
उत्तर भारत में बढ़ती गर्मी और हीटवेव का असर अब खेती पर भी साफ दिखाई देने लगा है. विशेष रूप से धान की नर्सरी (बेहन) तैयार करने वाले किसानों के सामने इस समय बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है. कई क्षेत्रों में तापमान 46 के आसपास पहुंचने से खेतों का पानी अत्यधिक गर्म हो रहा है, जिसका सीधा असर बीजों के अंकुरण और पौधों की बढ़वार पर पड़ रहा है. कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार अधिक तापमान के कारण धान के बीजों का जमाव आधा रह जा रहा है, जबकि कई जगह पौधे पीले पड़कर सूखने लगे हैं.
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि जिन किसानों के पास पर्याप्त सिंचाई संसाधन नहीं हैं, वहां नर्सरी सूखने की समस्या अधिक देखने को मिल रही है. वहीं, जो किसान दिन में खेतों में पानी भरकर छोड़ दे रहे हैं, उनके खेतों में पानी का तापमान बढ़ने से पौधों की जड़ों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है.
कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को सलाह दी है कि भीषण गर्मी के दौरान दिन में कभी भी नर्सरी में सिंचाई न करें. तेज धूप में खेत का पानी गर्म होकर पौधों की जड़ों को नुकसान पहुंचा सकता है. ऐसे में सूरज ढलने के बाद ही खेत में पानी देना बेहतर माना गया है.
इसके अलावा यदि दिन में खेत में पानी भरा हो, तो तापमान बढ़ने से पहले उसकी निकासी कर देनी चाहिए ताकि गर्म पानी पौधों को नुकसान न पहुंचाए.
विशेषज्ञों के मुताबिक धान की नर्सरी के लिए आदर्श तापमान 30 डिग्री सेल्सियस से 35 डिग्री सेल्सियस के बीच माना जाता है.
यदि तापमान इससे अधिक हो रहा है, तो दोपहर 12 बजे से 3 बजे के बीच पौधों पर सादा पानी का हल्का स्प्रे करना लाभकारी हो सकता है. इससे पौधों का तापमान नियंत्रित रहता है और गर्मी का असर कम पड़ता है.
तेज गर्म हवाएं यानी लू भी धान की नर्सरी को नुकसान पहुंचाती हैं. इससे बचाव के लिए कृषि वैज्ञानिकों ने नर्सरी की क्यारियों के चारों ओर मक्का, बाजरा या चरी (ज्वार) जैसी फसल लगाने की सलाह दी है. इससे गर्म हवाओं की तीव्रता कम होती है और नर्सरी को प्राकृतिक सुरक्षा मिलती है.
इसके अलावा किसान हरी शेड नेट या घास-फूस की हल्की ढकाई करके भी नर्सरी को तेज धूप से बचा सकते हैं.
विशेषज्ञों का कहना है कि अंकुरण निकलने के बाद बीजों की बुवाई हमेशा शाम के समय करनी चाहिए. इससे पौधों को रातभर अनुकूल वातावरण मिलता है और सुबह की तेज धूप से उन्हें कम नुकसान होता है.
जिन किसानों ने पहले ही नर्सरी डाल दी है, उनके लिए खेत में लगातार उचित नमी बनाए रखना जरूरी है. अधिक तापमान में खेत पूरी तरह सूखने नहीं देना चाहिए, लेकिन अत्यधिक गर्म पानी भी खेत में जमा नहीं रहने देना चाहिए. संतुलित नमी बनाए रखने से पौधों की बढ़वार बेहतर रहती है.
धान की नर्सरी तैयार करने जा रहे किसानों को कृषि वैज्ञानिकों ने खेत की तैयारी के दौरान गोबर की सड़ी खाद या वर्मी कम्पोस्ट का उपयोग करने की सलाह दी है. कई प्रयोगों में पाया गया है कि जैविक खाद के उपयोग से मिट्टी में नमी लंबे समय तक बनी रहती है और हीटवेव का असर फसल पर अपेक्षाकृत कम पड़ता है.
विशेषज्ञों ने किसानों को यह भी सलाह दी है कि डीएपी और जिंक का उपयोग एक साथ न करें. दोनों उर्वरकों के प्रयोग के बीच कुछ दिनों का अंतर रखना जरूरी है, अन्यथा पौधों की वृद्धि प्रभावित हो सकती है.
धान की फसल को बीज जनित और भूमि जनित रोगों से बचाने के लिए बीज उपचार अनिवार्य बताया गया है. कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार 40 किलो बीज के लिए 100 लीटर पानी में लगभग 8 ग्राम स्ट्रेप्टोसाइकिलिन और 150 ग्राम कार्बेंडाजाइम मिलाकर बीज उपचार करना चाहिए.
इसके अलावा बेहतर बढ़वार के लिए एजोटोबेक्टर और पीएसबी जैसे लाभकारी जीवाणुओं से भी बीज उपचार करने की सलाह दी गई है. उपचार के बाद बीजों को छायादार स्थान पर गीले जूट के बोरों से ढककर रखना चाहिए और अंकुरण निकलने के बाद ही खेत में बुवाई करनी चाहिए.
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