देसी किस्म के धान को संरक्षित करके रॉयल्टी कमा सकते हैं किसान, यह है तरीका

देसी किस्म के धान को संरक्षित करके रॉयल्टी कमा सकते हैं किसान, यह है तरीका

धान की पारंपरिक किस्मों के संऱक्षण के लिए कृषक अधिकार प्राधिकरण का गठन किया गया है जिसका मुख्य कार्य देसी किस्मों के संरक्षण के लिए उनका पंजीकरण, पंजीकृत किस्मों के गुणों का विकास और उनका प्रलेखन, कृषकों को देसी किस्मों के संरक्षण के लिए मान्यता प्रदान करना एवं पुरस्कृत करना है.

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देसी किस्म के धान को संरक्षित करके रॉयल्टी कमा सकते हैं किसान, यह है तरीकाधान की पारंपरिक किस्मों के संरक्षण का तरीका फोटोः किसान तक

खरीफ सीजन शुरु होने वाला है. पहली बारिश के साथ ही किसान भाई खरीफ फसल की खेती के लिए खेत की तैयारी करना शूरू कर देंगे. देश में धान खरीफ की प्रमुख फसल है. सदियों से इसकी खेती देश में हो रही है. मौसम, जलवायु और क्षेत्र विशेष की भौगोलिक स्थिति के हिसाब से किसान धान की अलग-अलग खेती करते थे. जो बिल्कुल देशी ब्रीड थी. पर बदलते वक्त के साथ हाइब्रीड बीजों का दौर आया, और किसानों के पास से पारंपरिक देशी नस्ल खत्म होते गए. हाइब्रीड धान से बेशक अच्छा उत्पादन हासिल हुआ पर गुणवत्ता में कमी आई और इसके साथ-साथ कई रोग और कीट भी खेतों में आ गए. 

अब जब देशी किस्म के बीज विलुप्त होने के कगार पर पहुंच गए हैं तो इसके संरक्षण पर जोर दिया जा रहा है ताकि इन पारपंरिक किस्मों को बचाया जा सके. इसके लिए कृषक अधिकार प्राधिकरण का गठन किया गया है जिसका मुख्य कार्य देशी किस्मों के संरक्षण के लिए उनका पंजीकरण, पंजीकृत किस्मों के गुणों का विकास और उनका प्रलेखन, कृषकों को देशी किस्मों के संरक्षण के लिए मान्यता प्रदान करना एवं पुरस्कृत करना है. इसके अलावा अगर किसानों द्वारा दी गई धान की पारंपरिक किस्म का उपयोग नए किस्म के विकास के लिए होता है तो उसकी रॉयल्टी किसान को दी जाती है. 

देसी धान को पंजीकृत कराने  की प्रक्रिया

  • पंजीकरण हेतु सर्वप्रथम किसानों को कृषक अधिकार संरक्षण प्राधिकरण द्वारा निर्गत फॉर्म में आवेदन करना होता है. यह आवेदन पत्र किसानों को निशुल्क दिया जाता है. 
  • आवेदन कृषक, कृषक का समुदाय एवं कृषक के समूह किसी भी रूप में कर सकते हैं.
  • आवेदन के लिए संबंधित संस्था से सम्पर्क कर कृषक आवेदन भरते हैं एवं वहां से उनके आवेदन पत्र सत्यापन हेतु जिला कृषि पदाधिकारी को भेजा जाता है.
  • सत्यापन के बाद आवेदन को मुख्य कार्यालय, नई दिल्ली भेजा जाता है जहां पर फॉर्म की प्रारम्भिक जांच करने के बाद नमूने की मांग की जाती है.
  • चयनित किस्मों के नमूनों को जांच के लिए प्राधिकरण कार्यालय, नई दिल्ली भेजा जाता है.
  • जांच के बाद यदि ये किस्में विशिष्टता, एकरूपता एवं स्थायित्व के मापदण्डों के अनूरूप होती है तो उसे प्राधिकरण द्वारा पात्रता प्रमाण पत्र दे दिया जाता है जिससे कृषकों को उसके किस्म का मालिकाना हक प्राप्त हो जाता है.

देशी किस्मों के संरक्षण से लाभ

  • देशी किस्मों के पंजीकरण के बाद किसान को 15 वर्षों के लिए मालिकाना हक प्राप्त हो जाता है.
  • यदि कृषक/देशी किस्म किसी नई प्रजाति के विकास में सहायक होती है तो किसान को रॉयल्टी व आर्थिक लाभ मिलता है।
  • जो किसान देशी किस्मों के संरक्षण का कार्य करते हैं उन्हें प्राधिकरण द्वारा प्रत्येक वर्ष राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया जाता है जिसमें दस कृषकों को एक लाख रूपये व प्रशस्ति पत्र दिया जाता है और बीस कृषकों को स्मृति चिह्न व प्रशस्ति पत्र दिया जाता है.

 

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