
मध्य प्रदेश में मूंग की खेती बड़े पैमाने पर होती है, लेकिन फसल को जल्द सुखाकर मंडी पहुंचाने की होड़ अब चिंता बढ़ा रही है. गर्मी की मूंग को जल्दी सुखाने के लिए कुछ किसान फसल पर पैराक्वाट डाइक्लोराइड जैसे रसायनों का इस्तेमाल कर रहे हैं.इससे फसल कम समय में सूख जाती है, लेकिन इसके इस्तेमाल और अवशेषों को लेकर मिट्टी, पर्यावरण और खाद्य सुरक्षा पर सवाल खड़े हो रहे हैं.
प्रदेश के प्रमुख मूंग उत्पादक जिलों सीहोर, रायसेन, नर्मदापुरम, हरदा, विदिशा और नरसिंहपुर में इस तरह के रसायनों के इस्तेमाल की खूब चर्चा है.हालांकि, कृषि विभाग के प्लांट प्रोटेक्शन प्रभारी अनिल बिसेन ने स्पष्ट किया है कि विभाग ने इन छह जिलों में कोई जांच नहीं कराई है।
ग्रीष्मकालीन मूंग की फसल करीब 60 दिन में तैयार हो जाती है. आमतौर पर मार्च के आसपास इसकी बोनी होती है और मई तक फसल पकने लगती है. कटाई के समय फसल में नमी रहने पर उसे जल्दी सुखाने और मंडी में बेचने का दबाव रहता है.
इसी दौरान कुछ किसान फसल को तेजी से सुखाने के लिए पैराक्वाट डाइक्लोराइड जैसे रसायनों का इस्तेमाल करते हैं. किसानों के मुताबिक, पहले कम मात्रा में रसायन का इस्तेमाल किया जाता था, लेकिन कुछ जगहों पर इसकी मात्रा बढ़ाने और बार-बार छिड़काव की बात सामने आई है.
सीहोर जनपद के किसान गजेंद्र जाट के मुताबिक, हरी फसल को सुखाने के लिए पैराक्वाट का इस्तेमाल पिछले कुछ वर्षों में बढ़ा है. हालांकि, उनका कहना है कि ज्यादातर किसान इसका इस्तेमाल नहीं करते.
उनके मुताबिक, इस तरह के रसायन के इस्तेमाल के बाद मूंग के दानों के रंग में भी बदलाव दिखाई दे सकता है. हरे दाने हल्के लाल या फीके नजर आने लगते हैं.
पैराक्वाट डाइक्लोराइड बेहद विषैला रसायन है. इसके संपर्क या सेवन से गंभीर स्वास्थ्य नुकसान हो सकता है.इसलिए इसके इस्तेमाल को लेकर सुरक्षा नियमों और निर्धारित उपयोग का पालन बेहद जरूरी है.
वहीं ग्लाइफोसेट को लेकर भी लंबे समय से स्वास्थ्य और पर्यावरण संबंधी बहस चलती रही है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसके संभावित कैंसरकारी प्रभावों को लेकर अलग-अलग वैज्ञानिक आकलन सामने आए हैं.इसलिए खाद्य फसलों में किसी भी रसायन का इस्तेमाल निर्धारित मात्रा और स्वीकृत उपयोग के अनुसार करना जरूरी है.
कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक, किसी भी रसायन का लगातार और अनुशंसित मात्रा से ज्यादा इस्तेमाल मिट्टी के जैविक संतुलन को प्रभावित कर सकता है. मिट्टी में मौजूद लाभकारी सूक्ष्मजीवों और उसकी प्राकृतिक गुणवत्ता पर भी इसका असर पड़ सकता है.
हालांकि, किसी खास जिले की मिट्टी को इन रसायनों की वजह से ‘जहरीली’ या भविष्य में ‘बंजर’ घोषित करने के लिए वैज्ञानिक और आधिकारिक जांच जरूरी है.
मध्य प्रदेश कृषि विभाग के प्लांट प्रोटेक्शन अधिकारी अनिल बिसेन के मुताबिक, फसलों में इस्तेमाल होने वाले पेस्टिसाइड का असर रसायन के प्रकार पर निर्भर करता है. कई पेस्टिसाइड कुछ दिनों में टूट जाते हैं, जबकि कुछ रसायनों की अवशिष्ट अवधि अलग हो सकती है.
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि विभाग ने इन पेस्टिसाइड की मिट्टी में मौजूदगी को लेकर कोई विशेष जांच नहीं कराई है.
सीहोर के उप कृषि निदेशक अशोक उपाध्याय के मुताबिक, पैराक्वाट का इस्तेमाल कृषि के अलावा कुछ औद्योगिक गतिविधियों में भी होता है.कृषि क्षेत्र में इसके इस्तेमाल को नियंत्रित करने के लिए विभाग की ओर से कार्रवाई और जागरूकता बढ़ाई जा रही है.
मूंग सीधे हमारी थाली तक पहुंचती है. ऐसे में फसल में किसी भी रसायन के अनियंत्रित इस्तेमाल का मामला केवल किसानों की लागत या उत्पादन तक सीमित नहीं है. इसका संबंध खाद्य सुरक्षा, मिट्टी की सेहत और पर्यावरण से भी है.
कृषि विभाग की ओर से पहले भी किसानों को प्रतिबंधित या अनुशंसित नहीं किए गए रसायनों के इस्तेमाल से बचने की सलाह दी जाती रही है.अब जरूरत इस बात की है कि खेत से मंडी तक मूंग की गुणवत्ता की निगरानी मजबूत हो और किसानों को फसल सुखाने के सुरक्षित और वैज्ञानिक विकल्प उपलब्ध कराए जाएं.
क्योंकि मूंग की फसल जल्दी मंडी पहुंचाना जरूरी हो सकता है, लेकिन इसके लिए मिट्टी और खाद्य सुरक्षा की कीमत चुकाना कितना सही है—यह सवाल अब गंभीरता से पूछे जाने की जरूरत है.
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