हुई है.
उन्होंने कहा कि एक एकड़ सोयाबीन की खेती पर किसान को लगभग 25,000 से 30,000 रुपये तक का खर्च करना पड़ता है. लेकिन मौजूदा हालात में किसानों के लिए अपनी लागत तक निकाल पाना मुश्किल दिखाई दे रहा है.
राजेनिंबालकर के अनुसार, यदि अब बारिश होती भी है तो उसका लाभ बहुत सीमित रहेगा क्योंकि फसल पहले ही गंभीर नुकसान झेल चुकी है. उन्होंने चेतावनी दी कि जिन परिवारों की आय पूरी तरह इन फसलों पर निर्भर है, उनके सामने आर्थिक संकट खड़ा हो सकता है.
धाराशिव सांसद ने दावा किया कि कई इलाकों में फसल नुकसान करीब 100 प्रतिशत तक पहुंच चुका है. उन्होंने राज्य सरकार से प्रभावित किसानों को तत्काल आर्थिक सहायता देने की मांग की है.
उन्होंने कहा कि किसानों पर बैंक ऋण और निजी उधार का दबाव बढ़ सकता है. यदि फसल नहीं बची तो किसानों को कर्ज चुकाने में भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा.
राजेनिंबालकर ने फसल बीमा योजना को लेकर भी सवाल उठाए हैं. उन्होंने कहा कि पहले बीमा योजना में कुछ तय 'ट्रिगर' लागू थे.
इनमें प्रमुख रूप से 21 दिनों तक बारिश नहीं होना, एक दिन में 63 मिमी या उससे अधिक बारिश होना जैसी परिस्थितियों को बीमा दावे के आधार के रूप में माना जाता था. उनका कहना है कि वर्तमान व्यवस्था में केवल 'क्रॉप कटिंग एक्सपेरिमेंट' के आधार पर नुकसान का आकलन किया जाता है, जिससे किसानों को तत्काल राहत नहीं मिल पाती.
सांसद ने मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री और कृषि मंत्री से पुराने ट्रिगर सिस्टम को दोबारा लागू करने की मांग की है ताकि सूखे जैसी स्थिति में किसानों को समय रहते बीमा लाभ मिल सके.
विदर्भ और मराठवाड़ा के लाखों किसान अब आने वाले दिनों में बारिश की उम्मीद लगाए बैठे हैं. हालांकि कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि यदि जल्द पर्याप्त बारिश नहीं हुई तो सोयाबीन और कपास के उत्पादन में बड़ी गिरावट दर्ज की जा सकती है. इसका असर किसानों की आय के साथ-साथ राज्य के कृषि उत्पादन पर भी पड़ सकता है.
फिलहाल महाराष्ट्र के सूखा प्रभावित इलाकों में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या बारिश लौटकर फसलों को बचा पाएगी, या फिर किसानों को एक और नुकसान वाले सीजन का सामना करना पड़ेगा.
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