फसल विविधीकरण से किसानों को नई राह, सिहोरा में तिल की खेती ने दिखाया उम्मीद का मॉडल

फसल विविधीकरण से किसानों को नई राह, सिहोरा में तिल की खेती ने दिखाया उम्मीद का मॉडल

सिहोरा में किसानों ने फसल विविधीकरण अभियान के तहत तिल की खेती को अपनाकर नई उम्मीद जगाई है.कृषि विभाग के अधिकारियों ने खेतों का अवलोकन कर किसानों को तिल की खेती के फायदे और संभावनाओं की जानकारी दी.

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फसल विविधीकरण से किसानों को नई राह, सिहोरा में तिल की खेती ने दिखाया उम्मीद का मॉडल

मध्य प्रदेश में किसानों की आय बढ़ाने और मौसम की अनिश्चितताओं से होने वाले नुकसान को कम करने के लिए चलाया जा रहा फसल विविधीकरण अभियान अब खेतों में सकारात्मक बदलाव दिखाने लगा है. पारंपरिक फसलों पर निर्भर रहने वाले किसान अब कम पानी, कम लागत और मौसम की चुनौती के बीच बेहतर विकल्प देने वाली फसलों की ओर बढ़ रहे हैं.सिहोरा विकासखंड के ग्राम कछपुरा (गोसलपुर) में किसानों द्वारा अपनाई गई तिल की खेती इसका एक उदाहरण बनकर सामने आई है.

मुख्यमंत्री जन विश्वास अभियान के तहत ग्राम कछपुरा पहुंचे कृषि अधिकारियों के दल ने नेशनल मिशन ऑन इडीबल ऑयल (तिलहन) के अंतर्गत लगाए गए तिल फसल प्रदर्शन का निरीक्षण किया.इस दौरान अधिकारियों ने किसानों के खेतों में तिल की फसल की स्थिति देखी और फसल विविधीकरण के फायदे बताए.

गुजरात तिल-6 ने बदली खेती की तस्वीर

कृषि विस्तार अधिकारी अदिति सिंह राजपूत के मार्गदर्शन में क्षेत्र के उन्नतशील किसान राजकिशोर पटेल और लक्ष्मी नारायण पटेल ने इस सीजन में पारंपरिक फसलों से हटकर अपने फसल चक्र में बदलाव किया.

कृषि विभाग के सहयोग से दोनों किसानों ने करीब 4 एकड़ क्षेत्र में गुजरात तिल-6 (GT-6) किस्म की बोनी की. किसानों के मुताबिक सामान्य तौर पर वे धान, मक्का और उड़द जैसी पारंपरिक फसलों की खेती करते रहे हैं, लेकिन इन फसलों में मौसम और पानी की उपलब्धता के कारण कई बार चुनौतियों का सामना करना पड़ता था.

इस बार मानसून में असामान्य बारिश के बावजूद तिल की फसल पर अपेक्षाकृत कम नकारात्मक असर देखने को मिला. किसानों का कहना है कि तिल की खेती कम पानी और कम लागत में अपेक्षाकृत सुरक्षित विकल्प साबित हो रही है.

मौसम में बदलाव में तिल क्यों बना विकल्प?

कृषि अधिकारियों के अनुसार बदलते मौसम के दौर में किसानों के लिए ऐसी फसलों का चयन महत्वपूर्ण हो गया है, जिनमें पानी की आवश्यकता कम हो और मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों में नुकसान का जोखिम अपेक्षाकृत कम रहे.

तिलहन फसलें इस दिशा में किसानों को एक वैकल्पिक रास्ता दे सकती हैं. यही वजह है कि फसल विविधीकरण अभियान के तहत किसानों को पारंपरिक फसलों के साथ-साथ अलग-अलग कृषि विकल्प अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है.

कृषि अधिकारियों ने खेत पर जाकर देखा प्रदर्शन

भ्रमण के दौरान उप संचालक कृषि उमेश कटहरे अपनी टीम के साथ किसानों के खेतों में पहुंचे. अधिकारियों ने तिल की फसल का बारीकी से निरीक्षण किया और किसानों से खेती की लागत, फसल की स्थिति तथा मौसम के प्रभाव को लेकर जानकारी ली.

अधिकारियों ने राजकिशोर पटेल और लक्ष्मी नारायण पटेल की तिल की खेती को क्षेत्र के दूसरे किसानों के सामने उदाहरण के तौर पर रखा. उन्होंने किसानों से पारंपरिक खेती के साथ वैकल्पिक और लाभदायक फसलों को फसल चक्र में शामिल करने का आह्वान किया.

दूसरे किसानों का भी बढ़ रहा रुझान

सिहोरा क्षेत्र में तिल की इस फसल के प्रदर्शन को देखने के बाद आसपास के किसान भी फसल विविधीकरण की संभावनाओं को लेकर रुचि दिखा रहे हैं. कृषि विभाग का मानना है कि यदि किसान स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार कम पानी और कम लागत वाली वैकल्पिक फसलों को अपनाते हैं, तो इससे खेती में जोखिम कम करने के साथ आय के नए अवसर भी तैयार हो सकते हैं.

सिहोरा के कछपुरा गांव में तिल की खेती का यह प्रयोग इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह किसानों को धान, मक्का और उड़द जैसी पारंपरिक फसलों के साथ तिलहन फसलों को फसल चक्र में शामिल करने का व्यावहारिक मॉडल दे रहा है.

 

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